search

दिल्ली स्मॉग: फेफड़ों के साथ जोड़ों पर भी मार, एम्स, आरएमल समेत देश के बड़े डॉक्टरों की चेतावनी

Chikheang 2025-10-9 23:06:39 views 1239
  

दिल्ली-एनसीआर की जहरीली हवा के बढ़ते स्तर रूमेटॉयड आर्थराइटिस के मामलों में तेजी का कारण बन रहे हैं।



नई दिल्ली, अनुराग मिश्र।
राजधानी में एक नया स्वास्थ्य संकट उभर रहा है। प्रदूषण अब चुपचाप रूमेटॉयड आर्थराइटिस (आरए) जैसी गंभीर ऑटोइम्यून बीमारी को जन्म दे रहा है। देश के अग्रणी रूमेटोलॉजिस्टों ने यह चौंकाने वाले साक्ष्य पेश किए कि दिल्ली-एनसीआर की जहरीली हवा और PM2.5 प्रदूषण के बढ़ते स्तर रूमेटॉयड आर्थराइटिस के मामलों में तेजी का कारण बन रहे हैं। विज्ञापन हटाएं सिर्फ खबर पढ़ें

क्या है रूमेटॉयड आर्थराइटिस?
रूमेटॉयड आर्थराइटिस (आरए) एक दीर्घकालिक ऑटोइम्यून विकार है, जिसमें शरीर की प्रतिरक्षा प्रणाली अपनी ही ऊतकों पर हमला करने लगती है। विशेष रूप से जोड़ों पर। इससे लगातार दर्द, सूजन, अकड़न और विकलांगता जैसी स्थितियां पैदा होती हैं। अब तक इसे मुख्य रूप से आनुवंशिक कारणों और इम्यून सिस्टम की गड़बड़ी से जोड़ा जाता था, लेकिन अब पर्यावरणीय कारण खासतौर पर वायु प्रदूषण को भी इसका बड़ा ट्रिगर माना जा रहा है।

दिल्ली, जो दुनिया के सबसे प्रदूषित 10 शहरों में शामिल है, अब इस बीमारी का नया हॉटस्पॉट बन गया है। यूरोप, चीन और अब भारत में हुए हालिया अध्ययनों से यह सामने आया है कि PM2.5 जैसे सूक्ष्म प्रदूषक, जो फेफड़ों की गहराई तक पहुंच जाते हैं, न सिर्फ हृदय और श्वसन रोगों बल्कि रूमेटॉयड आर्थराइटिस जैसे ऑटोइम्यून विकारों से भी जुड़े हैं।
एम्स की डा. उमा कुमार का कहना है कि हमने देखा है कि प्रदूषित इलाकों में रहने वाले ऐसे मरीजों में आरए के मामले बढ़ रहे हैं, जिनका कोई पारिवारिक या आनुवंशिक इतिहास नहीं है। प्रदूषक तत्व शरीर में सूजन पैदा करते हैं, जिससे जोड़ों को नुकसान पहुंचता है और बीमारी तेजी से बढ़ती है। ये टॉक्सिन्स शरीर में सिस्टेमिक इंफ्लेमेशन और ऑक्सीडेटिव स्ट्रेस को बढ़ाते हैं, जिससे इम्यून सिस्टम ओवरएक्टिव हो जाता है। यह एक पब्लिक हेल्थ इमरजेंसी है, जिसे अब नज़रअंदाज़ नहीं किया जा सकता।
फोर्टिस हॉस्पिटल के डॉ. बिमलेश धर पांडे का कहना है कि प्रदूषण और आर्थराइटिस, खासकर रूमेटॉयड आर्थराइटिस के बीच सीधा संबंध है। वायु प्रदूषक सूजन, ऑक्सीडेटिव स्ट्रेस और ऑटोएंटीबॉडी के निर्माण को बढ़ाते हैं। कई अध्ययनों में पाया गया है कि PM2.5, नाइट्रोजन ऑक्साइड्स और ओजोन के संपर्क से आरए का जोखिम बढ़ता है, खासकर उन लोगों में जिनमें आनुवंशिक संवेदनशीलता अधिक होती है। ट्रैफिक से भरी सड़कों के पास रहना भी इस बीमारी का खतरा बढ़ाता है।”
यूरोपीय मेडिकल जर्नल (2025) में प्रकाशित एक ऐतिहासिक अध्ययन ने पहली बार यह जीन संबंधी प्रमाण दिया कि वायु प्रदूषण और ऑटोइम्यून बीमारियों, जिनमें आरए शामिल है, के बीच गहरा रिश्ता है। टू-सैंपल मेंडेलियन रैंडमाइजेशन पद्धति से किए गए इस अध्ययन ने यह स्पष्ट किया कि सामान्य प्रदूषक तत्व इम्यून सिस्टम की कार्यप्रणाली को बिगाड़ते हैं और बीमारियों के प्रसार में अहम भूमिका निभाते हैं।

