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भागलपुर में कीटनाशकों का जहर जलस्रोतों तक पहुंचा, मछलियों के अस्तित्व पर संकट

LHC0088 1 hour(s) ago views 175
  

प्रस्तुति के लिए इस्तेमाल की गई तस्वीर। (जागरण)



परिमल सिंह, भागलपुर। खेतों में फसलों को कीटों से बचाने के लिए प्रयुक्त रासायनिक कीटनाशक अब पर्यावरण के लिए बड़ा खतरा बनते जा रहे हैं।

बारिश और सिंचाई के पानी के साथ बहकर ये रसायन तालाबों, नदियों और अन्य जलस्रोतों तक पहुंच रहे हैं, जिससे जलीय जीवों के अस्तित्व पर संकट गहराता जा रहा है। तिलकामांझी भागलपुर विश्वविद्यालय (टीएमबीयू) के प्राणी विज्ञान विभाग में किए गए एक शोध में इस तथ्य की वैज्ञानिक पुष्टि हुई है।

शोध में सामने आया है कि कृषि में व्यापक रूप से इस्तेमाल होने वाला कीटनाशक लैम्ब्डा-सायहेलोथ्रिन मीठे पानी की मछलियों के लिए अत्यंत घातक है। यह अध्ययन टीएमबीयू के शोधार्थी गौरव कुमार ने सीनियर असिस्टेंट प्रोफेसर डॉ. नवोदिता प्रियदर्शनी के निर्देशन में किया है। किए गए शोध के परिणाम बेहद ही चिंताजनक है।

अगर समय रहते इस ओर गंभीरता से ध्यान नहीं दिया गया तो आने वाले समय में परिणाम बेहद खराब देखने को मिल सकता है।
बिहपुर और नारायणपुर से एकत्र की गईं मछलियां

अध्ययन के लिए स्थानीय जलाशयों में पाई जाने वाली मछली एनाबस टेस्टुडिनियस (क्लाइम्बिंग पर्च) को चुना गया। मछलियों का संग्रह जिले के बिहपुर और नारायणपुर प्रखंड के कृषि प्रधान क्षेत्रों में स्थित तालाबों से किया गया, जबकि व्यावसायिक ग्रेड का लैम्ब्डा-सायहेलोथ्रिन स्थानीय बाजार से खरीदा गया।
कीटनाशक की बेहद कम मात्रा में भी गंभीर नुकसान

शोध में पाया गया कि कीटनाशक की बेहद कम मात्रा के संपर्क में आने से ही मछलियों में खून की कमी (एनीमिया) होने लगती है। इसके अलावा यकृत समेत अन्य आंतरिक अंगों पर प्रतिकूल असर पड़ता है।

यह रसायन मछलियों की प्रतिरक्षा प्रणाली को कमजोर कर देता है, जिससे वे रोगों की चपेट में जल्दी आ जाती हैं। साथ ही, उनके एंजाइम तंत्र में भी गंभीर बदलाव दर्ज किए गए, जो विकास और जीवन चक्र को बाधित करते हैं।
पूरे जलीय पारिस्थितिकी तंत्र में हो सकता है असंतुलन पैदा

गौरव कुमार के अनुसार, कीटनाशक का प्रभाव उसकी खुराक और संपर्क अवधि के साथ और अधिक गंभीर होता जाता है। लंबे समय तक इसके संपर्क में रहने से मछलियों की मृत्यु दर में वृद्धि भी दर्ज की गई। इसका असर केवल मछलियों तक सीमित नहीं रहता, बल्कि पूरे जलीय पारिस्थितिकी तंत्र में असंतुलन पैदा हो सकता है।

भोजन श्रृंखला के प्रभावित होने से मानव स्वास्थ्य पर भी प्रतिकूल प्रभाव पड़ने की आशंका जताई गई है। इसके अलावा, मछलियों की संख्या घटने से स्थानीय मछुआरों की आजीविका पर भी संकट खड़ा हो सकता है।
अन्य जीव और मानव स्वास्थ्य पर भी असर

