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‘खुदा मुझको ऐसी खुदाई न दे…’ शहीद रणधीर की श्रद्धांजलि सभा में कबीरवाणी से डॉ. भारती बंधु ने छू लिया हर दिल

deltin33 6 day(s) ago views 310
  

कबीर के भजनों को प्रस्तुत करते डा. भारती बंधु। (फाइल फोटो)



रमेन्द्र नाथ झा, धनबाद। Dr. Bharti Bandhu:हवा में ठंड, मद्धम सी धूप और संगीत की लहरी...। सुबह सवेरे ख्यातिलब्ध गायक के मधुर कंठ से उतरती कबीर-वाणी आपको दो पल के लिए ठहरा कर रख देती है। न चाहते हुए भी आप गायक के साथ सुर मिलाने लगते हैं- ...जरा धीरे धीरे हांको, मेरे राम गाड़ी वाले।

शनिवार तीन जनवरी को धनबाद ने आइपीएस रणधीर वर्मा की पुण्यतिथि मनाई। रणधीर वर्मा चौक पर। पुलिस के दिलेर अफसर, जिन्हें आतंकियों ने गोली का निशाना बनाया। तीन जनवरी 1991 के काले दिन को धनबाद हर साल याद करता है। अपने वीर सपूत को याद रखने के लिए। 2026 में भी शहरवासियों ने उन्हें नहीं भुलाया। पद्मश्री डा.भारती बंधु आए। उसी चौराहे पर, जहां वे कई बार आ चुके हैं। वर्मा की पृष्ठभूमि से वे वाकिफ हैं। इसलिए कहा भी-तड़प, सिसकियां, बेबसी, रंजो-गम, खुदा मौत दे, मगर जुदाई न दे।

जिला प्रशासन ने पुख्ता इंतजाम किए थे। सड़कों पर बैरिकेडिंग लगाई थी। राह चलती गाड़ियां रोक दी गई थीं या उनका रास्ता बदल दिया गया था। लोग आते, बलिदानी को नमन करते। कोई सभा में शामिल हो जाता, तो कोई अपनी राह लौट जाता। डा.बंधु की आवाज भी थी, जिन्हें सुनकर कुछ लोग ठहर जाते। माहौल को महसूस करने लग जाते।

संगीत में पिरोये कबीर के दोहे दोहराने लगते। सूफियाना शैली होती ही ऐसी है। आपको ठहरा देती है। जरा सी मोहलत दी नहीं कि वह आपको विभोर करने लगती है। संगीत कानों के रास्ते अंतर तक उतरता चला जाता है। आप गायक के, गायक आपके होकर रह जाते हैं।

राग-रागिनी के ज्ञान से इतर, यह संगीत की खूबी है कि वह दिलों को जोड़ देता है। इसमें व्यवधान पड़े, तो तत्काल ही मन कचोट उठता है। टीस होती है। श्रोता सामने के प्रस्तोता के सम्मान में पड़ी खलल के खिलाफ उठ खड़ा होता है। मगर…!

संगीत सुनने का सउर सबके पास हो, जरूरी नहीं। हर वक्त औपचारिकता का आडंबर हो, यह भी जरूरी नहीं। भावना बड़ी होती है। श्रद्धांजलि सभा चौराहे पर होगी, तो माहौल अनौपचारिक होगा ही। फिर प्रश्न क्यों? दरअसल, यहां प्रश्न अधीरता का है। हम अपनों के लिए अक्सर अधीर हो उठते हैं।

सड़कों पर जरा सी बात पर होने वाली तकरार इसके उदाहरण हैं। लेकिन यहां तो श्रद्धांजलि सभा थी, उसमें काहे की अधीरता। घंटेभर से तनिक ज्यादा देर ही तो बैठना था। भीड़ भरपूर थी। शांति भी प्रचुर। फिर भी हम बीच-बीच में अधीर हो उठ रहे थे। कभी किसी जनप्रतिनिधि के आगमन पर तो कभी बस यूं ही। अस्थाई मंच के इर्द-गिर्द लहराते कैमरे इसी अधीरता को कैद करने के लिए मंडरा रहे थे। जैसे वहां जो कुछ हो रहा है, कानों में जा रहा है, उससे बेफिक्र।

स्थिति बड़ी अटपटी हो जाती। हवा में छितरा रहींं स्वर-लहरियां ऐसा लगता, जैसे मानोंं एक ही कुर्सी की ओर धकेली जा रही हों। इधर-उधर टहलते कैमरों और मोबाइल वाले हाथ लहराने लगते। कृत्रिम मुस्कानों के साथ जबरिया अभिवादन में झुके बदन गायक और श्रोता के बीच दीवार बन जाते। कुर्सियों पर जमे लोग बैठे-बैठे ही अग्रिम पंक्ति का जायजा लेने लगते।

चहल-कदमी करते सभी पैर उसी तरफ बढ़ते, जिधर अस्थाई केंद्र-बिंदु बनता। शांत माहौल में कोलाहल मच जाता। मिनट भर चलता सबकुछ, फिर एक अंतराल के बाद सब सामान्य। पुराना माहौल लौट आता। बंधु की आवाज से तादात्म्य बिठा रहे श्रोता एकाकार होने लगते। लेकिन तभी, कोई और आगमन। फिर वही पुरानी धमा-चौकड़ी का दृश्य। यह व्यवधान, कष्ट देता था।

डा.भारती बंधु इन स्थितियों से दो-चार न हो रहे हों, ऐसा नहीं था। इसलिए कहा- ‘यह राजनीतिक नहीं, सामाजिक कार्यक्रम है। हम शहीद को याद करने आए हैं।’ सुनाया- ‘खुदा मुझको ऐसी खुदाई न दे, कि अपने सिवा कोई दिखाई न दे’।

लोगों ने गायक की पीड़ा समझ ली। संगीत फिर तारी होने लगा। डा.बंधु शुरू हुए- ‘मैं तो हवा हू किस तरह पहरे लगाओगे…, महसूस ही करोगे मगर छू न पाओगे’। पद्मश्री के कंठ से उतरे शब्दोंं का जादू ही था कि जिन कानों तक पहुंचा, वह रणधीर वर्मा चौक पर अपने बलिदानी को याद करने लगा।

गायक ने इस संवेदना को महसूस किया और जोड़ दिया- ‘ऐ दोस्त, मेरी याद आएगी जरूर, मेरी गजल को जब कभी गुनगुनाओगे…।’ अब हर तरफ बस संगीत ही था। संचार सिद्धांत के साधारणीकरण का पाठ इसी माहौल को परिभाषित करता है।

श्रोता और गायक का तादात्म्य स्थापित हुआ नहीं कि सबकुछ एकाकार हो जाता है। तभी शाहबाज कलंदर के नाम लिखा अमीर खुसरो का कलाम- दमादम मस्त कलंदर… की पेशकश शुरू होती है। सब डूबते चले जाते हैं। मन सोचने लगता है जब डा.बंधु कबीर सुना रहे थे, तो हम अधीर क्यों हो रहे थे?
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