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इस्लाम से पहले का ईरान, क्रांति और विरोध का लंबा इतिहास... शाह से खामेनेई तक कितना बदल गया देश, क्या है कहानी?

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इतिहास के उसी मोड़ पर खड़ा ईरान। (फाइल फोटो)



डिजिटल डेस्क, नई दिल्ली। बढ़ती महंगाई और बेरोजगारी से त्रस्त ईरान की जनता सड़कों पर उतर चुकी है। इंटरनेट बंद है टेलीफोन की लाइनें काट गईं, जिससे ईरान दुनिया से कट गया है। प्रदर्शनकारियों पर गोलियां चलाई जा रहीं। इस गुस्से की वजह है सत्ता पर बैठी वही व्यवस्था जो कभी क्रांति की उपज थी।

ईरान का इतिहास जटिल रहा है, जिसमें विरोधी अपनी सत्ता जमाने की कोशिश करते रहे हैं। ये देश आज फिर एक बार इतिहास के उसी मोड़ पर खड़ा है, जहां से 47 साल पहले सत्ता का तख्तापलट हुआ था। 1979 में ईरान में हुई इस्लामिक क्रांति ने सदियों पुरानी राजशाही को उखाड़ फेंका था। इसने मोहम्मद रजा शाह पहलवी की पश्चिमी समर्थक राजशाही को गिरा दिया था।
इस्लाम से पहले ईरान का इतिहास

ईरान की सीमा हर काल में घटती बढ़ती रही। आज का ईरान प्राचीन काल के ईरान से बहुत अलग है। ईरान की पहचान पहले पारस्य देश के रूप में थी। उससे पहले यह आर्याना कहलाता था। प्राचीनकाल में पारस देश आर्यों की एक शाखा का निवास स्‍थान था। वैदिक युग में तो पारस से लेकर गंगा, सरयू के किनारे तक की सारी भूमि आर्य भूमि थी, जो अनेक प्रदेशों में विभक्त थी। प्राचीन पारस में आधुनिक अफगानिस्तान से लगा हुआ पूर्वी प्रदेश \“अरियान\“ वा \“एर्यान\“ (यूनानी एरियाना) कहलाता था जिससे बाद में \“ईरान\“ शब्द बना।

इस्लाम के पूर्व ईरान का राजधर्म पारसी धर्म था। इस्लाम की उत्पत्ति के पूर्व प्राचीन ईरान में जरथुष्ट्र धर्म का प्रचलन था। 7वीं शताब्दी में तुर्कों और अरबों ने ईरान पर बर्बर आक्रमण किया और कत्लेआम की इंतहा कर दी। \“सॅसेनियन\“ साम्राज्य के पतन के बाद मुस्लिम आक्रमणकारियों द्वारा सताए जाने से बचने के लिए पारसी लोग अपना देश छोड़कर भागने लगे।

ईरान अकेला मुल्क है जहां शिया राष्ट्रीय धर्म है। इसके अलावा इराक और बहरीन में शिया बहुमत में हैं। धार्मिक मतभेद के कारण सऊदी अरब और ईरान के बीच वैचारिक टकराव है। सऊदी अरब के सबसे बड़े धर्म गुरु मुफ्ती अब्दुल अजीज अल-शेख के अनुसार ईरानी लोग मुस्लिम नहीं हैं। अब्दुल-अजीज सऊदी किंग द्वारा स्थापित इस्लामिक ऑर्गेनाइजेशन के चीफ हैं। उन्होंने कहा कि ईरानी लोग \“जोरोस्त्रियन\“ यानी पारसी धर्म के अनुयायी रहे हैं।

उन्होंने कहा था, \“हम लोगों को समझना चाहिए कि ईरानी लोग मुस्लिम नहीं हैं क्योंकि वे मेजाय (पारसी) के बच्चे हैं।\“ इनकी मुस्लिमों और खासकर सुन्नियों से पुरानी दुश्मनी रही है। सऊदी अरब वाले अब भी खुद को वास्तविक मुसलमान मानते हैं। उन्हें लगता है कि ईरानी लोग पारसी से मुस्लिम बने हैं। ईरानियों ने हमेशा अरबों या मुसलमानों से शत्रुता रखी थी।
शाह का तख्तापलट