शोध में यह भी संकेत मिला है कि यह कीटनाशक जलीय कीटों, परागण करने वाले कीटों जैसे मधुमक्खियों और मिट्टी के लाभकारी जीवों को भी नुकसान पहुंचाता है। मानव स्वास्थ्य पर इसके संभावित दुष्प्रभावों में त्वचा और आंखों में जलन, सांस लेने में तकलीफ, चक्कर आना और सिरदर्द जैसी समस्याएं शामिल हैं।
कीटनाशकों के अंधाधुंध प्रयोग पर रोक की जरूरत

असिस्टेंट प्रोफेसर डॉ. नवोदिता प्रियदर्शनी ने कहा कि कृषि में कीटनाशकों के अंधाधुंध उपयोग पर नियंत्रण आवश्यक है। किसानों को जैविक और पर्यावरण-अनुकूल विकल्पों के प्रति जागरूक करना बेहद जरूरी है।

उन्होंने कहा कि यह अध्ययन न केवल वैज्ञानिक दृष्टि से महत्वपूर्ण है, बल्कि नीति निर्माताओं और किसानों के लिए भी चेतावनी है कि विकास की दौड़ में पर्यावरण संरक्षण की अनदेखी भविष्य के लिए घातक साबित हो सकती है।

भागलपुर के खेतों में फसलों को बचाने के लिए इस्तेमाल हो रहे रासायनिक कीटनाशक अब तालाबों और जलस्रोतों के जरिए जलीय जीवन के लिए खतरा बनते जा रहे हैं। तिलकामांझी भागलपुर विश्वविद्यालय (टीएमबीयू) के प्राणी विज्ञान विभाग में किए गए एक शोध में खुलासा हुआ है कि आम तौर पर प्रयोग होने वाला कीटनाशक लैम्ब्डा-सायहेलोथ्रिन मीठे पानी की मछलियों के स्वास्थ्य और अस्तित्व को गंभीर रूप से प्रभावित कर रहा है।

यह अध्ययन शोधार्थी गौरव कुमार ने सीनियर असिस्टेंट प्रोफेसर डॉ. नवोदिता प्रियदर्शनी के निर्देशन में किया। अध्ययन के लिए स्थानीय जलाशयों में पाई जाने वाली मछली एनाबस टेस्टुडिनियस (क्लाइम्बिंग पर्च) को चुना गया। मछलियों का संग्रह जिले के बिहपुर और नारायणपुर प्रखंड के कृषि प्रधान इलाकों के तालाबों से किया गया, जबकि कीटनाशक स्थानीय बाजार से लिया गया।

शोध में सामने आया कि कीटनाशक की बहुत कम मात्रा के संपर्क में आने से ही मछलियों में खून की कमी, यकृत और अन्य आंतरिक अंगों को नुकसान तथा प्रतिरक्षा प्रणाली में कमजोरी देखी गई। इसके अलावा, मछलियों के एंजाइम तंत्र में बदलाव से उनका सामान्य विकास और जीवन चक्र प्रभावित हुआ।

लंबे समय तक संपर्क में रहने पर मछलियों की मृत्यु दर बढ़ने की बात भी संभावना शोध में दर्ज की गई है। विज्ञानियों का कहना है कि इसका असर केवल मछलियों तक सीमित नहीं रहेगा, बल्कि इससे पूरा जलीय पारिस्थितिकी तंत्र असंतुलित हो सकता है।

भोजन श्रृंखला प्रभावित होने से मानव स्वास्थ्य और स्थानीय मछुआरों की आजीविका पर भी खतरा बढ़ सकता है। शोध में यह भी संकेत मिला है कि यह कीटनाशक जलीय कीटों, परागण करने वाले कीटों और मिट्टी के लाभकारी जीवों को भी नुकसान पहुंचाता है। मानव स्वास्थ्य पर इसके दुष्प्रभाव के रूप में त्वचा व आंखों में जलन, सांस लेने में परेशानी और चक्कर जैसी समस्याएं सामने आ सकती हैं।

डॉ. नवोदिता प्रियदर्शनी ने कृषि में कीटनाशकों के अंधाधुंध प्रयोग पर रोक लगाने की जरूरत बताते हुए कहा कि किसानों को जैविक और पर्यावरण-अनुकूल विकल्पों के प्रति जागरूक किया जाना जरूरी है। उन्होंने कहा कि यह शोध नीति निर्धारकों और किसानों दोनों के लिए चेतावनी है।
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