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PMCH Patna: सातवें तले पर अधीक्षक, जमीन पर मरीज! पीएमसीएच की नई व्यवस्था में इलाज को तरसते गरीब

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पीएमसीएच की नई व्यवस्था में इलाज को तरसते गरीब



जागरण संवाददाता, पटना। प्रदेश के सबसे बड़े सरकारी अस्पताल पीएमसीएच में इलाज की तस्वीर एक बार फिर व्यवस्था की संवेदनहीनता को उजागर कर रही है। जिस अस्पताल पर राज्यभर के गरीब और असहाय मरीजों की जिंदगी टिकी होती है, वहां जिम्मेदारी और हकीकत के बीच की खाई साफ दिखाई दे रही है। एक ओर पीएमसीएच के अधीक्षक सातवें तले पर कड़ी सुरक्षा और सुविधाओं के बीच बैठकर अस्पताल संचालन की जिम्मेदारी निभा रहे हैं, तो दूसरी ओर बीमार और लाचार मरीज जमीन पर बैठकर इलाज की बाट जोह रहे हैं।

सोमवार को पीएमसीएच गेट संख्या दो के पास पुराने रजिस्ट्रेशन काउंटर और दुर्गा मंदिर के समीप एक बेवश मरीज घंटों से फर्श पर बैठा नजर आया। न उसके पास कोई परिजन था, न इलाज से जुड़ी कोई स्पष्ट जानकारी।

ठंड और कमजोरी से जूझता यह मरीज बार-बार लोगों की ओर उम्मीद भरी नजरों से देख रहा था, मानो कोई उसे अंदर तक पहुंचा दे, कोई उसके इलाज का रास्ता बता दे।
नई व्यवस्था, लेकिन भ्रम की स्थिति

पीएमसीएच में हाल के दिनों में इलाज और रजिस्ट्रेशन की नई व्यवस्था लागू की गई है। ऑनलाइन पंजीकरण, अलग-अलग काउंटर और नए भवन की व्यवस्था तो की गई, लेकिन आम मरीजों को इससे परिचित कराने की ठोस व्यवस्था नहीं दिखी।

खासकर वे मरीज जो पढ़े-लिखे नहीं हैं, जिनके पास मोबाइल या इंटरनेट की सुविधा नहीं है, उनके लिए यह नई व्यवस्था किसी भूलभुलैया से कम नहीं।

गेट संख्या दो के पास बैठे मरीज को न तो किसी कर्मी ने मार्गदर्शन दिया और न ही यह बताया गया कि उसका इलाज कहां और कैसे होगा। ऐसे में सवाल उठता है कि अगर कोई मरीज लावारिस हो या अकेले अस्पताल पहुंच जाए, तो उसकी जिम्मेदारी किसकी है?
लावारिस मरीजों के इलाज की व्यवस्था पर सवाल

पीएमसीएच में रोज दर्जनों ऐसे मरीज पहुंचते हैं, जिनके साथ कोई नहीं होता। नियमों के अनुसार, अस्पताल प्रशासन की यह जिम्मेदारी है कि ऐसे मरीजों को प्राथमिक इलाज, भर्ती और आवश्यक दवाइयां उपलब्ध कराई जाएं। लेकिन जमीनी हकीकत यह है कि कई बार ऐसे मरीज घंटों यूं ही पड़े रहते हैं।

पुराने रजिस्ट्रेशन काउंटर और दुर्गा मंदिर के आसपास का इलाका अक्सर ऐसे ही मरीजों का ठिकाना बन जाता है, जिन्हें यह नहीं पता होता कि आगे क्या करना है। न कोई हेल्प डेस्क सक्रिय दिखती है, न स्वयंसेवक, जो उन्हें सही वार्ड तक पहुंचा सके।
जिम्मेदारी का सवाल

सबसे बड़ा सवाल यही है कि जब अस्पताल के शीर्ष अधिकारी ऊंची मंजिलों पर बैठकर व्यवस्थाएं तय कर रहे हैं, तो जमीन पर बैठा मरीज किससे गुहार लगाए?

क्या अस्पताल की व्यवस्था सिर्फ कागजों और बैठकों तक सीमित है, या उसका असली उद्देश्य मरीज तक समय पर इलाज पहुंचाना है?

स्वास्थ्य विशेषज्ञों का मानना है कि नई व्यवस्था लागू करने के साथ-साथ मरीजों को जागरूक करना, हेल्प डेस्क मजबूत करना और लावारिस मरीजों के लिए अलग टीम बनाना बेहद जरूरी है।

जब तक यह नहीं होगा, तब तक पीएमसीएच जैसे बड़े अस्पताल में भी गरीब मरीज खुद को असहाय ही महसूस करेगा।
मानवीय संवेदना की जरूरत

पीएमसीएच की पहचान सिर्फ इमारतों और तलों से नहीं, बल्कि वहां मिलने वाले इलाज और संवेदना से बनती है। जमीन पर बैठा मरीज इस बात की याद दिलाता है कि व्यवस्था कितनी भी आधुनिक क्यों न हो, अगर उसमें इंसानियत नहीं है, तो वह अधूरी है।

अब देखना यह है कि प्रशासन इस तस्वीर से सबक लेता है या ऐसे मरीजों की बेबसी यूं ही फर्श पर पड़ी रहती है।
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