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डिजिटल क्रांति से देवरिया की महिलाएं बनीं आत्मनिर्भर, बदल रही हैं समाज की तस्वीर

Chikheang 2026-1-7 12:56:40 views 1079
  

बाएं से जूली और वंशिका। जागरण  



सुधांशु त्रिपाठी, देवरिया। अब डिजिटल इंडिया है, यह न्यू इंडिया है। देवरिया की वंशिका व जूली हों, या मंशा, सीमा व राममिस्त्री...। आत्मनिर्भर व सशक्त भारत के सपने को जमीन उतारने के लिए नवाचार कर रही ये महिलाएं व युवतियां डिजिटल की दुनिया में एक नई पहचान बना रही हैं।

किसी ने पुरुषों के दबदबा वाले फोटोग्राफी वाले पेशे में कदम बढ़ाया है तो किसी ने डिजिटल लाइब्रेरी खोलकर व डिजिटल से जुड़कर खुद का काम शुरू किया। इन महिलाओं ने डिजिटल सशक्तीकरण के माध्यम न केवल परिवार व समाज का नजरिया बदला, बल्कि आत्मनिर्भर होकर खुद का निर्णय लेने में सक्षम बनी हैं। जागृति ने इनकी राह आसान करने में अहम भूमिका निभाई है।

फोटोग्राफी पेशे में आगे बढ़ रही वंशिका व जूली
शहर की रहने वाली वंशिका व जूली इसी बदलाव की तस्वीर हैं। फोटोग्राफी जैसे पेशे में अपनी पहचान बनाई है। इंटरनेट मीडिया पर तस्वीरें साझा करने का शौक ने उन्हें रास्ता दिखाया। शादी-ब्याह व सामाजिक कार्यक्रमों की नियमित फोटोग्राफर बन चुकी हैं।

जूली बताती हैं कि पूर्वांचल में महिला फोटोग्राफर की कमी है व यही उनकी सबसे बड़ी ताकत बन गई। खासकर विवाह समारोहों में दुल्हन की फोटोग्राफी के लिए महिलाएं महिला फोटोग्राफर के साथ अधिक सहज महसूस करती हैं। इन दोनों की कहानी सिर्फ एक पेशे की नहीं, बल्कि उस भरोसे की भी है, जो परिवार और समाज ने धीरे-धीरे देना शुरू किया। शहर से करीब 21 किलोमीटर दूर खिरसर गांव की मंशा यादव की कहानी डिजिटल तकनीक को शिक्षा से जोड़ती है।

  

मंशा यादव, संचालक,डिजिटल लाइब्रेरी

  

पढ़ाई के लिए छह किलोमीटर दूर लाइब्रेरी जाना उनके लिए रोज़ की चुनौती था। मौसम, साधन और समय तीनों अक्सर आड़े आ जाते थे। इसी अनुभव से गांव में ही डिजिटल लाइब्रेरी खोलने का विचार जन्मा। आज उस लाइब्रेरी में आसपास के गांवों के छात्र-छात्राएं पढ़ाई कर रहे हैं। मंशा के लिए यह केवल स्वरोजगार नहीं, बल्कि गांव में शिक्षा की बाधाओं को दूर करने की एक कोशिश है।

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इंटरनेट को बनाया डिजाइनर

हरपुर कला गांव की राममित्री की जिंदगी में संघर्ष ने आगे बढ़ने में मदद की। कम उम्र में शादी, फिर पति का साथ छूट जाना व एक बच्चे की जिम्मेदारी। इन सबके बीच सिलाई ही उनका सहारा बनी। डिजिटल से जुड़ने के बाद उन्होंने इंटरनेट को अपना डिजाइनर बना लिया। गूगल पर नई डिजाइन देखना, मोबाइल से ग्राहकों से संपर्क रखना व डिजिटल भुगतान लेना सीख गई हैं। आज वे न सिर्फ घर चला रही हैं, बल्कि अपने बेटे के भविष्य की योजना भी बना पा रही हैं।

  

सीमा कुशवाहा, संचालक, सहज जनसेवा केंद्र।

डिजिटल प्रशिक्षण लेकर शुरू किया जनसेवा केंद्र

शहर से सटे बभनी गांव की सीमा चौरसिया की कहानी सामाजिक बंदिशों को तोड़ने की मिसाल है। वर्षों तक घर की दहलीज पार करना मुश्किल रहा, लेकिन डिजिटल प्रशिक्षण व परिवार को धीरे-धीरे भरोसे में लेने के बाद उन्होंने जनसेवा केंद्र शुरू की। आज आसपास के लोग प्रमाण पत्र, पेंशन, आयुष्मान व अन्य आनलाइन सेवाओं के लिए उनके पास आते हैं। जिस घर में कभी बाहर निकलने पर सवाल होते थे, उसी घर में आज उनके काम पर गर्व किया जाता है।


जब एक महिला तकनीक के जरिए निर्णय लेने लगती है तो उसका असर केवल उसकी आमदनी पर नहीं, बल्कि पूरे परिवार व समाज पर पड़ता है। हमारा प्रयास यही है कि महिलाएं तकनीक से डरें नहीं, उसे अपने जीवन का औजार बनाएं।
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-आशुतोष कुमार, सीईओ, जागृति।
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