बांग्लादेश जनमत संग्रह संविधान एवं इतिहास पर संकट की चेतावनी (फोटो सोर्स- रॉयटर्स)
डिजिटल डेस्क, नई दिल्ली। बांग्लादेश में 12 फरवरी को 13वें संसदीय चुनावों के साथ-साथ मुहम्मद यूनुस की अंतरिम सरकार के \“जुलाई नेशनल चार्टर 2025\“ पर जनमत संग्रह भी आयोजित किया गया।
84 बिंदुओं वाले इस जटिल सुधार पैकेज पर विशेषज्ञों ने गंभीर चिंता जताई है। उन्होंने कहा कि जटिल सुधार पैकेज के पक्ष में जनता की सहमति प्राप्त करने के लिए आयोजित जनमत संग्रह बांग्लादेश के मूलभूत इतिहास के लिए खतरा बन सकता है और स्वतंत्रता के बाद बने 1972 के बांग्लादेश के संविधान की निरंतरता को समाप्त कर सकता है।
जनमत संग्रह में \“जुलाई राष्ट्रीय चार्टर 2025\“ नामक सुधार प्रस्तावों के लिए जनता की सहमति मांगी गई, जिसकी घोषणा यूनुस ने 17 अक्टूबर को राजनीतिक दलों और उनकी अध्यक्षता वाली राष्ट्रीय सहमति आयोग के बीच लंबे विचार-विमर्श के बाद की थी।
संवैधानिक निरंतरता पर खतरा
तानिया अमीर और स्वाधीन मलिक जैसे विशेषज्ञों का तर्क है कि यदि जनमत संग्रह में \“हां\“ की जीत होती है, तो यह 1972 के मूल संविधान की निरंतरता को समाप्त कर सकता है। यह 1971 की स्वतंत्रता की कानूनी नींव और देश के आधारभूत इतिहास को शून्य करने जैसा है।
प्रक्रियात्मक जटिलता
जनमत संग्रह के मतपत्र में केवल एक प्रश्न है जो चार प्रमुख सुधार क्षेत्रों को कवर करता है। विश्लेषक इराज अहमद के अनुसार, मतदाता 84 सूत्रीय एजेंडे से अनभिज्ञ हैं, जिससे \“हां\“ या \“नहीं\“ का चुनाव करना कठिन और भ्रामक है।
वैधानिकता पर सवाल
वरिष्ठ वकील मोहसिन रशीद ने जनमत संग्रह की वैधता पर सवाल उठाए हैं, क्योंकि वर्तमान संविधान में ऐसे जनमत संग्रह का कोई प्रविधान नहीं है। आलोचकों का मानना है कि राष्ट्रपति द्वारा इसे मंजूरी देना कानूनी रूप से विवादास्पद है।
भविष्य का प्रभाव
यदि \“हां\“ पक्ष जीतता है, तो अगली संसद इस चार्टर को लागू करने के लिए बाध्य होगी, जिसमें द्विसदनीय संसद की स्थापना जैसे बड़े बदलाव शामिल हैं। यूनुस सरकार इसे \“बर्बरता से सभ्य समाज\“ की ओर कदम मानती है, जबकि विपक्षी इसे सम्प्रभु संसद की शक्तियों का हनन कह रहे हैं।
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