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विधि संवाददाता, प्रयागराज। इलाहाबाद हाई कोर्ट ने चार दशक पुराने हत्या मामले में अभियुक्त पति को दोषमुक्त कर दिया है। सत्र अदालत मथुरा ने वर्ष 1984 में आजीवन कारावास की सजा सुनाई थी।
इसे कोर्ट ने कानून की दृष्टि में दोषपूर्ण मानते हुए रद कर दिया। न्यायमूर्ति राजीव गुप्ता तथा न्यायमूर्ति देवेंद्र सिंह (प्रथम) की खंडपीठ ने कहा कि पुलिस के समक्ष किया गया इकबालिया बयान कानूनी रूप से साक्ष्य के तौर पर मान्य नहीं है और केवल इसी आधार पर किसी व्यक्ति को अपराधी नहीं ठहराया जा सकता।
मामले से जुड़े तथ्य यह हैं कि राया थाने में राधाचरण शर्मा नामक व्यक्ति ने खुद थाने पहुंचकर अपनी पत्नी प्रमिला की हत्या की सूचना दी थी। कहा कि दो फरवरी 1983 की रात हुए विवाद के बाद उसने गुस्से में आकर फरसे से पत्नी की गर्दन काट दी।
अधीनस्थ अदालत ने इसी लिखित कबूलनामे और परिस्थितियों को आधार मानते हुए 19 जनवरी 1984 को उम्रकैद सुनाई थी। इसके खिलाफ अपील दाखिल की गई। हाई कोर्ट ने कहा कि ट्रायल कोर्ट ने पुलिस के सामने दी गई स्वीकारोक्ति को सुबूत मानकर गंभीर कानूनी चूक की।
अभियोजन पक्ष यह साबित करने में विफल रहा कि घटना के वक्त आरोपित वास्तव में घर में मौजूद था। साक्ष्य अधिनियम की धारा 106 का हवाला देते हुए कोर्ट ने कहा कि आरोपित पर सुबूत का भार तब तक नहीं डाला जा सकता, जब तक अभियोजन अपने बुनियादी तथ्यों को ठोस तरीके से पेश न कर दे। |
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