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मुद्दा धर्म नहीं, हिंदू-मुस्लिम नहीं... न्याय का है : डा. आनंद रंगनाथन

deltin33 1 hour(s) ago views 81
  

बीडीएस इंटरनेशनल स्कूल में विकसित भारत की राह पर मोटिवेशनल कार्यशाला मे पैनल डिस्केशन करते  मुख्य अतिथि डॉक्टर आनंद रंगनाथन। जागरण



जागरण संवाददाता, मेरठ। पेशे से वैज्ञानिक, मन से लेखक, हिंदू अधिकारों को लेकर मुखर वक्ता डा. आनंद रंगनाथन ऐसे व्यक्तित्व हैं, जो करोड़ों देशवासियों के मन में बसे सवालों को राष्ट्रीय फलक पर बेबाकी से उठाते हैं और जवाब भी मांगते हैं। कुछ के जवाब मिले तो अन्य के मिलने का इंतजार व कोशिश जारी है। शनिवार को वे बीडीएस इंटरनेशनल स्कूल में नई पीढ़ी को उनकी जिम्मेदारियों, चुनौतियों, संभावनाओं और उनके अनुरूप जरूरी तैयारियों का अहसास कराने पहुंचे। रिपोर्टर अमित तिवारी से बातचीत में उन्होंने मन के उन सवालों को एक बार फिर बाहर ही नहीं निकाला, बल्कि समाज के समक्ष भी जवाब तलाशने की चुनौती रखी। आप भी पढ़िए...

आप एक वैज्ञानिक हैं, लेकिन समाज, इतिहास, शिक्षा और राजनीति पर भी उतनी ही मुखरता से बोलते हैं। क्या आपके भीतर दो व्यक्तित्व हैं?

विज्ञान ऐसी प्रक्रिया है जिसमें बहुत अधिक धैर्य चाहिए। हमारी प्रयोगशाला है, टीम है और हम मोलिक्यूलर बायोलाजी और बायोटेक्नोलाजी के क्षेत्र में कार्य कर रहे हैं। कई बार किसी आइडिया पर चार-पांच वर्ष काम करने के बाद भी कोई परिणाम नहीं निकलता। तब लगता है कि थोड़ी दिशा बदलना जरूरी है। मैंने लगभग 10–15 साल पहले यह महसूस किया कि किसी एक प्रोफेशन में पूरी तरह उलझकर रहने की बजाय एक दूसरा क्षेत्र भी होना चाहिए। इसलिए मैंने लिखना शुरू किया। मेरा मानना है कि अगर आपके पास एक से अधिक रास्ते हों, तो आप स्विच कर सकते हैं। इससे एक ही प्रोफेशन की फ्रस्ट्रेशन आपके लिए बोझ नहीं बनती।

आप हिंदू समाज से जुड़े मुद्दों पर काफी मुखर हैं। जाति, भाषा, स्थानों में बंटे देश को एकजुट करने में कैसी सफलता को लेकर आशान्वित हैं?

मैं कोई विशेष अभियान नहीं चला रहा। जो मुझे सही लगता है, वही कहता हूं। एक बात स्पष्ट करना जरूरी है कि यह मुद्दा हिंदू बनाम मुस्लिम का नहीं है। यह न्याय और भेदभाव का प्रश्न है। जब मैंने तथ्यों के साथ यह समझा कि संवैधानिक, कानूनी, शैक्षणिक और सामाजिक स्तर पर अगर किसी समुदाय के साथ व्यवस्थित भेदभाव हो रहा है, तो वह हिंदुओं के साथ है, तब मैंने इस पर बोलना शुरू किया। वर्तमान भारत सरकार को हम प्रो-हिंदू मानते हैं लेकिन उन्होंने भी उन भेदभावों को नहीं हटाया जो पिछली सरकारों में रही हैं।

दो दिन पहले ही उच्चतम न्यायालय का शर्मनाक जजमेंट आया है, जिसमें आरटीई यानी शिक्षा का अधिकार केवल हिंदुओं द्वारा संचालित स्कूलों पर ही इसके लिए आब्लीगेशन है कि 25 प्रतिशत सीटें रिजर्व करें। मुस्लिम और क्रिस्चयन संगठनों द्वारा संचालित स्कूलों पर यह दायित्व नहीं है? इससे बड़ा भेदभाव और क्या हो सकता है? यह किस तरह का मोरल और एथिकल आदेश है जिसमें सीधे भेदभाव किया गया। यह 2009 से चला आ रहा है। 2011 में संशोधन हुआ लेकिन भाजपा ने भी इसे नहीं हटाया।

अक्सर कहा जाता है कि मौजूदा सरकार प्रो-हिंदू है। इन्हें वोट भी इसी आधार पर मिलते हैं। आप इससे सहमत नहीं दिखते। क्यों?

