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जुमई रेल हादसा: 9 दिन बाद पटरी पर लौटी रफ्तार, सिस्टम की हुई कड़ी परीक्षा; ठंड में दिन-रात डटे रहे गुमनाम नायक

LHC0088 5 day(s) ago views 394
  

जमुई रेल हादसे के बाद जुटे रेल कर्मी। (जागरण)



संवाद सूत्र, सिमुलतला(जमुई)। सिमुलतला के समीप रेलवे ट्रैक पर गुजरी वह भयावह रात अब इतिहास के पन्नों में दर्ज हो चुकी है। भीषण मालगाड़ी दुर्घटना को अब नौ दिन पूरे हो चुके हैं।

यह हादसा केवल लोहे के वैगनों के पटरी से उतरने तक सीमित नहीं था, बल्कि इसने भारतीय रेलवे की आपदा प्रबंधन क्षमता, हजारों रेलकर्मियों के फौलादी हौसले और आधुनिक तकनीक की प्रभावशीलता की कड़ी परीक्षा ली।

आज जब उन्हीं पटरियों पर फिर से ट्रेनों की धमक और हार्न की गूंज सुनाई दे रही है तो यह जरूरी हो जाता है कि उस पूरे घटनाक्रम पर नजर डाली जाए, जिसने हावड़ा-दिल्ली मुख्य रेल मार्ग जैसे देश की लाइफलाइन को कुछ समय के लिए थाम दिया था।

यह रिपोर्ट हादसे की याद के साथ-साथ रेलवे की कार्यप्रणाली के उन पहलुओं को भी सामने लाती है जो अक्सर आम नजरों से ओझल रह जाते हैं।
विध्वंस से बहाली तक : ‘वार रूम’ जैसी स्थिति

हादसे के बाद का दृश्य भयावह था। दर्जनों वैगन एक-दूसरे पर चढ़े हुए थे, पटरियां उखड़ चुकी थीं और ओएचई के बिजली तार टूटकर लटक रहे थे। आमजन के लिए यह एक बड़ी ब्रेकिंग न्यूज थी, लेकिन रेलवे के लिए यह ‘वार रूम’ जैसी आपात स्थिति बन चुकी थी।

इस बहाली अभियान में मैनपावर और भारी मशीनरी का बेहतरीन समन्वय देखने को मिला। दुर्घटनाग्रस्त वैगनों को हटाना, क्षतिग्रस्त ट्रैक को दुरुस्त करना और सीमित समय में परिचालन बहाल करना रेलवे इंजीनियरिंग की एक मिसाल बन गया। इससे यह स्पष्ट हुआ कि भारतीय रेलवे का डिजास्टर रिकवरी सिस्टम पहले की तुलना में कहीं अधिक तेज और प्रभावी हो चुका है।
कड़ाके की ठंड में जुटे गुमनाम नायक

दिसंबर-जनवरी की हड्डी कंपा देने वाली ठंड और खुले मैदानी इलाके में गैंगमैन, ट्रैकमैन और इंजीनियरिंग विभाग के कर्मचारी दिन-रात डटे रहे। हाथों में औजार, माथे पर टार्च और आंखों में रेल परिचालन बहाल करने का जुनून लिए इन कर्मवीरों की बदौलत ही देश की प्रमुख रेल लाइन ज्यादा देर तक ठप नहीं रही। हादसे ने साबित कर दिया कि रेलवे की असली रीढ़ यही मैदानी कर्मचारी हैं।
मालगाड़ी और अर्थव्यवस्था का गहरा रिश्ता

यह हादसा केवल रेल यातायात तक सीमित नहीं था, बल्कि इसने देश की अर्थव्यवस्था से जुड़े पहलुओं को भी उजागर किया। मालगाड़ियां कोयला, अनाज और कच्चा माल पहुंचाकर उद्योगों और बिजली घरों की जीवन रेखा बनी रहती हैं। सिमुलतला से गुजरने वाले इस संवेदनशील फ्रेट कॉरिडोर पर किसी भी तरह का व्यवधान व्यापक असर डाल सकता है।
एक्सीडेंट रिलीफ ट्रेन की अहम भूमिका

हादसे के बाद एक्सीडेंट रिलीफ ट्रेन (एआरटी) की भूमिका भी अहम रही। क्रेन, वर्कशाप और आधुनिक उपकरणों से लैस ये विशेष ट्रेनें मलबे के बीच रास्ता बनाकर बहाली कार्य को गति देती हैं। सिमुलतला हादसे में एआरटी का संचालन एक केस स्टडी के रूप में देखा जा रहा है।

हालांकि, जांच समितियां अब भी हादसे के कारणों की पड़ताल कर रही हैं, लेकिन यह घटना प्रिवेंटिव मेंटेनेंस और आधुनिक ट्रैक मानिटरिंग सिस्टम की जरूरत को रेखांकित करती है। ‘कवच’ जैसी सुरक्षा प्रणालियों और थर्मल कैमरों, संवेदनशील सेंसरों के व्यापक उपयोग से भविष्य में ऐसी घटनाओं को रोका जा सकता है।
सतर्कता ही सबसे बड़ा सुरक्षा कवच

नौ दिन बाद सिमुलतला की पटरियों पर रफ्तार लौट आई है और इलाके में सामान्य स्थिति बहाल हो चुकी है, लेकिन यह हादसा याद दिलाता रहेगा कि तकनीक कितनी भी आधुनिक क्यों न हो, मानवीय सतर्कता का कोई विकल्प नहीं है।

सिमुलतला अब रेलवे के सुरक्षा मानचित्र पर एक महत्वपूर्ण बिंदू बन चुका है, जिसने व्यवस्था को आत्ममंथन का अवसर दिया है।

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