ईरान में 2,500 साल पुराना राजशाही शासन का लंबा इतिहास था। आखिरी शाह मोहम्मद रजा पहलवी राजवंश के मुखिया थे, जो 1925 में सत्ता में आए थे। 1953 में लोकतांत्रिक रूप से चुने गए प्रधानमंत्री मोहम्मद मोसादेग के कट्टर राष्ट्रवादी और सुधारवादी विचारों के कारण शाह को देश छोड़कर जाना पड़ा। जल्द ही सीआईए द्वारा करवाए गए तख्तापलट के जरिए उन्हें वापस गद्दी पर बिठा दिया गया।

अपने सभी राष्ट्रवादी, पश्चिमी समर्थक और आधुनिकीकरण के प्रयासों के बावजूद, शाह उस अपमान से छुटकारा नहीं पा सके कि उन्हें एक विदेशी शक्ति की मदद से दोबारा गद्दी पर बिठाया गया था। शाह के धार्मिक और राजनीतिक विरोधी अयातुल्ला रुहोल्लाह खुमैनी के नेतृत्व वाला शिया मौलवी समूह (रूहानियत) सबसे ज्यादा संगठित और क्रांति को नेतृत्व देने में सक्षम साबित हुआ।

खुमैनी 1960 के दशक की शुरुआत से ही निर्वासन में थे (पहले इराक में और बाद में फ्रांस में) फिर भी उनका और उनके समर्थकों का आबादी पर खासकर पारंपरिक ग्रामीण इलाकों में काफी प्रभाव था। 1979 में खुमैनी की क्रांति रंग लाई और नया सिस्टम लागू हुआ। शाह का तख्तापलट हुआ और अयातुल्ला रूहोल्लाह खुमैनी ईरान के पहले सुप्रीम लीडर बने। इसके बाद खुमैनी ने ईरान में एक नया सिद्धांत लागू किया।

राजशाही को खत्म कर दिया गया और ईरान को एक मौलवी-प्रधान इस्लामिक रिपब्लिक में बदल दिया, जिसका रुख अमेरिका और इजरायल के खिलाफ था। उस समय अली खामेनेई खुमैनी के करीबी अनुयायी थे। क्रांति में सक्रिय रोल निभा चुके थे। पश्चिम विरोधी कट्टर लाइन के समर्थक थे। खुमैनी उन्हें राजनीतिक रूप से भरोसेमंद चेहरा मानते थे।

1981 में खामेनेई खुमैनी के समर्थन से राष्ट्रपति बनते हैं। खुमैनी की मौत 1989 में हो गई, जिसके बाद ईरान की सत्ता ने फिर एक बार करवट ली। अब सवाल ये था कि ईरान का सुप्रीम लीडर कौन बनेगा? हालांकि संविधान में संशोधन किया गया और सुप्रीम लीडर के लिए शर्तों में बदलाव किया गया। फिर खामेनेई को अयातुल्ला की उपाधि दी गई और उन्हें सुप्रीम लीडर चुन लिया गया।
अब फिर उसी मोड़ पर खड़ा ईरान

ईरान में फिर से क्रांति हो रही है। सैकड़ों शहरों में प्रदर्शन हो रहे हैं। ऐसे में सवाल उठता है कि क्या सच में लोग राजशाही चाहते हैं या फिर मौजदूा शासन से तंग आ चुके हैं। जानकारों का मानना है कि शाह के वंशज पहलवी ने अपनी पहचान मजबूत तो की है लेकिन वह सर्वमान्य नेता नहीं हैं।

इस बीच खामेनेई को यह डर सता रहा है कि कहीं इतिहास अपने आप को फिर से न दोहराए। बोल रहे हैं कि ट्रंप को खुश करने के लिए देश को बर्बाद मत करो। जिस व्यवस्था ने शाह को उखाड़ फेंका, आज वही फिर ईरानियों के गुस्से का केंद्र बन चुकी है।

यह भी पढ़ें: ईरान में लोग क्यों कर रहे हैं विरोध प्रदर्शन और सरकार के लिए क्या हैं इसके मायने?
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