हल्दी की खेती करते किसान। (जागरण)
शैलेश कुमार, बिहारीगंज (मधेपुरा)। बिहारीगंज प्रखंड क्षेत्र में हल्दी खेती का रकबा दिनों दिन बढ़ता जा रहा है। इसकी खेती कर न सिर्फ किसान की आर्थिक स्थिति सुदृढ़ हो रही है बल्कि वे समृद्धि की कहानी भी लिख रहे हैं और प्रेरित होकर किसान इसकी खेती अपनाने पर जोर दे रहे हैं।
प्रकृति की मार झेल रहे अन्नदाताओं ने पारंपरिक खेती की जगह औषधीय गुणों से भरपूर हल्दी खेती कर अपनी पहचान बनाने में जुटे हैं। सब्जी खेती के लिए चर्चित बिहारीगंज के लक्ष्मीपुर लालचंद के कई किसान हल्दी की खेती कर रहे थे।
औषधीय गुणों वाली हल्दी खेती करने वाले किसानों की तरक्की देखकर आसपास के इलाके के दर्जनों किसान हल्दी खेती से जुड़ गए हैं। लगभग 500 एकड़ में हल्दी की खेती हो रही है।
लागत से तीन गुणा अधिक हो रहा मुनाफा
हल्दी खेती से जुड़े किसान राजगंज निवासी नीरज मेहता, पंकज मेहता, अमित मधुवन तिनटेंगा निवासी दिलीप मंडल पड़रिया पंचायत के लक्ष्मीपुर निवासी बंटी मेहता आदि का कहना है कि पारंपरिक खेती में मेहनत के बावजूद उचित आमदनी नहीं होने से कई सपने अधूरे रह जाते थे।
जबकि लक्ष्मीपुर लालचंद, मंजौरा, जौतेली गांव के किसान पंकज कुमार मेहता, गजेन्द्र मेहता, राजेन्द्र मेहता, कैलाश मेहता, सोनेलाल मेहता, संजीव भगत व अन्य किसान वर्षों से कई एकड़ भूमि पर हल्दी खेती कर रहें थे।
इन लोगों के सलाह पर इस वर्ष हल्दी खेती का शुरुआत किए हैं। इसकी खेती में कम मेहनत और लागत के अनुरूप तीन गुणा मुनाफा होने की संभावना रहती है।
दिलीप मंडल ने बताया कि पूर्व में घरों में खाने के लिए हल्दी खेती करते थे। इस वर्ष दो एकड़ भूमि पर मिर्ची के साथ हल्दी खेती किया गया है। फसल अच्छी होने का आसार हैं। एक एकड़ भूमि पर हल्दी खेती में 50 हजार रुपये की लागत आती है। अच्छी उपज होने पर प्रति एकड़ डेढ़ लाख रुपये की आय होने की उम्मीद रहती है।
बड़े-बड़े शहरों से पहुंच रहे व्यापारी
हल्दी खरीद के लिए बड़े- बड़े शहरों से व्यपारी आतें हैं। किसानों का कहना है कि पूर्णिया के गुलाबबाग के अलावा कोसी-सीमांचल और भागलपुर इलाके से व्यापारी पहले पहुंचते ही थे अब बड़े-बड़े शहरों से भी व्यापारी आने लगे हैं। इस इलाके की हल्दी भोपाल के कैंसर अस्पताल तक दवाई के उपयोग में भेजी जाती हैं।
दस माह में परिपक्व होता है हल्दी फसल
हल्दी का सामान्य तौर पर मसाले के रूप में इस्तेमाल किया जाता हैं। इसके साथ हीं सौंदर्य प्रसाधनों के साथ बीमारियों में आयुर्वेदिक दवाओं में इस्तेमाल होता हैं। गर्म व नम जलवायु में हल्दी की पैदावार अच्छी होती है। इसकी खेती के लिए जल निकासी की व्यवस्था उचित होनी चाहिए।
हल्दी की बुआई कम से कम बीस सेंटीमीटर की दूरी पर करनी चाहिए। एक एकड़ में छह क्विंटल हल्दी बीज की आवश्यकता होती है। हल्दी फसल लगभग दस माह में परिपक्व हो जाता है। इसके बाद हल्दी फसल उखाड़ कर कटाई कर पानी में उबाल कर धूप में सुखाया जाता है। इसकी खेती आसानी से छाया में भी की जा सकती है।
किसानों को खराब पतवार की वृद्धि रोकने के लिए नियमित रूप से निराई- गुड़ाई करना हैं। जिससे फसल को पोषक तत्वों मिलतें रहती हैं। हल्दी की बेहतर पैदावार के लिए गोबर खाद, नीम खल्ली एवं यूरिया का उपयोग किया जाता है। इस वर्ष हल्दी बेहतर फसल देखकर किसानों के चेहरे खिले हैं।
इस इलाके में हल्दी की खेती काफी दिनों से की जा रही है, लेकिन किसान सिर्फ अपने मसाला खाने के लिए काफी कम मात्रा में खेती करते थे। इधर कुछ वर्षों से बेहतर पैदावार होने से किसानों का रूझान हल्दी खेती पर बढ़ रहा है। किसानों को इसके लिए प्रोत्साहित भी किया जा रहा है। -
अशोक कुमार राम, बीएओ, बिहारीगंज।
हल्दी में रासायनिक तत्व कर-क्यूमिन पाए जाते हैं, जिसमें कैंसर से लड़ने की क्षमता पाई जाती है। कैंसर रोगियों में सर्जरी के बाद भी दोबारा कैंसर की वापसी होने की संभावना बनी रहती हैं। सर्जरी के बाद करक्यूमिन से बना एक स्कीन पिच लगाया जाता है जो कैंसर की कोशिकाओं को जड़ से समाप्त कर देता है। जिसमें हल्दी का उपयोग किया जाता है। जिसका कोई दुष्प्रभाव नहीं होता हैं। इसके आलावा हल्दी का उपयोग सर्दी-जुकाम, डायबिटीज, हृदय रोग व त्चचा को खूबसूरत बनाने में भी किया जाता है। -
डॉ. समीर कुमार दास, प्रभारी चिकित्सा पदाधिकारी, पीएचसी बिहारीगंज। |
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