NEET-PG Cutoff 2025: अक्सर हमने सुन हैं कि डॉक्टर बनने के लिए खूब पढ़ाई करनी पड़ती है और मुश्किल एग्जाम निकलना पड़ता है। लेकिन केंद्र सरकार और नेशनल बोर्ड ऑफ एग्जामिनेशंस (NBEMS) ने एक ऐसा फैसला लिया है जो इसके बिल्कुल उलट प्रतीत होता है। एंट्रेंस एग्जाम में माइनस में नंबर पाने वाले अभ्यर्थी भी NEET-PG में दाखिला लेने के लिए एलीजिबल है। दरअसल NBEMS ने NEET-PG 2025 के लिए क्वालिफाइंग कट-ऑफ को लगभग खत्म कर दिया है। इस फैसले के बाद अब वे उम्मीदवार भी MD और MS की सीटों के लिए काउंसलिंग में भाग ले सकेंगे, जिनका स्कोर नेगेटिव (-40) तक चला गया है। इस फैसले की सोशल मीडिया पर खूब चर्चा हो रही है।
कट-ऑफ में क्या हुआ बदलाव?
केंद्र सरकार ने मेडिकल कॉलेजों में खाली पड़ी 9,000 से अधिक पीजी सीटों को भरने के उद्देश्य से NEET-PG 2025 के क्वालिफाइंग कट-ऑफ में भारी कमी की है। इस संशोधित नीति के तहत सामान्य/EWS श्रेणी के लिए पर्सेंटाइल को 50th से घटाकर 7th और विकलांग श्रेणी (Gen-PwBD) के लिए 45th से घटाकर 5th कर दिया गया है। सबसे चौंकाने वाला बदलाव SC, ST और OBC श्रेणियों के लिए है, जहां पर्सेंटाइल को 40 से घटाकर सीधे 0 (शून्य) कर दिया गया है, जिसका अर्थ है कि नेगेटिव मार्किंग के कारण अब -40 अंक पाने वाले उम्मीदवार भी काउंसलिंग के लिए पात्र माने जाएंगे। सरकार और NBEMS का तर्क है कि यह कदम रेजिडेंट डॉक्टरों की कमी को दूर करने और देश के कीमती मेडिकल संसाधनों को बर्बाद होने से बचाने के लिए उठाया गया है, हालांकि विशेषज्ञ चिकित्सा शिक्षा के गिरते मानकों को लेकर इसकी तीखी आलोचना कर रहे हैं।
I don’t know how to react on this , but now candidates scoring “Minus - 40”marks are also applicable to get NEET PG seat . In simple language if you have money or specific category then even if you slept in the exam and scored negative markssomeone who topped /worked hard. pic.twitter.com/6O9r1o0NIJ — Dr.Dhruv Chauhan (@DrDhruvchauhan) January 13, 2026
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क्यों लिया गया यह फैसला?
इस कदम के पीछे सरकार और चिकित्सा निकायों के अपने तर्क है। देश में करीब 65,000-70,000 PG सीटें हैं। इस साल हाई कट-ऑफ की वजह से लगभग हर 7 में से 1 सीट खाली रह रही थी। सरकारी अस्पताल रेजिडेंट डॉक्टरों पर निर्भर हैं। सीटें खाली रहने का मतलब है मरीजों की देखभाल पर बुरा असर और मौजूदा डॉक्टरों पर काम का भारी बोझ। इंडियन मेडिकल एसोसिएशन (IMA) ने 12 जनवरी को स्वास्थ्य मंत्री जेपी नड्डा को पत्र लिखकर मांग की थी कि काउंसलिंग के लिए पात्रता बढ़ाई जाए।अधिकारियों का कहना है कि यह परीक्षा केवल \“मेरिट लिस्ट\“ बनाने के लिए है, किसी डॉक्टर की \“योग्यता\“ जांचने के लिए नहीं, क्योंकि वे पहले ही MBBS पास कर चुके हैं।
\“मानकों के साथ हो रहा समझौता\“
इस फैसले ने सोशल मीडिया और मेडिकल जगत में एक नई बहस छेड़ दी है। आलोचकों का मानना है कि यह कदम चिकित्सा शिक्षा की गुणवत्ता को नुकसान पहुंचाएगा। लोगों का तर्क है कि जो डॉक्टर प्रवेश परीक्षा में न्यूनतम अंक भी नहीं ला पा रहे, उन्हें स्पेशलिस्ट (MD/MS) बनाना मरीजों के जीवन के साथ खिलवाड़ हो सकता है। सोशल मीडिया पर विशेषज्ञों ने कहा कि भारत शायद दुनिया का इकलौता देश होगा जहां डॉक्टर बनने के लिए \“शून्य या नेगेटिव\“ योग्यता को भी स्वीकार किया जा रहा है। आलोचकों के अनुसार, सीटों को भरने की जल्दबाजी में योग्यता के साथ ऐसा समझौता खतरनाक साबित हो सकता है।
NBEMS ने दी सफाई
बोर्ड ने स्पष्ट किया है कि, कट-ऑफ कम करने से किसी उम्मीदवार के मूल स्कोर या रैंक में बदलाव नहीं होगा। यह केवल उम्मीदवारों को \“योग्य\“ बनाता है ताकि वे खाली सीटों के लिए होने वाली काउंसलिंग में बैठ सकें। एडमिशन अभी भी रैंक के आधार पर ही होंगे, लेकिन अब काउंसलिंग की कतार में ज्यादा लोग शामिल हो सकेंगे। |
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