मैं पिछले कुछ वर्ष से खुले तौर पर यह सवाल करता हूं कि मोदी सरकार का एक भी ठोस प्रो-हिंदू निर्णय बताया जाए। आज तक कोई नहीं बता पाया। सरकार प्रो-इंडिया हो सकती है, प्रो-जस्टिस हो सकती है, लेकिन प्रो-हिंदू नहीं है।

और सच कहूं तो उसे प्रो-हिंदू होना भी नहीं चाहिए। लोकतंत्र की बुनियाद न्याय है। अगर न्याय होगा, तो सबको मिलेगा। 40 हजार मंदिरों को तोड़कर मस्जिद बनाया गया। हो सकता है सब वापस न मिलें पर कोर्ट तक जाने की अनुमति तो हो। वहां भी नहीं जा सकते हैं। लर्मनी में जर्मन, ब्रिटेन में ब्रिटिश रिफ्यूजी नहीं हैं लेकिन भारत में सात लाख कश्मीरी हिंदू रिफ्यूजी हैं और 19 जनवरी को कश्मीर से निकाले जाने की वर्षगांठ हैं। समस्या यह है कि कई मामलों में हिंदुओं को अदालत का दरवाजा खटखटाने का अधिकार तक नहीं दिया गया।

राष्ट्रीय शिक्षा नीति में भारतीय शिक्षण पद्धति को शामिल किया गया है। भारतीय मूल्यों को क्या भविष्य में हम सही तरीके से अपना सकेंगे?

एनईपी पर मैंने यह कहा था कि आप क्या पढ़ाते हैं, उससे अधिक महत्व यह रखता है कि आप कैसे पढ़ाते हैं। इसमें वह समस्या अब 11 वर्ष बाद ठीक होनी शुरू हुई है। अभी भी जो हमारे विलेन हैं उन्हें हमने किताबों में हीरो बना रखा है। जो हमारे हीरोज हैं उनको किताबों में विलेन बना रखा है। अभी भी जिसने नालंदा को जलाया, छह महीने लगे 10 लाख किताबों को जलने में उस विश्वविद्यालय के निकटतम रेलवे स्टेशन का नाम बख्तियार है।

औरंगजेब रोड का नाम बदला लेकिन बाबर रोड अभी भी है। टीपू सुल्तान को अभी भी उसी तरह पढ़ाया जाता है। विडंबना यह है कि देश के बाहर जो आक्रमणकारी रहे, सेसिल रोड्स आदि के खिलाफ वामपंथ उनकी प्रतिमाएं गिराने की मुहिम चलाता है लेकिन जब हमारे देश में कुछ होता है तो शोर मचाते हैं। इन समस्याओं को इस सरकार को ठीक करना होगा।

हिंदू समाज से अपनी बातें खुलकर आप लोग रखते हैं लेकिन मुस्लिम स्कालर्स ऐतिहासिक सुधारों व अन्य विषयों पर मुखर क्यों नहीं हो रहे हैं?

यह सामान्य मानवी प्रवृत्ति है कि जो बिना कुछ किए मिल रहा है उसे क्यों हटाएं। उस समाज से इतना तुष्टिकरण जी लिया है कि वह उससे पीछे नहीं हटना चाहते। देश में गैस सिलेंडर सब्सिडी को छोड़कर दूसरा उदाहरण नहीं मिलता जिसमें कुछ फ्री में मिल रहा है और लोग उसे लेने से मना कर दें। वक्फ कानून का उदाहरण लीजिए। मुझे वक्फ बोर्ड से कोई समस्या नहीं है, वक्फ कानून से है। उसे हथियार बनाया गया। वक्फ कानून ने किसी जमीन को अपना कह दिया तो उसके खिलाफ हम कोर्ट नहीं जा सके। वक्फ ट्रिब्यूनल जाना पड़ता है।

समानांतर सरकार चल रही है। पिछले 10 वर्ष में वक्फ ने 20 लाख करोड़ का कब्जा क्लेम किया है। यह हमारे लोकतंत्र में न्यायोचित कैसे हो सकता है। अगर तुष्टिकरण में इसे नहीं हटाना चाहते तो सनातन ऐक्ट भी बनाइए। वैसे तो हर मस्जित सनातन भूमि पर है लेेकिन जब सनातन ऐक्ट के तहत उसे अपना बनाया जाएगा और कोर्ट के स्थान पर सनातन ट्रिब्यूनल जाना पड़ेगा तो 24 घंटे में सब ठीक हो जाएगा। केवल हिंदू मंदिर ही स्टेट कंट्रोल में हैं और लाखों-करोड़ों रुपये वहां से निकाले जाते हैं। देश के हर तट पर आने वाले विदेशी सबसे पहले हिंदू मंदिरों में जाते थे क्योंकि पूरी इकोनोमी व डिफेंस वहीं से संचालित थी। इसीलिए अंग्रेजों ने हिंदू मंदिरों के ईको सिस्टम को कंट्रोल किया। उनके बाद कांग्रेस और बीजेपी कर रही है। नहीं हटा सकते तो मुस्जिदों और चर्चों को भी कंट्रोल में लाएं। यही न्याय व समानता की बात है न कि हिंदू व मुस्लिम।

मोदी सरकार से इन्हीं सुधारों की अपेक्षा थी पर बहुमत के बाद भी वह क्यों नहीं कर पा रहे हैं?

