दाल पर बनेगी भारत म्यांमार की बात दोहरी रणनीति पर केंद्र सरकार का जोर (फाइल फोटो)
जागरण ब्यूरो, नई दिल्ली। भारत में दाल की बढ़ती मांग और आपूर्ति के बीच बने अंतर से निपटने के लिए केंद्र सरकार दोहरी रणनीति पर काम कर रही है। एक ओर उपभोक्ताओं को सस्ती और निर्बाध दाल उपलब्ध कराने पर जोर है, वहीं दूसरी ओर किसानों के हितों की सुरक्षा और घरेलू उत्पादन को मजबूत करने की कोशिश की जा रही है।
इसी संतुलन को साधते हुए भारत ने म्यांमार को भरोसा दिया है कि वह हर साल कम से कम साढ़े तीन लाख टन दाल का आयात जारी रखेगा। इसमें ढाई लाख टन उड़द और एक लाख टन तूर दाल शामिल है। घरेलू या आयात नीति में बदलाव के बावजूद इस आयात में कटौती नहीं की जाएगी, ताकि सप्लाई बाधित न हो।इसी भरोसे को बनाए रखने के लिए उपभोक्ता मामलों की सचिव निधि खरे इन दिनों म्यांमार दौरे पर हैं।
क्या है मकसद?
मकसद साफ है कि जब तक घरेलू उत्पादन पूरी तरह मांग के अनुरूप नहीं हो जाता, तब तक भरोसेमंद देशों से आयात कर उपभोक्ताओं को महंगाई से बचाया जाएगा और साथ ही मिशन मोड में उत्पादन बढ़ाकर किसानों की आय को मजबूत किया जाएगा।
दरअसल, भारत की दाल जरूरतों को देखते हुए म्यांमार समेत कुछ देश दलहन की खेती करते हैं। सरकार के सामने सबसे बड़ी दिक्कत संतुलन बनाए रखने की है। आयात खुला रखने पर किसानों को दाम गिरने का डर रहता है, जबकि आयात पर सख्ती करते ही उपभोक्ताओं को महंगाई का सामना करना पड़ता है।
इसी कारण सरकार ऐसी रणनीति अपना रही है, जिसमें रणनीतिक आयात के जरिए बाजार को स्थिर रखा जाए और साथ ही घरेलू उत्पादन को इतना मजबूत किया जाए कि भविष्य में आयात पर निर्भरता कम हो।इसी दिशा में सरकार ने छह वर्षीय \“दलहन आत्मनिर्भरता मिशन\“ शुरू किया है।
बढ़ेगा दलहन का रकबा
इस मिशन का लक्ष्य 2030-31 तक दलहन का रकबा बढ़ाकर 310 लाख हेक्टेयर करना, उत्पादन को 350 लाख टन तक पहुंचाना और औसत उपज 1130 किलोग्राम प्रति हेक्टेयर करना है। इस योजना पर करीब 11,440 करोड़ रुपये खर्च किए जाएंगे। हालांकि, इस मिशन से उन देशों में कुछ बेचैनी है जो भारत के लिए दाल का उत्पादन करते हैं।
भारत उन्हें स्पष्ट करना चाहता है कि आत्मनिर्भरता का प्रयास किसी देश के खिलाफ नहीं है और जब तक जरूरत रहेगी, आयात जारी रहेगा।आंकड़ों के मुताबिक, चालू वित्त वर्ष में देश का कुल दलहन उत्पादन करीब 252 लाख टन आंका गया है, जबकि मांग 270 से 280 लाख टन के बीच है।
यानी अच्छे उत्पादन के बावजूद 20-30 लाख टन का अंतर बना हुआ है। उड़द और तूर जैसी दालें, जिनका उत्पादन कुछ राज्यों और खास मौसम पर निर्भर करता है, बाजार में सबसे ज्यादा उतार-चढ़ाव पैदा करती हैं। इसी कारण 2025 में भारत का कुल दाल आयात रिकार्ड लगभग 70 लाख टन तक पहुंच गया।
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