सम्मेलन में लोक सभा अध्यक्ष ओम बिरला का स्वागत करते विधान सभा अध्यक्ष सतीश महाना। सूचना विभाग
लोक सभा अध्यक्ष बोले, पीठासीन अधिकारी का आचरण दलगत राजनीति से हटकर होना चाहिए न्यायपूर्ण
राज्यपाल आनंदीबेन ने कहा, लोकतांत्रिक मर्यादाओं को नई दिशा देगा पीठासीन अधिकारियों का सम्मेलन
राज्य ब्यूरो, लखनऊ। विधान भवन में सोमवार को तीन दिवसीय 86वें अखिल भारतीय पीठासीन अधिकारी सम्मेलन का शुभारंभ हुआ। इसका उद्घाटन राज्यपाल आनंदीबेन पटेल व लोक सभा अध्यक्ष ओम बिरला ने किया। मुख्य संबोधन में ओम बिरला ने कहा कि विधायिका में जनता का विश्वास बढ़ाना हम सबकी सामूहिक जिम्मेदारी है।
राज्य विधान सभाओं की कार्यवाही का समय लगातार घटने पर चिंता जताते हुए कहा कि राज्य विधानमंडलों के लिए निश्चित और पर्याप्त समय सुनिश्चित किया जाना आवश्यक है। सदन जितना अधिक चलेगा, उतनी ही अधिक सार्थक, गंभीर और परिणामोन्मुख चर्चा संभव होगी।
पीठासीन अधिकारी चाहे किसी भी राजनीतिक दल से निर्वाचित होकर आए हों, लेकिन सदन का संचालन करते समय उनका आचरण दलगत राजनीति से ऊपर, पूरी तरह न्यायपूर्ण और निष्पक्ष होना चाहिए। निष्पक्षता केवल होनी ही नहीं चाहिए, बल्कि वह स्पष्ट रूप से दिखाई भी देनी चाहिए।
विधान सभा मंडप में आयोजित उद्घाटन सत्र में लोक सभा अध्यक्ष ने कहा कि विधायिका के माध्यम से ही जनता की आकांक्षाएं और आवाज शासन तक पहुंचती हैं। सूचना एवं संचार प्रौद्योगिकी और इंटरनेट मीडिया के युग में जनप्रतिनिधियों के आचरण पर जनता की सतत् निगाह रहती है।
ऐसे में संसदीय शिष्टाचार, अनुशासन और सदन की प्रामाणिकता बनाए रखना और भी बड़ी जिम्मेदारी बन गई है। उन्होंने कहा कि अखिल भारतीय पीठासीन अधिकारी सम्मेलन जैसे मंच लोकतांत्रिक संस्थाओं के बीच सहयोग और समन्वय को मजबूत करते हैं, जिससे शासन व्यवस्था अधिक प्रभावी बनती है। इन सम्मेलनों से देशभर में नीतियों और कल्याणकारी उपायों में सामंजस्य स्थापित करने में मदद मिलती है।
पीठासीन अधिकारियों का दायित्व है कि सदन में सभी सदस्यों, विशेषकर नए और युवा विधायकों को पर्याप्त अवसर दिया जाए, ताकि विधानमंडल जनता की समस्याओं को उठाने का सबसे प्रभावी मंच बना रहे। सम्मेलन में 28 राज्यों, तीन केंद्र शासित प्रदेशों की विधान सभाओं और छह विधान परिषदों के पीठासीन अधिकारी भाग ले रहे हैं।
राज्यपाल आनंदीबेन पटेल ने प्रदेश की सांस्कृतिक, ऐतिहासिक और लोकतांत्रिक विरासत का उल्लेख करते हुए कहा कि यह प्रदेश वैदिक संस्कृति, दर्शन और लोकतांत्रिक चेतना का जीवंत केंद्र रहा है। विधानमंडल जनआकांक्षाओं को स्वर देने का पवित्र मंच है और सदन की सार्थकता केवल बहसों की संख्या से नहीं, बल्कि लोककल्याण के प्रति दृष्टिकोण, तथ्यपूर्ण व समाधानपरक चर्चा से निर्धारित होती है।
यदि संवाद समाधान में परिवर्तित हो, तभी संसदीय लोकतंत्र सशक्त और विश्वास योग्य बनता है। सदन की कार्यवाहियों में व्यवधान को एक गंभीर चुनौती बताते हुए कहा कि इससे जनहित के महत्वपूर्ण विषयों पर चर्चा बाधित होती है और लोकतंत्र के प्रति जनता का विश्वास प्रभावित होता है।
उन्होंने विचारों की भिन्नता को लोकतंत्र की शक्ति बताते हुए असहमति को लोकतांत्रिक सौंदर्य के रूप में स्वीकार करने का आह्वान किया। उन्होंने कहा कि पीठासीन अधिकारियों का सम्मेलन लोकतांत्रिक मर्यादाओं को नई दिशा देगा।
राज्यपाल ने कहा कि लोकसभा अध्यक्ष ने संसद और विधान सभाओं के संचालन को लेकर महत्वपूर्ण सुझाव दिया है कि उनकी समय-सीमा निश्चित होनी चाहिए। जब विधानसभाएं चार, पांच या दस दिनों तक चलती हैं, तब भी कई बार विधायकों को अपनी बात रखने का पर्याप्त अवसर नहीं मिल पाता।
हम सभी का दायित्व बनता है कि हम इस पर गंभीरता से अमल करें। उन्होंने अपेक्षा की कि सम्मेलन में इस विषय पर ठोस निर्णय लिया जाएगा, ताकि विधायी कार्य अधिक प्रभावी, सुव्यवस्थित और जनहितकारी बन सकें। इस मौके पर ‘उत्तर प्रदेश विधान सभा की संसदीय पद्धति और प्रक्रिया’ पुस्तक का विमोचन भी हुआ।
राज्य सभा के उपसभापति हरिवंश ने कहा कि उत्तर प्रदेश की भूमि इतिहास, सभ्यता, संस्कृति और अध्यात्म की पावन धरती रही है। काशी, प्रयागराज, अयोध्या, नैमिषारण्य, चित्रकूट व सारनाथ जैसे पवित्र स्थलों ने भारत की सांस्कृतिक चेतना को सदैव दिशा प्रदान की है।
प्रदेश के गौरवशाली स्वरूप को दर्शाने वाले एक संदेश में ‘यूपी नहीं देखा तो इंडिया नहीं देखा’ जैसा प्रभावशाली स्लोगन देखने को मिला, जो प्रदेश की ऐतिहासिक, सांस्कृतिक और आध्यात्मिक महत्ता को सार्थक रूप से प्रतिबिंबित करता है। यह सम्मेलन पीठासीन अधिकारियों के मध्य जीवंत संवाद का एक प्रभावी मंच है।
यह आयोजन वर्ष में एक बार होता है। लोकसभा अध्यक्ष ओम बिरला के प्रोत्साहन एवं मार्गदर्शन में हाल के वर्षों में संसदीय विषयों पर निर्णय, संवाद एवं विचार-विमर्श के अधिक अवसर प्राप्त हुए हैं। |