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जौनपुर में 2009 से है घातक मांझे पर प्रतिबंध, न बिक्री रुकी और न ही मौतों का सिलसिला

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तस्वीर का इस्तेमाल प्रतीकात्मक प्रस्तुतीकरण के लिए किया गया है। जागरण



जागरण संवाददाता, जौनपुर। वर्ष 2009 से ही घातक मांझा पर प्रतिबंध है। इसके बावजूद न ही इसपर रोक लग सकी न ही मौतों का सिलसिला थमा। प्रशासन के तमाम दावों के बीच नगर समेत ग्रामीण अंचलों में इसे बेचा जाता है।  

नगर के ताड़तला, नवाब युसुफ रोड, सिपाह, शाही किला, लाइन बाजार, पुरानी बाजार, रूहट्टा, ओलंदगंज, चहारसू, नखास, पालिटेक्निक चौराहा सहित आदि इलाकों में प्रतिबंधित मांझा बेचे जाने का प्रमुख केंद्र है।  

बीते 11 दिसंबर को शहर के उमरपुर (हरिबंधनपुर) निवासी 40 वर्षीय शिक्षक संदीप तिवारी की मौत के बाद जब पुलिस ने कार्रवाई शुरू की तो इसे चोरी-छिपे बेचा जाने लगा और 14 जनवरी को केराकत के शेखजादा मोहल्ला निवासी 23 वर्षीय फिजियोथेरेपिस्ट समीर हाशमी की जान चली गई।

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अधिक से अधिक पतंग काटने के लिए इस मौत की डोर का इस्तेमाल किया जाता है। जानकार बताते हैं कि नायलान और एक मैटेलिक पाउडर को मिलाकर इसे बनाया जाता है। पुलिस समय-समय पर इसे लेकर कार्रवाई करती जरूर है, लेकिन प्रतिबंधित मांझा पर पूर्ण रूप से प्रतिबंध नहीं लक पा रहा है।
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