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एआई जेनेरेटेड तस्वीर
शैलेंद्र गोदियाल, जागरण हरिद्वार। अर्धकुंभ से पहले हरिद्वार में मानव-वन्यजीव संघर्ष को रोकने और हाथियों से सुरक्षा को लेकर बड़ी तैयारी हो चुकी है। लगातार आबादी क्षेत्र तक पहुंच रहे टस्कर हाथियों की चुनौती को तकनीक की ढाल से रोकने के लिए वन विभाग हाथियों को रेडियो कॉलर पहनाए जा रहे हैं।
जिससे आबादी क्षेत्र में आने वाले हाथियों की रियल-टाइम निगरानी हो सके। अर्धकुंभ में सुरक्षा के मद्देनजर छह रेडियो कॉलर लगाए जाने हैं। वन विभाग के पास छह रेडियो कॉलर भी उपलब्ध हो चुके हैं। रेडियो कॉलर लगाने का कार्य मई में शुरू हो जाएगा। इससे पहले भारतीय वन्यजीव संस्थान की टीम दो माह तक आबादी क्षेत्र में आने वाले हाथी दल के लीडर या टस्कर को चिह्नित करेंगे। इसके लिए वन विभाग की ओर से भारतीय वन्यजीव संस्थान को पत्र लिखा गया है।
हरिद्वार के प्रभागीय वनाधिकारी स्वप्निल अनिरुद्ध कहते हैं कि यह पहली बार होगा जब अर्धकुंभ के पूर्व कुछ हाथियों की मॉनिटरिंग के लिए रेडियो कॉलर तकनीक का उपयोग किया जाएगा। इसके लिए वर्ल्ड वाइड फंड (डब्ल्यूडब्ल्यूएफ) की ओर से चार रेडियो कॉलर उपलब्ध करा दिए गए हैं।
दो वन विभाग के पास पहले से उपलब्ध हैं। साथ ही, हाथियों पर रेडियो कॉलर लगाने के लिए वन विभाग का अनुबंध भी हो चुका है। रेडियो कॉलर पहनाए जाने के बाद मार्च और अप्रैल में भारतीय वन्यजीव संस्थान की ओर से हाथियों के मूवमेंट पर अध्ययन किया किया जाएगा।
रेडियो कॉलर भी उन चुनिंदा हाथियों को ही पहनाए जाने हैं, जो टीम लीडर हैं या फिर अकेले चलने वाले टस्कर हैं। जिससे उनके मूवमेंट की रियल टाइम जानकारी उपलब्ध रहेगी और किसी भी हाथी झुंड के आबादी क्षेत्र की ओर बढ़ने पर समय रहते कार्यवाही की जा सकेगी। जिससे भीड़भाड़ वाले समय में किसी बड़े हादसे को रोका जा सके। रेडियो कॉलर से हाथियों के मूवमेंट पैर्टन का भी अध्ययन हाथी विशेषज्ञों की टीम कर सकेगी।
जगजीतपुर में हर दिन पहुंचते हैं हाथी
जनपद हरिद्वार में हाथियों का आबादी क्षेत्र की ओर लगातार बढ़ता रुख वन विभाग की चिंता बढ़ा रहा है। राजाजी टाइगर रिजर्व में 500 से अधिक हाथी हैं, परंतु हरिद्वार में शहर क्षेत्र और राजाजी टाइगर रिजर्व के बीच बफर जोन नहीं है। जिस कारण वन्यजीव सीधे आबादी क्षेत्र में पहुंच जाते हैं।
हरिद्वार में मोतीचूर से टिबड़ी, भेल क्षेत्र, रोशनाबाद तथा बैरंगी कैंप, जगजीतपुर, मिसरपुर, गाडोवाली, कटारपुर व बदरपुर जाट क्षेत्र तक हाथियों का पारंपरिक कॉरिडोर फैला है। श्यामपुर से लेकर जगजीतपुर, मिसरपुर, गाडोवाली, कटारपुर तक तो हर दिन हाथी की चलकदमी है।
विशेषज्ञों के अनुसार शहरीकरण और कृषि भूमि व बगीचों के लगातार कम होने से हाथियों के पारंपरिक मार्ग बाधित हुए हैं। जहां कभी आम के बड़े-बड़े बगीचे और खेत थे, वहां अब आवासीय कालोनियां बस चुकी हैं।
हाथी रोकने के लिए खोदी जाएगी 8.30 किमी लंबी खाई
प्रभागीय वनाधिकारी स्वप्निल अनिरुद्ध ने कहा कि हाथियों को रोकने के लिए बैरागी कैंप से लेकर कटारपुर तक करीब साढ़े आठ किलोमीटर लंबी खाई खोदने की योजना अर्धकुंभ के तहत तैयार की गई। इस खाई खुदान के कार्य में 2.36 करोड़ रुपये खर्च होंगे। इसके साथ ही सोलर फेंसिंग भी होगी। इसके लिए 57 लाख रुपये की योजना तैयार की गई है।
अर्धकुंभ में सुरक्षा निगरानी के लिए कुछ स्थानों पर वाचर टावर भी बनाए जाने हैं। इसके अलावा मातृ सदन से लेकर मिस्सरपुर तक छह किलोमीटर लंबी सुरक्षा दीवार की भी योजना है।
हर जोन में तैनात रहेगी रेस्क्यू टीम
प्रभागीय वनाधिकारी स्वप्निल अनिरुद्ध ने बताया कि अर्धकुंभ क्षेत्र को छह जोन में बांटा गया है। हर जोन में उपप्रभागीय वनाधिकारी स्तर के अधिकारी जोन के प्रभारी होंगे। जिनके अंडर में कम से कम दो रेंज अधिकारी सहित अन्य वन स्टाफ भी होगा। प्रत्येक जोन में एक-एक रेस्क्यू टीम भी तैनात रहेगी। जो सांप, मगरमच्छ सहित अन्य वन्यजीवों के रेस्क्यू के लिए तैनात रहेगी।
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