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डायबिटीज के मरीजों को अब सस्ती इंसुलिन मिलेगी। प्रतीकात्मक फोटो
हंसराज सैनी, मंडी। मधुमेह (डायबिटीज) से जूझ रहे करोड़ों रोगियों के लिए राहत भरी खबर है। भारतीय प्रौद्योगिकी संस्थान (आइआइटी) गुवाहाटी के शोधार्थियों ने मानव इंसुलिन उत्पादन के लिए किफायती तकनीक विकसित की है। इस नवोन्मेषी प्रणाली के लिए संस्थान को दो भारतीय पेटेंट प्राप्त हुए हैं।
यह तकनीक न केवल इंसुलिन के उत्पादन की लागत को कम करेगी, बल्कि इसकी गुणवत्ता और उपलब्धता में भी सुधार लाएगी। इस तकनीक से भविष्य में ओरल इंसुलिन (मुंह से ली जाने वाली दवा) जैसे विकल्पों के लिए भी राह आसान होगी, जिससे सुई से मिलने वाले दर्द से मुक्ति मिल सकेगी।
बैक्टीरिया का उपयोग कर इंसुलिन बनाने की विधि खोजी
आइआइटी गुवाहाटी के बायोसाइंसेज एवं बायोइंजीनियरिंग विभाग के प्रो. वीरांकी वेंकट दासु के नेतृत्व में शोध टीम ने स्यूडोमोनास फ्लोरेसेंस नामक बैक्टीरिया का उपयोग कर इंसुलिन बनाने की विधि खोजी है। अब तक इंसुलिन उत्पादन के लिए मुख्य रूप से ई-कोलाई बैक्टीरिया का उपयोग किया जाता था, लेकिन इसमें इंसुलिन अघुलनशील गांठों के रूप में बनता है, जिसे शुद्ध करने की प्रक्रिया बहुत जटिल और खर्चीली होती है।
इसके विपरीत संस्थान द्वारा विकसित नई तकनीक में इंसुलिन घुलनशील रूप में प्राप्त होता है, जिससे महंगी शुद्धिकरण प्रक्रियाओं की आवश्यकता कम हो जाती है।
53.7 करोड़ वयस्क मधुमेह से प्रभावित
वर्तमान में दुनियाभर में लगभग 53.7 करोड़ वयस्क मधुमेह से प्रभावित हैं। अंतरराष्ट्रीय मधुमेह महासंघ (आइडीएफ) का अनुमान है कि 2050 तक हर आठ में से एक वयस्क इस बीमारी की चपेट में होगा। टाइप-एक और गंभीर टाइप-दो मधुमेह रोगियों के लिए इंसुलिन जीवन रक्षक दवा है। हालांकि, मौजूदा उत्पादन विधियां जटिल और महंगी हैं, जिससे इंसुलिन आम आदमी की पहुंच से दूर होता जा रहा है।
तकनीक की 4 मुख्य विशेषताएं
- कम लागत और उच्च उत्पादन : जटिल प्रक्रियाओं के हटने से उत्पादन खर्च में भारी कमी आएगी।
- सुरक्षित प्रणाली : स्यूडोमोनास फ्लोरेसेंस एक बीएसएल-एक (बायो-सेफ्टी लेवल-एक) सूक्ष्मजीव है, जो पूरी तरह सुरक्षित है।
- खाद्य-ग्रेड यौगिकों का उपयोग : इस प्रक्रिया में जहरीले रसायनों के बजाय सुरक्षित खाद्य-ग्रेड यौगिकों का उपयोग किया जा सकता है।
- बहुआयामी उपयोग : यह प्रणाली न केवल इंसुलिन, बल्कि अन्य औषधीय प्रोटीन और औद्योगिक एंजाइम बनाने में भी सक्षम है।
विज्ञानियों का नजरिया
शोध का नेतृत्व कर रहे प्रो. वीरांकी वेंकट दासु ने बताया कि जेनेटिक, मेटाबालिक और बायोकेमिकल इंजीनियरिंग के तालमेल से यह सफलता मिली है। यह तकनीक पारंपरिक ई-कोलाई और यीस्ट प्रणालियों की सीमाओं को समाप्त करेगी, जिससे यह अधिक टिकाऊ और प्रभावी बनेगी। उत्पादन के लिए अब दवा कंपनियों से संपर्क किया जा रहा है।
पेटेंट और प्रकाशन
इस शोध को भारत सरकार द्वारा दो पेटेंट (पेटेंट संख्या: 568947 और 536416) प्रदान किए गए हैं। इसके अलावा, शोध के निष्कर्ष नींदरलैंड के इंटरनेशनल जर्नल आफ बायोलाजिकल मैक्रोमोलेक्यूल्स में प्रकाशित हुए हैं।
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