search

UP की इस छावनी की शान बढ़ा चुका है ‘इक्कीस’ के अरुण खेत्रपाल का टैंक, यहां है उनके नाम पर काॅलोनी

cy520520 2026-1-4 10:27:13 views 1019
  

बलिदानी अरुण खेत्रपाल का फाइल फोटो व उनका टैंक फामागुस्ता। जागरण आर्काइव  



अमित तिवारी, जागरण, मेरठ। भारतीय सैन्य इतिहास में 1971 का भारत–पाकिस्तान युद्ध स्वर्णिम अक्षरों में दर्ज है। इसी युद्ध की एक अमर और प्रेरणादायी गाथा है भारतीय सेना की पूूूना हार्स के सेकेंड लेफ्टिनेंट परमवीर चक्र विजेता अरुण खेत्रपाल की, जिनके अद्भुत साहस, नेतृत्व और सर्वोच्च बलिदान पर आधारित फिल्म ‘इक्कीस’ इन दिनों देशभर के सिनेमाघरों में प्रदर्शित हो रही है।

यह फिल्म एक युवा सैनिक की वीरता की कहानी है, जिसने दुश्मन की पूरी टैंक रेजिमेंट को आगे बढ़ने से रोक दिया और ‘एक इंच भी पीछे न हटने’ की कसौटी को इतिहास में अमर कर दिया।
शकरगढ़ सेक्टर में हुआ भीषण टैंक युद्ध

वर्ष 1971 के युद्ध के दौरान शकरगढ़ सेक्टर में बसंतर नदी के किनारे जारपल क्षेत्र में भारत और पाकिस्तान की सेनाओं के बीच भीषण टैंक युद्ध हुआ। यहीं पूूूना हार्स के जवानों ने अदम्य साहस का परिचय दिया। मात्र 21 वर्ष की आयु में सेकेंड लेफ्टिनेंट अरुण खेत्रपाल सेंचुरियन टैंक ‘फामागुस्ता’ के कमांडर थे। उनके सामने दुश्मन के कई टैंक मोर्चा संभाले खड़े थे।
इसी दौरान कमांडिंग आफिसर लेफ्टिनेंट कर्नल हनूत सिंह का स्पष्ट आदेश आया, ‘जो टैंक जहां हैं, वहीं से लड़ाई जारी रखेंगे। कोई भी टैंक एक इंच भी पीछे नहीं हटेगा।’
जब टैंक छोड़ने के आदेश को अरुण ने नकारा

13 जून 1971 को ही पूना हार्स में भर्ती हुए और 16 दिसंबर को लड़ाई के दौरान अरुण खेत्रपाल के साथ चल रहे दो भारतीय टैंक निष्क्रिय हो चुके थे। फामागुस्ता पर दुश्मन के दो गोले लग चुके थे और टैंक में आग भी लग गई थी।

वायरलेस पर बार-बार टैंक छोड़ने के आदेश आ रहे थे। यहां तक कि टैंक चालक प्रयाग सिंह ने भी कुछ देर पीछे हटकर आग बुझाने का सुझाव दिया। लेकिन अरुण खेत्रपाल ने दृढ़ स्वर में कहा, ‘सर, मेरी गन अभी चल रही है।’ उन्होंने कमांडेंट के आदेश का हवाला देते हुए पीछे हटने से साफ इनकार कर दिया और दुश्मन पर कहर बनकर टूट पड़े।

अपने अद्भुत निशानेबाजी कौशल, धैर्य और सूझबूझ से अरुण खेत्रपाल ने एक-एक कर दुश्मन के आठ टैंकों को ध्वस्त कर दिया। अंतिम क्षणों में महज 75 मीटर की दूरी पर खड़े पाकिस्तान की 13 लांसर रेजिमेंट के कमांडर मेजर निसार के टैंक को भी उन्होंने मार गिराया। इसी दौरान चौथा गोला सीधे फामागुस्ता के भीतर घुसा।

टैंक के लोडर नंद सिंह वीरगति को प्राप्त हुए, एएलडी नाथू सिंह और अरुण खेत्रपाल गंभीर रूप से घायल हुए। कुछ ही समय बाद अरुण खेत्रपाल ने भी रणभूमि में देश के लिए अपने प्राण न्योछावर कर दिए। उनकी इस असाधारण वीरता के लिए उन्हें मरणोपरांत परमवीर चक्र से सम्मानित किया गया।
बसंतर की लड़ाई में पुणा हार्स का पराक्रम

बसंतर की लड़ाई में पूना हार्स ने कम संख्या में होते हुए भी दुश्मन को चट्टान की तरह रोके रखा। पाकिस्तानी मेजर निसार ने स्वयं स्वीकार किया कि ‘अरुण हमारी जीत और हार के बीच चट्टान बनकर खड़े थे।’ इस युद्ध में पुणा हार्स को बैटल आफ बसंतर का बैटल आनर और पंजाब का थिएटर आनर प्राप्त हुआ। वर्ष 1971 में इस युद्ध के दौरान बटालियन को एक परमवीर चक्र, दो महावीर चक्र, चार सेना मेडल और 21 मेंशन इन डिस्पैचेज जैसे सम्मान मिले।  
फामागुस्ता टैंक रेजिमेंट की शान और प्रेरणा का प्रतीक

अरुण खेत्रपाल का मानवीय पक्ष भी उतना ही प्रेरक है। 10 दिसंबर 1971 को, युद्ध के बीच, उन्होंने अपने माता-पिता को लिखा, ‘यहां हम बहुत अच्छा समय गुजार रहे हैं।’ यह छोटा सा पत्र बताता है कि रणभूमि में भी उनका मनोबल और आत्मविश्वास कितना ऊंचा था।

युद्ध के बाद भारतीय सेना ने फामागुस्ता टैंक को पूना हार्स को युद्ध ट्राफी के रूप में भेंट किया। यह टैंक आज भी रेजिमेंट की शान और प्रेरणा का प्रतीक है। पूना हार्स पांच वर्षों तक मेरठ छावनी में तैनात थी और यही पर अपना 200वां स्थापना दिवस मनाया था।

छावनी में अरुण खेत्रपाल के नाम पर एक अधिकारी काॅलोनी भी स्थापित की गई है। आज जब अरुण खेत्रपाल की शौर्य गाथा पर बनी फिल्म ‘इक्कीस’ सिनेमाघरों में चल रही है, तो यह केवल एक फिल्म नहीं, बल्कि उस युवा सैनिक को श्रद्धांजलि है जिसने देश की रक्षा में अपना सर्वस्व अर्पित कर दिया। यह कहानी नई पीढ़ी को साहस, कर्तव्य और राष्ट्रभक्ति का वास्तविक अर्थ समझाती है और मेरठ सहित पूरे देश को गर्व से भर देती है।
like (0)
cy520520Forum Veteran

Post a reply

loginto write comments
cy520520

He hasn't introduced himself yet.

510K

Threads

0

Posts

1610K

Credits

Forum Veteran

Credits
162793