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भगवान विष्णु का नाम कैसे पड़ा मधुसूदन, मंदार महोत्सव में स्वामी आगमानंद ने कह दी यह बड़ी बात

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मंदार महोत्सव में कामधेनु मंदिर में भगवान मधुसूदन भगवान के बारे में बातते स्वामी आगमानंद।  



डिजिटल डेस्क, भागलपुर। मकरसंक्रांति से बांका जिले के बौंसी में मंदार महोत्सव प्रारंभ है। यहां कामधेनु मंदिर भी है। श्री शिवशक्ति योगपीठ नवगछिया के पीठाधीश्वर और श्री उत्तरतोताद्रि मठ विभीषणकुंड अयोध्या के उत्तराधिकारी जगद्गुरु रामानुजाचार्य श्री रामचंद्राचार्य परमहंस स्वामी आगमानंद जी महाराज ने कामधेनु मंदिर पहुंचे। इससे पहले उन्होंने भगवान मधसुदून मंदिर और पापहरणी सरोवर स्थति अष्टकमल मंदिर में पूजा अर्चना की। अन्य कई धार्मिक स्थलों पर भी पहुंचे। पापहरण सरोवर और मंदार पर्वत की आराधना की।
मंदार में कामधेनु दर्शन महिमा व दीक्षा संस्कार का भव्य आयोजन

श्री शिवशक्ति योगपीठ नवगछिया के तत्वावधान में मंदार स्थित कामधेनु मंदिर परिसर में कामधेनु दर्शन महिमा, दीक्षा संस्कार एवं भजन-कीर्तन का आयोजन किया गया। स्वामी आगमानंद महाराज के सानिध्य में श्रद्धा और भक्ति भाव के साथ संपन्न हुआ। बांका, भागलपुर सहित आसपास के अन्य जिलों से पहुंचे करीब डेढ़ सौ श्रद्धालुओं ने स्वामी आगमानंद से आध्यात्मिक दीक्षा ली। पूरे मंदिर परिसर में आध्यात्मिक वातावरण व्याप्त रहा और श्रद्धालु भक्ति में लीन नजर आए।

  
कामधेनु माता की उत्पत्ति और मंदार की महिमा की चर्चा

स्वामी आगमानंद ने अपने प्रवचन में कामधेनु माता की उत्पत्ति और मंदार की महिमा का विस्तार से वर्णन किया। उन्होंने कहा कि समुद्र मंथन से प्राप्त 14 रत्नों में से एक कामधेनु माता थीं, जो आज मंदार में विराजमान हैं और भगवान श्रीकृष्ण को अत्यंत प्रिय थीं। उन्होंने बताया कि समुद्र मंथन के दौरान निकले विष की तीव्रता को शांत करने के लिए कामधेनु माता रत्नरूप में अवतरित हुईं थी। जिनके पास सभी मनोकामनाएं पूर्ण करने की दिव्य शक्ति है।
अद्वितीय तीर्थभूमि है मंदार

स्वामी आगमानंद महाराज ने मंदार को विश्व में अद्वितीय तीर्थभूमि बताते हुए कहा कि यह भगवान मधुसूदन और भगवान काशी विश्वनाथ की वासस्थली है। उन्होंने कहा कि यहां भगवान मधुसूदन की साक्षात विराजित हैं। उन्होंने वेद विद्यापीठ गुरुधाम को इस क्षेत्र को समृद्ध धरोहर बताया। उन्होंने लाहिड़ी जी को इस अवसर पर याद किया। श्री कृष्ण गोविन्द हरे मुरारे, हे नाथ नारायण वासुदेवा“ भजन गाए।

  
मधु और कैटभ का हुआ था संहार

अंगिका भाषण में बोलते हुए स्वामी आगमानंद ने कहा कि प्रत्येक वर्ष मकरसंक्रति पर सनातन संस्कृति का अद्भुत पर्व है। मंदार क्षेत्र सतयुग से ही तीर्थ क्षेत्र है। उन्होंने कहा कि भगवान विष्णु का सबसे प्रसिद्ध नाम मधुसूदन है। मधुसूदन भगवान की चर्चा श्री दुर्गासप्तशती में भी है। भगवान विष्णु के कान के मल से दो असुर की उत्पत्ति हुई, मधु और कैटभ। मधु और कैटभ से देवताओं का बहुत संघर्ष हुआ। जब पराजित नहीं हुए तो भगवान विष्णु ने योगनिंद्रा माता को याद किया, माता कालिका वहां उपस्थित हुई। दोनों असुरों को मोह-माया में डाला। फिर भगवान विष्णु ने मधु और कैटभ का संहार किया। उस दिन से भगवान विष्णु का नाम मधुसूदन भगवान हो गया, जो आज बौंसी में विराजित हैं।
देश भर में कुंभ 12 जगहों पर लगता है

स्वामी आगमानंद ने कहा कि मंदार में भी कुंभ लगता है, हालांकि यह प्रचलन में अभी नहीं है। लोग चार कुंभ को ही ज्यादा महत्व देते हैं, इन चारों में मंदार नहीं आता है। लेकिन पहला कुंभ तो मंदार ही है। जब इसी पर्वत से समुद्र मंथन हुआ तो अमृत का पहला बुंद यहीं गिरा था। इस कारण यह क्षेत्र धार्मिक दृष्टि से काफी प्रसिद्ध और उन्नत है।
हिरण्यकश्यपु से भी जुड़ा हुआ है मंदार

स्वामी आगमानंद ने कहा कि हिरण्यकश्यपु ने भी मंदार पर्वत पर आकर तपस्या किया था। उन्होंने यहां कठिन तपस्या की थी। श्रीमद्भागवत में भी इसकी चर्चा है। हिरण्यकश्यपु गुफा भी मंदार पर्वत है। सभी युगों में साधु, संत, आचार्य का भी यहां आना हुआ। मंदार पर्वत से समुद्र मंथन भी हुआ। सभी युगों में मंदार क्षेत्र का वर्णण मिलता है।
कई विद्वान भी पहुंचे थे यहां

इस अवसर पर स्वामी शिव प्रेमानंद भाई जी, मनोरंजन प्रसाद सिंह, प्रेम शंकर भारती, कुंदन बाबा, स्वामी जीवनानंद स्वामी, गीतकार राजकुमार, विश्वनाथ जी, शंभु नाथ वैदिक जी, अशोक बाबू, राजू जी, अनिरुद्ध बाबा आदि ने इस अवसर पर संबोधित किया। कई भजन कलाकार भी वहां पहुंचे थे। जिन्होंने एक बढ़कर एक भजन सुनाए।
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