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6 टन सोना और हवा में लटकता शिवलिंग! क्या था सोमनाथ का वो रहस्य, जिसे देख गजनवी भी रह गया था दंग?

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सोमनाथ मंदिर: विनाश पर विश्वास की विजय, 1000 साल बाद 8 जनवरी से 11 जनवरी के बाीच \“सोमनाथ स्वाभिमान पर्व\“ मनाया जा रहा है। ग्राफिक्‍स- अमन सिंंह



डिजिटल डेस्‍क, नई दिल्‍ली।

यत्र गंगा च यमुना। यत्र प्राची सरस्वती।
यत्र सोमेश्वरो देवः तत्र माममृतं कृधी।
इन्द्रायेन्दो परिस्त्रव॥

अर्थात.. जहां गंगा और यमुना की धाराएं बहती हैं, जहां अदृश्‍य रूप से सरस्वती का प्रवाह आज भी चेतना को स्पर्श करता है और जहां स्वयं देवों के देव महादेव (स्वामी सोमेश्वर) विराजमान हैं- वह स्थान केवल एक तीर्थ नहीं, बल्कि भारतीय आत्मा का आद्य केंद्र है। हे प्रभु! इस पवित्र स्थान पर अमृत्‍व प्रदान करें।

इस श्‍लोक के मायने अत्यंत गहरे और दूरगामी हैं। यह श्‍लोक इस बात का भी सबूत है कि सोमनाथ मंदिर मानव इतिहास, लिखित स्मृतियों और सत्ता-परिवर्तनों से भी पहले से उस पवित्र भूमि पर विद्यमान रहा है, जिसका उल्लेख इसमें किया गया है।

आज हम मंदिर पर हुए उस पहले आक्रमण की 1000वीं स्‍मृति को याद कर रहे हैं, जब आक्रांता महमूद गजनवी ने सोमनाथ मंदिर को ध्वस्त कर दिया था। छह टन से जयादा सोना लूटकर ले गया था। श्‍लोक याद दिलाता है- 1000 साल पहले महमूद ने मंदिर तबाह किया। इसके बाद कई और विदेशी आक्रमणकारियों ने मंदिर खंडहर में बदला। इसके बावजूद आस्‍था टूटी नहीं।

समुद्र की लहरों के साथ सांस लेता, समय की मार सहकर भी अडिग खड़ा सोमनाथ मंदिर आज भी आस्था का वह शाश्वत केंद्र है, जहां विनाश पराजित हुआ और विश्वास विजयी रहा। यह मंदिर केवल एक संरचना नहीं, बल्कि हजारों वर्षों के संघर्ष, स्वाभिमान और पुनर्जन्म की जीवित कथा है। यह पत्‍थर और गारे से नहीं, श्रद्धा, विश्वास और संकल्प से मजबूत व झगमग है।
सोमनाथ स्वाभिमान पर्व: 11 जनवरी को पीएम मोदी जाएंगे

प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी 11 जनवरी को गुजरात स्थित सोमनाथ मंदिर में आयोजित \“सोमनाथ स्वाभिमान पर्व एवं समारोह\“ में भाग लेने जा रहे हैं। जहां मदिर परिसर में तैयारियां अंतिम चरण में है तो दूसरी ओर देश भर में सोमनाथ की अखंडता, आत्मसम्मान, आस्था और संघर्ष की गौरवगाथा एक बार फिर चर्चा के केंद्र में है।

सोमनाथ स्वाभिमान पर्व एवं समारोह सिर्फ धार्मिक आयोजन नहीं है। यह उस राष्ट्रीय आत्मगौरव का उत्सव है, जिसने बार-बार ध्‍वस्‍त होने के बावजूद भी हार मानने से इनकार किया। सोमनाथ की पुनर्स्थापना केवल एक मंदिर का पुनर्निर्माण नहीं, बल्कि भारत की सांस्कृतिक चेतना के पुनर्जागरण का प्रतीक रही है।

सोमनाथ मंदिर के इतिहास को लेकर आपके जेहन में भी कुछ सवाल कौंधते होंगे, जैसे- महमूद गजनवी कौन था और उसने सोमनाथ मंदिर पर आक्रमण क्‍यों किया, क्‍या महमूद के बाद भी किसी ने आक्रमण किया, मंदिर के आधुनिक पुनर्निर्माण का संकल्प किसने लिया, मंदिर में प्राण-प्रतिष्ठा किसने कराई और सबसे जरूरी कि आखिर सोमनाथ मंदिर के निर्माण को लेकर पंडित नेहरू असहज क्यों थे? इस मंदिर से जुड़ी पौराणिक मान्यताएं, चंद्र देव की कथा और शिव का ज्योतिर्लिंग स्वरूप क्‍या है? सभी सवालों के जवाब यहां बता रही हूं, पढ़ें..


