जागरण संवाददाता, कानपुर। IIT Kanpur Suicide: आईआईटी कानपुर में छात्रों की लगातार आत्महत्याओं ने बड़े सवाल खड़े किए हैं। कानपुर से ज्यादा छात्र संख्या वाले आईआईटी मद्रास में पिछले सालों के दौरान किसी भी छात्र ने आत्महत्या नहीं की और आईआईटी बांबे में केवल एक छात्र ने जीवन की डोर तोड़ी है। जबकि इन संस्थानों का हर साल प्लेसमेंट भी आइआइटी कानपुर से बेहतर रहा है और प्रवेश काउंसिलिंग में भी छात्रों की पहली पसंद आईआईटी बांबे बना हुआ है। आईआईटी ग्लोबल एल्युमिनाइ सपोर्ट ग्रुप के संस्थापक धीरज सिंह के अनुसार आईआईटी कानपुर को आत्मावलोकन की जरूरत है और पूरे सिस्टम को सुधारना होगा।
छात्रों के मानसिक स्वास्थ्य प्रबंधन को लेकर आइआइटी के छात्रों, अभिभावकों और पूर्व छात्रों की ओर से सवाल खड़े किए जा रहे हैं। आईआईटी कानपुर से 2004 में डिग्री हासिल करने वाले धीरज सिंह पिछले कई सालों से छात्रों के कल्याण मुद्दों पर काम कर रहे हैं। उन्होंने ग्लोबल आईआईटी एलुमिनाइ सपोर्ट ग्रुप बना रखा है। वह बताते हैं कि पिछले दो साल के दौरान आईआईटी जैसे संस्थानों में छात्रों के आत्महत्या की घटनाएं बढ़ी हैं। जो बड़ी चूक और लापरवाही की ओर इशारा कर रही हैं।
आईआईटी जैसे संस्थानों के शिक्षक और प्रशासक अभी समस्या के असली कारणों तक नहीं पहुंच पाए और समाधान का उपाय भी नहीं लागू कर सके हैं। पिछले दो साल के दौरान आईआईटी कानपुर में नौ छात्रों ने आत्महत्या की है जबकि आईआईटी खड़गपुर में सात और आइआइटी बांबे में केवल एक छात्र ने ऐसा अप्रत्याशित कदम उठाया है।
इस दौरान आईआईटी मद्रास में एक भी छात्र ने आत्महत्या नहीं की जबकि आईआईटी मद्रास में छात्रों की संख्या 12500 तक है जो आईआईटी कानपुर के नौ हजार के मुकाबले एक तिहाई ज्यादा है। इसलिए जब तक मानसिक स्वास्थ्य को व्यक्तिगत समस्या मानने के बजाय संस्थागत चुनौती के तौर पर नहीं लिया जाएगा और सभी मिलकर प्रयास नहीं करेंगे तब तक स्थितियां सामान्य नहीं होंगी।
आईआई संस्थानों में छात्र संख्या
- आईआई कानपुर - नौ हजार
- आईआई मद्रास - 12 500
- आईआई बांबे - 11 हजार
- आईआई खड़गपुर - 14500
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