वहीं मैं भी खोज रहा हूं। बोलता और पूछता हूं तो लोग मुझे एंटी मोदी का खिताब देने लगे हैं। मैं यही सवाल पिछले 15–20 वर्षों से पूछ रहा हूं। पहले कांग्रेस से पूछता था, आज भाजपा से पूछ रहा हूं। यह किसी व्यक्ति या पार्टी का मुद्दा नहीं है। सवाल सिर्फ इतना है कि देश के लिए सही क्या है। जो सही है है उसे कीजिए।

संस्कृत शिक्षा और भाषा को लेकर चल रहे विवादों को आप कैसे देखते हैं? क्या संस्कृत सेतु बन सकती है?

आज भाषा को अनावश्यक रूप से विभाजन का औजार बना दिया गया है। तमिलनाडु में भी अभी फिल्म परशक्ति आई है जिसमें हिंदी थोपने के खिलाफ आंदोलन को दिखाया गया है। इस पर विवाद भी शुरू हो गया है। बहुत कम लोग जानते हैं कि डा. भीमराव अंबेडकर ने कहा था कि स्वतंत्रता के 15 साल बाद संस्कृत को भारत की आधिकारिक भाषा बननी चाहिए। संस्कृत और आरएसएस का विरोध करने वाले क्या आंबेडकर के खिलाफ भी बोलेंगे? हम व्यक्तियों की पूजा तो करते हैं, लेकिन उनके विचारों का पालन नहीं करते। एक वैज्ञानिक के रूप में मैं मानता हूं कि भाषा संवाद का माध्यम है। असली सवाल यह है कि हम क्या कह रहे हैं, न कि किस भाषा में।

नई पीढ़ी, खासकर जेन-जी, को भारतीय मूल्यों के साथ कैसे आगे बढ़ना चाहिए? क्या हम उन्हें सिखा पा रहे हैं या उन्हें खुद सीखने के रास्ते खोजने चाहिए?
मेरा जवाब लोगों को चौंका सकता है। उन्हें यानी जेन-जी को कुछ मत सिखाइए। हम एक समाज के रूप में कई मोर्चों पर असफल रहे हैं और अपनी असफलताओं का बोझ नई पीढ़ी पर डाल देते हैं। आज की पीढ़ी के पास ज्ञान, संसाधन और तकनीक है। एक मोबाइल फोन से वे दुनिया का सबसे शिक्षित व्यक्ति बन सकते हैं। उन्हें अपना रास्ता खुद चुनने दीजिए। बुद्धिमत्ता सापेक्ष होती है।

कक्षा में बैठकर हम सवाल हल कर सकते हैं, लेकिन किसी जंगल में स्थानीय लोग हमसे अधिक सक्षम होंगे। आज जब एआइ और चैटजीपीटी, ग्रोक जैसे टूल्स उपलब्ध हैं, तो हमें यह समझने की जरूरत है कि इस शिक्षा के बाद बच्चे करेंगे क्या। द सेल में छपे जरनल में एमआइटी सहित 18 विश्व स्तरीय प्रयोगशालाओंने मिलकर एआइ की मदद से केवल पांच पांच एलिमेंट लेकर 41 मिलियन मोलिक्यूल बनाए। उसमें से 20, फिर सात और अंतत: चार मोलिक्यूल बनाए। यह अस्पतालों से निकलने वाले इन्फेक्शंस के खिलाफ सबसे प्रभावी एंटीबायोटेक हैं। मनुष्य को 70 वर्ष लगे उसे एआइ ने 15 दिन में कर दिया। ऐसे में हम जैसे वैज्ञानिकों का क्या काम रह जाएगा? हमें उससे आगे सोचना होगा कि हम क्या करेंगे?

एआइ के कारण नौकरियों के खत्म होने का डर कितना वास्तविक है?

हमें डरने के बजाय एआइ के साथ सह-अस्तित्व की योजना बनानी होगी। हमें इसे एआइ यानी आर्टीफिशियल इंटेलिजेंस की जगह नई टर्मिनोलाजी देनी होगी। एआइ को एक अलग विषय के रूप में पढ़ाया जाना चाहिए—सिर्फ टूल्स के रूप में नहीं, बल्कि यह समझाने के लिए कि इंसान और एआइ साथ कैसे काम करेंगे। यह मनुष्य के हजारों वर्ष के विजडम का निचोड़ एआइ है। स्वीडन में चार्टर्ड एकाउंटेंट्स का 32 प्रतिशत कार्य एआइ कर रहा है। नौकरियां जाने का डर है और जायज है लेकिन इससे डरना नहीं चाहिए।
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