महमूद गजनवी कौन था?

गजनी के बादशाह सुबुक तिगीन का साल 997 में निधन हुआ तो बड़ा बेटा महमूद गद्दी पर बैठा। जबकि वह न गद्दी के लिए पिता सुबुक तिगीन की पसंद था और न उसे उत्तराधिकारी चुना था। सुबुक तिगीन ने अपने छोटे बेटे इस्माइल को अपना उत्तराधिकारी चुना था, लेकिन उनकी मौत के बाद गद्दी का फैसला तलवार से हुआ था, पिता की इच्‍छा से नहीं।

जब पिता की मौत हुई थी, तब महमूद खुरासान में था। उसने वहां से अपने छोटे भाई इस्माइल को एक चिट्ठी भेजी कि अगर वह महमूद के लिए गद्दी छोड़ता है तो इसके एवज में बल्‍ख और खुरासान का गर्वनर बन सकता है।

जब छोटे भाई ने प्रस्‍ताव ठुकरा दिया तो महमूद ने अपनी सेना के साथ गजनी पर आक्रमण किया। जंग में छोटे भाई इस्‍माइल को हराकर कैद में डाल दिया और खुद 27 साल की उम्र में गजनी की गद्दी संभाल ली।

बता दें कि खुरासान यानी नॉथ-ईस्‍ट ईरान, ज्‍यादातर अफगानिस्‍तान और कुछ हिस्‍से तुर्कमेनिस्तान, उज्‍बेकिस्‍तान और ताजिकिस्तान में हैं।

  

फोटो- महमूद गजनवी
हिंदू मंदिरों पर ही आक्रमण क्‍यों करता था गजनवी?

अब्राहम इराली की किताब \“द एज ऑफ रॉथ\“ के मुताबिक, भारत के हिंदू मंदिरों में अपार धन हुआ करता था। ऐसे में मंदिरों का विध्‍वंस करना महमूद गजनवी में एक ओर जहां धार्मिक जोश भरता था तो दूसरी ओर आपार दौलत भी मिलती।

कई बार तो इतना बड़ा खजाना मिल जाता था, जिसकी उसने अपनी जिंदगी में कभी कल्‍पना तक नहीं की थी। लूटपाट के अलावा बड़ी संख्‍या में भारतीय महिलाओं-पुरुषों और बच्‍चों को गुलाम बनाकर अपने साथ ले जाता था। फिर अपने यहां उनसे न सिर्फ गुलामी कराता, बल्कि गुलामों के व्‍यापारियों को बेचता भी था। यही वजह है कि महमूद गजनी ने अपने 32 साल के शासन में भारत पर 17 हमले किए।
महमूद गजनवी ने कहां-कहां मंदिर तोड़े?

गजनी की गद्दी संभालने के बाद से साल 1024 तक महमूद ने मुल्‍तान, पंजाब, गांधार, नगरकोट, कन्नौज, बुलंदशहर, मथुरा, कालिंजर, ग्वालियर, सिंध की रियासतों और मंदिरों में लूटपाट व मारकाट कर चुका था। अभी सोमनाथ मंदिर उसकी पहुंच से दूर रहा था।
कैसा था सोमनाथ मंदिर?
मशहूर यात्री अल-बरूनी ने सोमनाथ के बारे में लिखा था-

\“सोमनाथ मंदिर का निर्माण महमूद के हमले से कोई सौ साल पहले हुआ था। यह किलेनुमा इमारत के भीरत पत्‍थर से बना बेहद भव्‍य और जीवंत था। किलानुमा इमारत तीनों ओर से समुद्र से इस कदर घिरी थी कि देखने वालों को लगता था जैसे- समुद्र इसकी पहरेदारी कर रहा हो।

हिंदुओं के लिए इस मंदिर का स्‍थान बहुत ऊंचा था। मंदिर में शिव की मुख्‍य मूर्ति शिव (शिवलिंग) की थी। यह कोई साधारण मूर्ति नहीं थी। शिवलिंग (बिना किसी सहारे) जमीन से दो मीटर की ऊंचाई पर रखा था। उसके अगल-बगल में सोने और चांदी से बनी कुछ और मूर्तियां स्‍थापित थीं।\“

