कड़ाके ठंड में अपनी बारी के लिए जीबी पंत अस्पताल के गेट के बाहर फुटपाथ पर खुले में सोने को मजबूर मरीज व तीमारदार। रात लगभग 11:35 बजे ली गई तस्वीर। हरीश कुमार
जागरण संवाददाता, नई दिल्ली। राष्ट्रीय राजधानी की हाड़ कंपकपाती ठंड में गोविंद बल्लभ पंत अस्पताल के बाहर की स्थितियां दिल्ली की स्वास्थ्य व्यवस्था की कठोर सच्चाई को उजागर करने के काफी है। कड़ाके की ठंड में, देर रात से ही हृदय रोग से पीड़ित मरीज और उनके स्वजन अस्पताल के बाहर फुटपाथ पर बैठकर सुबह होने की प्रतीक्षा करते हैं। यह प्रतिदिन का क्रम है।
किसी ने जमीन पर चादर बिछाई है, कोई पतले कंबल में सिकुड़ा हुआ है, तो कोई ठंड से बचने के लिए दीवार से सटकर बैठा है। उद्देश्य मात्र इतना है कि अगली सुबह कार्डियोलाजी विभाग में दिखाने का नंबर मिल जाए। बताया कि यहां प्रतिदिन 40 नंबर ही मिलते हैं। इसलिए यह सब करना पड़ता है।
दिल्ली सरकार के अधीन आने वाला जीबी पंत अस्पताल देश के प्रमुख सुपर-स्पेशियलिटी अस्पतालों में गिना जाता है। यहां हृदय रोग, न्यूरोलाजी, न्यूरोसर्जरी और गैस्ट्रोएंटेरोलाजी जैसे जटिल रोगों का विशेषज्ञ उपचार होता है। उत्तर भारत के कई राज्यों से गंभीर मरीज भी यहां पहुंचते हैं।
मरीजों की भारी संख्या के कारण ओपीडी और जांच के लिए लंबी प्रतीक्षा यहां आम बात है। जीबी पंत के बाहर फुटपाथ पर बैठे मेरठ के रामनिवास अपने बड़े भाई को दिल की बीमारी के उपचार को बड़ी उम्मीद से यहां आए हैं।
ओपीडी नंबर के लिए रात 11 बजे से फुटपाथ पर बैठ जाते हैं लोग
ठंड से कांपते हुए वे बताते हैं कि ‘सुबह पर्ची मिल सके, इसलिए रात 11 बजे से यहीं बैठे हैं। ठंड बहुत है, लेकिन उपचार की आशा में सब छोटा लगता है।’ पास ही बैठी सुनीता देवी अपने पति के साथ जौनपुर से आई हैं। वह कहती हैं, ‘डाक्टर ने दोबारा दिखाने को कहा था। अगर देर हो गई तो नंबर नहीं मिलेगा, इसलिए पूरी रात यहीं काटनी हैं।’
वहीं दिल्ली के इमरान अली हृदय रोगी अपने वृद्ध पिता को दिखाने के लिए नंबर लेने रात 12 बजे से ही लाइन में लगे हैं। इमरान बताते हैं, ‘अस्पताल अच्छा है, डाक्टर भी अनुभवी हैं, लेकिन इंतजार के लिए माकूल व्यवस्था नहीं है। इसलिए ठंड में खुले में रात बिताना मजबूरी है।’
ये तस्वीरें और बातें किसी एक परिवार की नहीं, बल्कि उन सैकड़ों मरीजों और तीमारदारों की हैं, जो प्रतिदिन जीबी पंत अस्पताल के बाहर अच्छे उपचार की आस में ठंड, अंधेरे और असुविधा से जूझ रहे हैं। यह हालात स्वास्थ्य व्यवस्था के सामने एक अहम सवाल खड़ा कर रहे हैं, क्या अच्छे उपचार तक पहुंच की राह इतनी कठिन और अमानवीय होनी चाहिए। |