तस्वीर का इस्तेमाल प्रतीकात्मक प्रस्तुतीकरण के लिए किया गया है। जागरण
जागरण संवाददाता, गोरखपुर। अमेरिकी नागरिकों से साइबर जालसाजी के इस रैकेट का संचालन गोरखपुर से नहीं, बल्कि सिलीगुड़ी व कोलकाता से हो रहा था। करीमनगर स्थित सेंटर केवल ठगी का फ्रंट आफिस था, जबकि पूरी फाइनेंशियल हैंडलिंग फरार चल रहे रौनक के हाथ में थी।
प्राथमिक जांच में सामने आया कि नेटवर्क का एक सदस्य अमेरिका में बैठा है जो विदेशी नागरिकों का डाटा वहां से भेजता था। कोलकाता में इस डाटा के आधार पर फर्जी कॉल सेंटर का सेटअप तैयार किया जाता था।
पुलिस की माने तो अमेरिका में रहने वाले सहयोगी से मिलने वाली ठगी की रकम पहले रौनक के खातों में ट्रांसफर की जाती थी। इसके बाद अलग-अलग खातों और माध्यमों से रकम को छोटे हिस्सों में बांटकर निकाल लिया जाता था, ताकि ट्रांजैक्शन संदिग्ध न लगे। इसी रुपये से काल सेंटर का किराया, उपकरण, कर्मचारियों का वेतन और अन्य खर्च पूरे किए जाते थे।
स्थानीय स्तर पर काम कर रहे लोगों को यह आभास भी नहीं होने दिया जाता था कि असली कंट्रोल कहां से हो रहा है। जांच में यह भी सामने आया है कि गिरोह ने जानबूझकर अलग-अलग राज्यों के लोगों को अलग-अलग भूमिकाओं में शामिल किया, ताकि किसी एक स्थान से पूरे नेटवर्क का पर्दाफाश न हो सके। कालिंग गोरखपुर से, डेटा हैंडलिंग कोलकाता से और रुपये सिलीगुड़ी के खातों में भेजे जाते थे।
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इसी वजह से यह गिरोह लंबे समय तक कानून की नजर से बचा रहा। साइबर सेल और क्राइम ब्रांच की टीमें अब बैंक खातों, यूपीआइ ट्रांजैक्शन, मोबाइल लोकेशन और डिजिटल ट्रेल के जरिए फरार आरोपितों तक पहुंचने में जुटी हैं। एसपी उत्तरी ज्ञानेंद्र का कहना है कि जैसे-जैसे वित्तीय लेनदेन की परतें खुलेंगी, ठगी की कुल रकम व पीड़ितों की वास्तविक संख्या भी सामने आएगी। |