  
मशहूर इतिहासकार जकरिया अल काजविनी ने लिखा-

सोमनाथ की मूर्ति (शिवलिंग) मंदिर के बीचों-बीच रखी थी। चंद्र ग्रहण के वक्‍त यहां लाखों की संख्‍या में हिंदू तीर्थयात्री आया करते थे। यह बेहद समृद्ध और संपन्‍न मंदिर था। जहां शताब्दियों से खजाने जमा था। हर दिन मंदिर से 1200 किलोमीटर दूर से गंगाजल लाया जाता था, जिससे सोमनाथ का जलाभिषेक किया जाता था।

मंदिर की पूजा और तीर्थयात्रियों की सेवा के लिए 1000 से ज्‍यादा ब्राह्मण थे। मंदिर के मुख्‍य द्वार पर 500 से ज्‍यादा महिलाएं भजन-कीर्तन करतीं, भक्तिमय संगीत की धुन पर थिरकती रहती थीं।
रॉयल एशियाटिक सोसाइटी में छपे मोहम्मद नाजिम के लेख -

\“सोमनाथ एंड द कॉनक्वेस्ट बाई सुल्तान महमूद\“ (Somnath and the Conquest by Sultan Mahmud) के मुताबिक, सोमनाथ मंदिर की छत पिरामिड शेप में बनी थी। 13 मंजिला ऊंचे इस मंदिर का शिखर सोने से बने थे। फर्श सागवान की लकड़ी से बनाया गया था।
सोमनाथ मंदिर पर आक्रमण कब और क्‍यों किया?

मनाथ मंदिर की भव्‍यता, दिव्‍यता, मान्‍यता और अमीरी की खबर महमूद के कानों तक भी पहुंच गई। फिर क्‍या था- महमूद गजनवी अपने सबसे बड़े लूटपाट अभियान के लिए अक्‍टूबर, 1024 में 30 हजार घुड़सवार सैनिकों के साथ रवाना हुआ था। लूट के लालट में रास्‍ते में उसके साथ और भी लुटेरे जुड़ते गए थे।

महमूद गजनवी पहले मुल्‍तान पहुंचा। फिर वहां से राजस्‍थान के रेगिस्‍तान को पार करते हुए गुजरात पहुंचा था। उसके साथ सैकड़ों की संख्‍या में ऊंट भी थे, जिनकी पीठ पर खाने-पीने का सामान लदा था। सैनिकों के पास हथियारों के अलावा कुछ दिनों की रसद भी थी।

महमूद अपने पूरे लाव लश्कर के साथ 6 जनवरी 1026 को सोमनाथ के तट पर पहुंचा। वहां उसने समुद्र तट पर एक बेहद मजबूत किला देखा। किले की प्राचीर की रक्षा में ज्‍यादातर ब्राह्मण और उत्साही भक्त तैनात थे।

  
महमूद की सेना का पुजारियों ने किया डटकर मुकाबला

मुहम्‍मद नाजिम अपनी किताब \“द लाइफ एंड टाइम्‍स ऑफ सुल्‍तान महमूद ऑफ गजना\“ (The Life And Times Of Sultan Mahmud Of Ghazna) में लिखते हैं -

\“महमूद ने सोमनाथ के किले को चारों ओर से घेर लिया। पहले दिन ब्राह्मणों और शिवभक्‍तों ने पूरे साहस से महमूद की सेना का डटकर मुकाबला किया। अगली सुबह यानी 7 जनवरी (शुक्रवार का दिन था) को महमूद की सेना ने तीरों की इतनी घातक बौछार की कि ब्राह्मणों और शिवभक्‍तों को अपनी चौकियां छोड़ने के लिए मजबूर होना पड़ा।

जुमे की नमाज का वक्‍त हुआ। महमूद की सेना ने किले की प्राचीर पर चढ़कर अजान दी। साथ ही जीत का एलान भी किया। हिंदू मंदिर में घुस गए। शिवलिंग के सामने विजय की प्रार्थना की। थोड़ी देर बाद बाहर आए और ऐसा पलटवार किया कि महमूद और उसकी सेना को पीछे हटना पड़ा। शाम होते-होते हिंदुओ ने फिर से किले की प्रचीर कब्‍जा पा लिया था।

8 जनवरी की सुबह.. महमूद की सेना लौटी। सैनिकों की संख्‍या के सामने सोमनाथ में मुट्टी भर लोग ही थे। सैनिक रस्सियों की सीढ़ियां बनाकर किले की प्राचीर पर चढ़ गए। अंदर घुसकर मार-काट मचा दी। 70 हजार से ज्‍यादा स्‍थानीय लोग, पुजारी और शिवभक्‍तों को मार डाला।

