छत्रपति शाहू जी महाराज विश्वविद्यालय (सीएसजेएमयू) के परिसर में शुक्रवार को भाषायी विविधता और आधुनिक तकनीक के संगम का एक अनूठा दृश्य देखने को मिला। विश्वविद्यालय के स्कूल ऑफ लैंग्वेजेज़ और शिक्षा मंत्रालय के अंतर्गत भारतीय भाषा समिति के संयुक्त तत्वावधान में दो दिवसीय राष्ट्रीय संगोष्ठी का भव्य शुभारंभ हुआ।
"भारतीय भाषा परिवार और कृत्रिम बुद्धिमत्ता: इक्कीसवीं सदी की चुनौतियां एवं संभावनां" विषय पर आधारित इस संगोष्ठी ने देश के विद्वानों को एक मंच पर लाकर तकनीक और परंपरा के बीच सेतु बनाने का सफल प्रयास किया।
कार्यक्रम का आगाज विश्वविद्यालय के सीनेट हॉल में मां सरस्वती की वंदना और दीप प्रज्वलन के साथ हुआ। स्कूल ऑफ लैंग्वेजेज़ के निदेशक डॉ. सर्वेश मणि त्रिपाठी ने संगोष्ठी के महत्व पर प्रकाश डाला।
उन्होंने रेखांकित किया कि भारत की सांस्कृतिक और भाषायी विविधता ही उसकी असली ताकत है और वर्तमान डिजिटल युग में इस विरासत को संजोने के लिए तकनीकी नवाचारों की आवश्यकता है।
विचारों के आदान-प्रदान के क्रम में रांची विश्वविद्यालय के प्रोफेसर जंग बहादुर पाण्डेय ने भारतीय संस्कृति और भाषाओं को हमारी मूल पहचान बताया। उन्होंने गीता के दर्शन का उदाहरण देते हुए कहा कि ज्ञान ही व्यक्ति को सही दिशा देता है, और आज के समय में कंप्यूटर तथा एआई (AI) का ज्ञान वह अनिवार्य साधन है जिसे अपनाना समय की मांग है।
वहीं, हैदराबाद विश्वविद्यालय के प्रोफेसर एस. अरुल्मोजी ने एआई को एक दोधारी तलवार की तरह बताया। उन्होंने कहा कि जहां यह तकनीक भाषाओं के लिए चुनौती है, वहीं यदि इसका सही उपयोग हो तो यह भाषायी संरक्षण और वैश्विक पहुंच के लिए असीम द्वार खोल सकती है।
तकनीकी पहलू पर जोर देते हुए गढ़वाल केंद्रीय विश्वविद्यालय के प्रो.राकेश चन्द्र रयाल ने स्पष्ट किया कि एआई पूरी तरह से डेटा और निर्देशों पर आधारित है। उन्होंने इस बात पर बल दिया कि यदि हमें भारतीय भाषाओं को भविष्य के लिए सुरक्षित करना है, तो भाषा के विशेषज्ञों को तकनीकी रूप से साक्षर बनाना अनिवार्य होगा।

|