सर गंगाराम अस्पताल के डॉ. नीरज जैन ने चेताया कि पहले हम RA को मुख्यतः आनुवंशिक मानते थे, लेकिन प्रदूषण ने इस सोच को बदल दिया है। पर्यावरणीय बोझ अब संतुलन बिगाड़ रहा है, स्वस्थ व्यक्ति भी मरीज बन रहे हैं। यह तथ्य कि युवा वर्ग में बिना पारिवारिक इतिहास के RA बढ़ रहा है, एक गंभीर चेतावनी है।”
डॉ. राम मनोहर लोहिया अस्पताल के प्रो. डॉ. पुलिन गुप्ता ने कहा कि हम केवल आरए के अधिक मामलों को नहीं, बल्कि उसकी गंभीरता को भी बढ़ते हुए देख रहे हैं। जिन मरीजों को PM2.5 के अधिक संपर्क में रहना पड़ता है, उनमें बीमारी अधिक आक्रामक और तेजी से बढ़ने वाली रूप में सामने आ रही है। शहरी इलाकों में घटते हरित क्षेत्र इस समस्या को और बढ़ा रहे हैं, क्योंकि लोग अब प्राकृतिक सुरक्षा कवच से वंचित हो रहे हैं।”
इंद्रप्रस्थ अपोलो अस्पताल, नई दिल्ली की वरिष्ठ विशेषज्ञ और सम्मेलन अध्यक्ष डॉ. रोहिणी हांडा का कहना है कि यह केवल चिकित्सीय मुद्दा नहीं, बल्कि सामाजिक संकट है। यदि प्रदूषण के स्तर पर अंकुश नहीं लगाया गया, तो हम एक ऐसी पीढ़ी की ओर बढ़ रहे हैं जो रोकथाम योग्य ऑटोइम्यून बीमारियों से जकड़ जाएगी। इससे होने वाला दर्द, उत्पादकता में गिरावट और स्वास्थ्य पर बोझ देश के लिए भारी होगा।
विशेषज्ञों ने यह भी स्पष्ट किया कि रूमेटॉयड आर्थराइटिस जैसी ऑटोइम्यून बीमारियां जीवनभर रहने वाली होती हैं। इनका स्थायी इलाज नहीं, केवल प्रबंधन संभव है। प्रदूषण की बढ़ती मार के साथ दिल्ली-एनसीआर और अन्य प्रदूषित क्षेत्रों में आरए के मामलों में तीव्र वृद्धि की संभावना है। फिलहाल अनुमान है कि भारत की वयस्क आबादी का लगभग 1% हिस्सा RA से पीड़ित है, लेकिन यदि प्रदूषण प्रमुख ट्रिगर बना रहा, तो ये आंकड़े कई गुना बढ़ सकते हैं।
चीन में हुए शोध में पाया गया कि लंबे समय तक PM2.5 के संपर्क में रहने से आरए विकसित होने का जोखिम 12 से 18 प्रतिशत तक बढ़ जाता है। यूरोप में भी प्रदूषित शहरों में रहने वालों में ऑटोइम्यून विकारों की दर काफी अधिक दर्ज की गई। भारत में चिकित्सक अब यही प्रवृत्ति देख रहे हैं। दिल्ली के लोग श्वसन संकट और ऑटोइम्यून बीमारियों, दोनों के दोहरे खतरे का सामना कर रहे हैं।
like (0)
ChikheangForum Veteran

Post a reply

loginto write comments
Chikheang

He hasn't introduced himself yet.

510K

Threads

0

Posts

1610K

Credits

Forum Veteran

Credits
167686