इसके बाद महमूद मंदिर में घुसा। मंदिर लकड़ी के 56 खंभो पर टिका था। पर स्थापत्य कला का सबसे बड़ा आश्चर्य यह था मंदिर की मुख्य मूर्ति बिना किसी सहारे के हवा में लटकी हुई थी। यह देखकर महमूद गजनवी कुछ देर के लिए हैरत में पड़ गया।

फिर उसने नफरत से शिवलिंग को विकृत किया। अन्‍य मूर्तिया उखाड़ फेंकी। मूर्तियां उखाड़ीं तो उनके नीचे एक खाली स्‍थान मिला, जो बेशकीमती रत्‍नों से भरा था। मंदिर के खजाने को देखकर वह बावला हो गया।


कितना सोना साथ लेकर गया था गजनवी?

मुहम्‍मद नाजिम आगे लिखते हैं-

महमूद गजनवी ने 40 मन सोने (1600 किलो) की जंजीर तोड़ डाली, जिस पर महाघंट लटकता था। मंदिर की दीवारों-छतों, किवाड़ों और चौखट से सोने-चांदी के पत्तर छुड़ाए। इस पर संतोष नहीं मिला तो गुप्‍तकोष की तलाश में पूरा गर्भगृह खुदवा डाला। सोना-चांदी और रत्‍न इकट्ठा करने के बाद मंदिर में आग लगा दी।

सोमनाथ मंदिर से महमूद को छह टन (60 क्विंटल) सोना हाथ लगा था। उसने 15 दिन सोमनाथ में ही बिताए। इसके बाद लूटे धन के साथ गजनी के लिए रवाना हो गया। भारतीय इतिहास में साल 1026 के जनवरी जिक्र बेहद दुखद यादों के तौर होता है।

बताया जाता है कि 1026 में सोमनाथ मंदिर लूट के बाद मजमूद जब गजनी पहुंचा तो उसे रास्‍ते बेहद परेशानियों का सामना करना पड़ा। गजनी पहुंचते ही उसे गंभीर बीमारी हो गई। दो वर्ष तक बीमारी से जूझता रहा। आखिर में अप्रैल 1030 में उसकी मौत हो गई।
महमूद ने तोड़ा तो राजा भीम प्रथम ने बनवाया

महमूद को मंदिर विध्‍वंस करने के बाद चालुक्य वंश के राजा भीम प्रथम ने सोमनाथ मंदिर के पुनर्निर्माण का पहला प्रयास किया था। लेखिका स्वाति बिष्ट ने अपनी किताब सोमनाथ टेंपल विटनेस टु टाइम एंड ट्रायंफ (Somnath Temple Witness to Time and Triumph) में इसका जिक्र किया।

स्वाति बिष्ट ने लिखा-


सोमनाथ मंदिर एक बार फिर राख से फीनिक्‍स पक्षी की तरह उठ खड़ा हुआ। फिर से ज्योतिर्लिंग की स्‍थापना। मूर्तियों में प्राण प्रतिष्‍ठा की गई।  

  

सोमनाथ मंदिर को महमूद के बाद किसने तोड़ा?

  • 1299 : महमूद गजनवी आक्रमण के 272 साल बाद दिल्ली सल्तनत के सुल्तान अलाउद्दीन खिलजी सेनापति उलुग खान और नुसरत खान ने सोमनाथ मंदिर को ध्‍वस्‍त किया था और भारी लूटपाट की थी।
  • 1395 : दिल्ली सल्तनत का सूबेदार जफर खान उर्फ मुजफ्फर शाह प्रथम (जो बाद में स्वतंत्र सुल्तान बना) ने मंदिर आक्रमण किया। मंदिर तोड़ा, खजाना लूटा और उसी जगह पर एक मस्जिद का निर्माण कराने का प्रयास किया।
  • 1412 : जफर खान के पोते और अहमदाबाद शहर के संस्थापक अहमद शाह ने भी सोमनाथ पर हमला किया और मंदिर को भारी नुकसान पहुंचाया।
  • 1469 : गुजरात के सुल्तान महमूद बेगड़ा ने जूनागढ़-सोमनाथ पर आक्रमण किया और जीत भी गया। मंदिर को अपवित्र किया और पूरी तरह बर्बाद कर दिया। पूजा पर रोक लगा दी।
  • 1665-1706 : सोमनाथ मंदिर पर अंतिम बड़ा हमला औरंगजेब के शासनकाल में हुआ। 1665 में मंदिर को जमींदोज करने का आदेश दिया, लेकिन हिंदू पूजा करते रहे।
  • 1706: औरंगजेब ने आदेश दिया- मंदिर को इस तरह बर्बाद करो कि वहां फिर कभी पूजा न हो पाए। उसने मंदिर को मस्जिद में तब्दील करने की भी कोशिश की थी।


