search

यहां पढ़ें कैसे मिलती है ईश्वर की कृपा? रखें इन बातों का ध्यान

deltin33 2025-12-1 22:39:35 views 824
  

आसक्ति ही बंधन का कारण।



आचार्य नारायण दास (श्रीमद्भागत मर्मज्ञ व आध्यात्मिक गुरु)। राजा निमि की जिज्ञासा का समाधान करते हुए चौथे योगीश्वर प्रबुद्ध जी ने कहा- हे राजन्! आत्म-संयम ही जीवन की परम संपदा है। श्रीगुरुगोविंद प्रदत्त विधि के अनुसार प्राणायाम की अग्नि से चंचल मन की वृत्तियों का दहन करना चाहिए। जब अभ्यास के द्वारा श्वास पर नियंत्रण हो जाता है, तब मन स्वतः शांत हो जाता है। हे राजन! वाणी को मौन के आवरण में सुरक्षित रखना चाहिए, क्योंकि अनावश्यक वार्तालाप से भी ऊर्जा का अपव्यय होता है। नश्वर भोगादि में जो आसक्ति वही बंधन का कारण है, इनसे विरक्ति ही मुक्ति है। अनंतकोटि ब्रह्मांडनायक परमेश्वर के जन्मादि और लीलाएं दिव्य और ऐश्वर्य से युक्त हैं, भगवान की लीलाओं का श्रवण, कीर्तन और अखंड ध्यान करना चाहिए। कर्म में सानंद कर्तव्यबोध और अनासक्ति का भाव रखना चाहिए, यही निष्काम कर्म-योग है। विज्ञापन हटाएं सिर्फ खबर पढ़ें

यथैतामैश्वरीं मायां दुस्तरामकृतात्मभिः।
तरन्त्यञ्ज स्थूलधियो महर्ष इदमुच्यताम्।।

शरीर से की जाने वाली प्रत्येक चेष्टा, चाहे वह लौकिक हो या पारलौकिक उसे भगवान के चरणों में प्रेमपूर्वक निवेदित कर देना चाहिए। भगवान के प्रति पूर्ण समर्पण ही हमारे अहंकारादि का शमन कर देता है, जिसके फलस्वरूप भगवत्स्मृति दृढ़ होने लगती है। यज्ञ, दान, तप अथवा जप, सदाचार का पालन, और स्त्री, पुत्र, घर, जीवन, प्राण तथा अत्यधिक प्रिय वस्तुएं - इन सब को भगवान के चरणों में प्रेम और विश्वास से सौंप देना चाहिए, यही शरणागति का सर्वोत्म भाव है। सबमे समभाव और सबके प्रति करुणा ही लोक में जीवन जीने की कला है। संयम जीवन का अनुशासन है, समर्पण जीवन की दिशा है, सेवा जीवन की श्रेष्ठता है तथा भगवत्स्मृति सदा बनी रहे; यही मोक्षस्वरूप जीवन की सिद्धि है।
भगवान का साक्षात्कार

जिन संत-महापुरुषों ने सच्चिदानंदस्वरूप भगवान का साक्षात्कार अपने आत्मा और स्वामी के रूप में कर लिया हो, उनका सान्निध्य प्राप्त करने का भगीरथ प्रयास करना चाहिए, क्योंकि उनके दर्शन, सेवा और वचनादि के श्रवण से विवेक जाग्रत हो जाता है, जिससे संसार का नश्वरमोह छिन्न-भिन्न हो जाता है। स्थावर और जंगम प्राणियों की निष्काम भाव से सेवा ही भगवत्सेवा है। विशेषतः मनुष्यों की, उनमें भी परोपकारी सज्जनों की, और उनसे भी बढ़कर भगवत्प्रेमी संतों की सेवा ही परम-धर्म है।
भगवान श्रीकृष्ण की भक्ति

भगवत्कथा की परमपावनी सुधा का रसपान स्वयं करते हुए दूसरों को भी सानंद करना चाहिर। भगवद्भक्तों और आध्यात्मिक पथ के साधकों के साहचर्य से निश्छल प्रेम, परम संतुष्टि और प्रपंच से सहज निवृत्ति हो जाती है। हे राजन्! भगवान श्रीकृष्ण की भक्ति महत्पापों की राशि को भी भस्मूभूत कर देती है। मेरा अपना मत है, जो सतत और अविरल भगवान का स्मरण करता और दूसरों को कराता है, वह धन्य है। यह साधन-भक्ति का चरम अनुष्ठान है, जिसके सत्प्रभाव से शीघ्र ही प्रेम-भक्ति का शुभोदय होता है, जिससे साधक भगवत प्रेमामृत की नौका से दुस्तर संसार-सागर सहज और सानंद पार उतर जाता है।

यह भी पढ़ें: ध्यान-अभ्यास से बदलती है जीवन की दिशा, जरूर करें इनका पालन

यह भी पढ़ें: Gita Jayanti 2025: गीता में मिलता है इन सभी मुश्किलों का हल, यहां पढ़ें इससे जुड़ी महत्वपूर्ण बातें
like (0)
deltin33administrator

Post a reply

loginto write comments
deltin33

He hasn't introduced himself yet.

1510K

Threads

0

Posts

4710K

Credits

administrator

Credits
477557