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Maidaan Review: रोमांच से भर देगी अजय देवगन की 〷दान✵लगेगा जैसे वाकई चल रहा हो लाइव मैच

deltin55 1 hour(s) ago views 11

Maidaan Review: एक खिलाड़ी की कहानी या फिर एक कोच की अनूठी दास्तान। स्पोर्ट्स ड्रामा फिल्में आमतौर पर आपको जोश और उत्साह से लबरेज कर देती हैं। अमित शर्मा के निर्देशन में बनी फिल्म 'मैदान' आपको वही फील देती है जो आपको 'चक दे इंडिया' और 'एमएस धोनी - द अनटोल्ड स्टोरी' जैसी फिल्मों से आया होगा। अजय देवगन स्टारर यह फिल्म बड़ी खूबसूरती से बनाई गई एक इन डेप्थ बायोग्राफिकल फिल्म है। यह फिल्म 1950 और 1960 के दशक में चल रहे भारत के सुनहरे दौर की कहानी सुनाती है। फिल्म की कहानी कोच सय्यद अब्दुल रहीम के बारे में तफ्सील से बताती है, जिनका जिंदगी में बस एक ही लक्ष्य था... एक विजेता टीम तैयार करना और भारतीय फुटबॉल को दुनिया के नक्शे पर पहचान दिलाना।

फिल्म में आपको दांतों तले उंगलियां चबाने को मजबूर कर देने वाले एक रोमांचक मैच का रीयल फील आता है। फिल्म 'चक दे इंडिया' में शाहरुख खान का वो आखिरी 70 मिनट वाला स्पीच यहां पर अजय देवगन के जोश से भर देने वाले स्पीच से रिप्लेस होता नजर आता है। जब अजय देवगन अपनी टीम में जान फूंकते हुए कहते हैं कि "मैच में उतरना 11 लेकिन दिखना एक"। एक और सीन है जिसमें अजय देवगन फाइनल मैच से पहले स्टेडियम विजिट करने पहुंचते हैं। पानी की बौछारों के पीछे अजय देवगन का चेहरा यहां भी आपको 'चक दे इंडिया' की याद दिला जाएगा। बावजूद इसके कि आप इस फिल्म की तुलना बाकी स्पोर्ट्स ड्रामा फिल्मों से करते रहते हैं, आपको शायद ही कहीं पर इस फिल्म से कोई शिकायत करने का मौका मिलता है।

साल 1983 में भारतीय क्रिकेट टीम की पहली वर्ल्ड कप जीत पर आधारित फिल्म 83 भले ही बहुत शानदार अभिनय और कमाल के प्रोस्थैटिक्स के साथ बनाई गई, लेकिन उस फिल्म में कुछ जगहों पर आपको स्टोरीटेलिंग में गहराई की कमी मालूम देती है। अच्छी बात यह है कि 'मैदान' के साथ कहीं पर ऐसा कुछ भी नजर नहीं आता। पिछली फिल्मों से सीख लेते हुए फिल्म को इस तरह रचा गया है कि आपको इसके 3 घंटे 1 मिनट के रन टाइम से कोई शिकायत नहीं रहती। अमित शर्मा ने हड़बड़ी किए बगैर हर किरदार को इसका वक्त दिया है।



यह फिल्म कोच रहीम के भारतीय फुटबॉल में योगदान की कहानी सुनाती है। साल 1952 में फिनलैंड में आयोजित समर ओलंपिक्स में शर्मनाक हार के बाद सय्यद अब्दुल रहीम भारतीय फुटबॉल को ओलंपिक्स और एशियन गेम्स में जिताने की जिद लेकर लौटते हैं। वो फेडरेशन से अपील करते हैं कि वो उन्हें उनकी टीम चुनने की इजाजत दें। देश का हर गली-कूचा भटकने के के बाद रहीम बेस्ट लड़के चुनकर लाते हैं और उन्हें खुद ट्रेनिंग देते हैं। उनका फोकस लेगवर्क के साथ-साथ टीमवर्क पर भी है। रहीम की गाइडेंस में टीम 'Brazil of Asia' और 'Team of comebacks' जीतती है। हमें रहीम की जिंदगी एक समर्पित कोच और फैमिली मैन के तौर पर दिखाई पड़ती है।

सिस्टम के भीतर चल रही पॉलिटिक्स और मीडिया में बार-बार भारतीय फुटबॉल को जलील किए जाने के बावजूद रहीम हथियार नहीं डालने का फैसला करता है और अपनी लड़ाई जारी रखता है। प्रोफेशनल और पर्सनल फ्रंट पर मुश्किलें आने और ठोकरें लगने के बावजूद वह अड़ा रहता है और दोगुनी ऊर्जा के साथ वापसी करता है। फिल्म 'मैदान' रहीम की जीत और उसकी हार को बराबरी से दिखाती है। फिल्म दिखाती है कि उन्होंने किन चुनौतियों का सामना किया और किन मुश्किलों से गुजरकर भारत को वो खिताब दिलाया जिसकी तब उसे बहुत ज्यादा जरूरत थी। इस किरदार में इतने ज्यादा इमोशन्स डाले गए हैं कि कई बार आंखें नम होने से नहीं रोक पाते हैं।
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