11वीं से 18वीं शताब्‍दी के बीच कई विदेशी आक्रमणकारियों सोमनाथ मंदिर को तोड़ा, जलाया और खंडहर किया, लेकिन आस्‍था की लौ निरंतर जलती रही और मंदिर का पुनर्निर्माण हुआ।
आजादी के बाद किसने कराया मंदिर का जीर्णोद्धार?

आजादी के बाद देश के पहले उप प्रधानमंत्री सरदार वल्लभभाई पटेल ने नए सिरे से सोमनाथ मंदिर को बनाने की मुहिम चलाई थी। सरदार पटेल आजादी के तीन महीने के भीतर सोमनाथ गए।

  
सरदार ने लोगों को संबोधित करते हुए कहा,


आक्रमणकारियों ने सोमनाथ का बहुत अपमान किया है, लेकिन यह अपमान बीते दिनों की बात हो गई। अब समय आ गया है कि सोमनाथ पुराने वैभव को फिर से स्‍थापित किया जाए। अब यह सिर्फ पूजा का मंदिर नहीं रह गया, बल्कि संस्‍कृति और हमारी एकता का प्रतीक बनकर उभरेगा।\“


हालांकि, मंदिर का निर्माण पूरा होने से पहले ही 15 दिसंबर, 1950 सरदार पटेल का निधन हो गया। इसके बाद मंदिर निर्माण की जिम्‍मेदारी कन्हैयालाल माणिकलाल मुंशी ने संभाली थी।
सोमनाथ मंदिर को लेकर पंडित नेहरू असहज क्यों थे?

देश के पहले प्रधानमंत्री पंडित जवाहरलाल नेहरू(पूर्व पीएम) ने 2 मई, 1951 को सभी राज्‍यों के मुख्‍यमंत्रियों को एक पत्र लिखा था। कहा था- आपने सोमनाथ मंदिर के उद्घाटन को लेकर खबरें पढ़ी होंगी। हम स्‍पष्‍ट कर देते हैं कि यह कोई सरकारी समारोह नहीं है। भारत सरकार का इससे कोई लेना-देना नहीं है।

  

  
नेहरू ने राष्‍ट्रपति डॉ. राजेंद्र प्रसाद को कहा था-


\“आप एक धर्मनिरपेक्ष देश के राष्‍ट्रपति हैं। इस नाते आपको आपको धार्मिक पुनरुत्थानवाद के साथ खुद को नहीं जोड़ना चाहिए।\“


नेहरू के अलावा, उप राष्ट्रपति डॉक्टर राधाकृष्णन और भारत के गवर्नर जनरल रह चुके राजगोपालाचारी ने भी राष्ट्रपति डॉ. राजेंद्र का मंदिर उद्घाटन समारोह में शामिल होने का विरोध किया था।
नेहरू के मना करने पर भी राष्ट्रपति ने किया उद्घाटन

खैर, मंदिर बना। देश के पहले राष्ट्रपति डॉक्टर राजेंद्र प्रसाद ने 11 मई, 1951 को मंदिर का उद्घाटन किया था। कहा जाता है कि राष्ट्रपति डॉ. राजेंद्र प्रसाद सोमनाथ मंदिर के उद्घाटन में पंडित नेहरू की सलाह को दरकिनार कर पहुंचे थे।

यह भी पढ़ें- क्या है सोमनाथ मंदिर का नेहरू कनेक्शन? PM मोदी के स्वाभिमान पर्व से फिर चर्चा में; 1000 साल का इतिहास

Source:

  • गुजराज पर्यटन की आधिकारिक वेबसाइट
  • सोमनाथ ट्रस्‍ट की आधिकारिक वेबसाइट
  • इतिहासकार अब्राहम इराली की किताब \“द एज ऑफ रॉथ\“
  • मशहूर यात्री अल-बरूनी की किताब
  • मुहम्‍मद नाजिम की किताब \“द लाइफ एंड टाइम्‍स ऑफ सुल्‍तान महमूद ऑफ गजना\“
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