जागरण संवाददाता, रांची। एक ओर जहां सरकार स्कूली शिक्षा को बेहतर बनाने का प्रयास कर रही है तो दूसरी ओर जिले के प्राथमिक विद्यालयों में विद्यालय विकास निधि नहीं मिलने से पठन पाठन कार्य की व्यवस्था चरमरा रही है। विद्यालय विकास निधि नहीं मिलने से कई आवश्यक सामग्रियों की खरीदारी नहीं हो रही है और मजबूरन शिक्षकों को जेबें ढीली करनी पड़ रही हैं।
कई बार झारखंड प्रदेश संयुक्त शिक्षक मोर्चा के सदस्यों के द्वारा मासिक गुरू गोष्ठी में यह सवाल भी उठाया जाता है कि इतनी कम राशि में सालभर का खर्च निकाल पाना मुमकिन नहीं हो पाता है। ऊपर से राशि मिलने में हो रही लेटलतीफी से शिक्षकों की परेशानी बढ़ रही है। बता दें कि प्रदेश के प्राथमिक विद्यालय, मध्य विद्यालयों की मूलभूत आवश्यकताओं की पूर्ति के लिए सरकार द्वारा प्रतिवर्ष विद्यालय विकास निधि के अंतर्गत राशि उपलब्ध कराई जाती रही है लेकिन चालू वित्तीय वर्ष में अब तक यह राशि जारी नहीं की गई है।
इस कारण विद्यालयों में कई आवश्यक कार्य पूरी तरह बाधित हो गए हैं। स्थिति यह है कि अनेक विद्यालयों के प्रधानाध्यापक अपने पारिवारिक खर्च में कटौती कर विद्यालय की दैनिक जरूरतों की सामग्री स्वयं खरीदने को मजबूर हैं। बाल पंजी, कैश बुक, छात्र शिक्षक उपस्थिति पंजी, मीटिंग बुक, एमडीएम दैनिक पंजी आदि खरीदना मजबूरी है।
सत्र समाप्त होने में अभी दो माह शेष हैं लेकिन लिखने के लिए दी गई पतली कापियां दो महीने पहले ही समाप्त हो चुकी हैं। मजबूरन गरीब अभिभावक जैसे-तैसे कापी और पेंसिल खरीदकर बच्चों को उपलब्ध करा रहे हैं ताकि बच्चों की पढ़ाई किसी तरह जारी रह सके।हालांकि, विभाग के पदाधिकारी कहते हैं कि आठवीं कक्षा तक के विद्यालयों को यह राशि नहीं मिली है जबकि जिन विद्यालयों में दसवीं और 12वीं तक की पढ़ाई होती है वहां यह राशि दी गई है।
ये है विद्यालय विकास निधि की व्यवस्था
वैसे विद्यालय जहां 250 से अधिक छात्र छात्राएं नामांकित हैं वहां 75,000 रुपये, 500 से 1000 छात्र छात्राओं की संख्या वाले विद्यालयों को एक लाख रुपये, 250 से कम छात्र छात्राओं की संख्या वाले विद्यालयों को 50,000 रुपये और 100 से कम छात्र छात्राओं की संख्या वाले विद्यालयों को 25,000 रुपये दिए जाते हैं, ताकि वहां आवश्यकता की सामग्रियों की खरीदारी की जा सके।
31 मार्च को इस शैक्षणिक सत्र का समापन हो जाएगा लेकिन अब तक यह राशि विद्यालयों को उपलब्ध नहीं हो पाई है। शिक्षकों की परेशानी बढ़ गई है लेकिन शिक्षा विभाग के उच्च पदस्थ बेफिक्र हैं। बड़ी संख्या वाले विद्यालयों का उदाहरण लें तो तीन माह के लिए चौक-खल्ली का खर्च 1100 रुपये, शौचालय, यूरिनल व टंकी की साफ सफाई मद में 12,000 से 13,000 रुपये, रंग-रोगन में कम से कम 50,000 रुपये, रजिस्टर और पंजी की खरीदारी में 5500 रुपये स्वतंत्रता दिवस और गणतंत्र दिवस के अवसर पर मिठाई मद में कम से कम 10,000 रुपये का खर्च आता है।
एकल-शिक्षकीय विद्यालयों की स्थिति चिंताजनक
सबसे चिंताजनक स्थिति उन एकल-शिक्षकीय विद्यालयों की है जिनका संचालन पारा शिक्षक कर रहे हैं। सीमित मानदेय में कार्यरत पारा शिक्षकों के लिए निजी जीवन के खर्चों के साथ विद्यालय संचालन का भार उठाना संभव नहीं हो पा रहा है। नतीजतन, इन विद्यालयों की स्थिति दयनीय बनी हुई है। विद्यालयों में प्रतिदिन चौक-खल्ली की आवश्यकता होती है।
इसके अलावा साफ-सफाई के लिए झाड़ू, शौचालय की सफाई सामग्री, हाथ धोने के लिए साबुन, सभी कक्षाओं की छात्र शिक्षक उपस्थिति पंजी कैश बुक, एमडीएम भोजन दैनिक पंजी, लेजर बुक, मीटिंग बुक आदि तथा प्रतिवर्ष लगभग 40 से 45 प्रकार के विभिन्न रिकार्ड पंजी की खरीद अनिवार्य होती है। विकास निधि के अभाव में विद्यालयों में रंग-रोगन तक नहीं हो पा रहा है, जिससे कई विद्यालय भवन गंदे और जर्जर नजर आ रहे हैं।
केस 1: रखरखाव के अभाव में राजकीयकृत उत्क्रमित मध्य विद्यालय पत्तागायी कांके रांची की स्थिति बदहाल हो चुकी है। रंग-रोगन नहीं होने के कारण यहां की दीवारें जर्जर हो चुकी हैं जबकि खिड़कियां भी ध्वस्त होने के कगार पर है। यहां के छात्र छात्राओं को परेशानी का सामना करना पड़ रहा है लेकिन कार्रवाई के नाम पर नतीजा सिफर है।
केस 2: राजकीयकृत उत्क्रमित उच्च विद्यालय पाली रातू में उगी झाड़ियां व बदहाल दीवारें साफतौर पर यहां की दुर्दशा बयां कर रही हैं। विद्यालय विकास अनुदान राशि नहीं मिलने के कारण यहां रखरखाव का नितांत अभाव है। जिस कारण बरामदे के पास ही झाड़ियां उग आईं हैं और इसी के बीच पठन पाठन का कार्य भी चलता है।
केस 3: राजकीयकृत मध्य विद्यालय टांगर चान्हो रांची की स्थिति तो नारकीय हो चुकी है। छत का प्लास्टर झड़ कर गिर चुका है। प्लास्टर तक नहीं हो पाया है। तस्वीर स्पष्ट बयां कर रही हैं कि यहां की स्थिति क्या है। ऐसी बदहाल व्यवस्था के बीच बच्चों को पढ़ाई करनी पड़ती है। |
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