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बिहार में अब नहीं रहेंगे नीतीश कुमार, CM के राज्यसभा जाने को लेकर क्या चल रही थी परदे के पीछे की राजनीति

जब पूरी दुनिया अमेरिका और ईरान के बीच छिड़ी जंग को देख रही थी, उस बीच बिहार में एक और संभावित जंग को शांति पूर्ण तरीके से सुलझा लिया गया। चौंकिए मत हम बात कर रहे हैं बिहार में हुए शांतिपूर्ण सत्ता परिवर्तन की। 21 सालों से बिहार के मुख्यमंत्री रहे नीतीश कुमार ने दिल्ली कूच करने के लिए पहला कदम भर लिया है। अपनी सेहत और JDU के भविष्य को लेकर छिड़ी बहस के बीच नीतीश कुमार ने दिल्ली जाने की हामी तो भर ही दी। विधानसभा चुनावों से पहले से ही ये चर्चा जोरों पर थी कि बीजेपी ज्यादा दिनों तक नीतीश कुमार को मुख्यमंत्री बना कर नहीं रखेगी। और ये मौका चुनाव खत्म होने के महज तीन महीनों के भीतर ही आ जाएगा किसी ने सोचा भी नहीं था। राजनीति के एक युग का अंत होने जा रहा है।



लेकिन बीजेपी ने बिहार में NDA गठबंधन के भविष्य को लेकर काफी कुछ सोच रखा था। नीतीश कुमार की कोर टीम से मंथन चला। नीतीश कुमार को भी चर्चा का हिस्सा बनाया गया। नीतीश कुमार की वरिष्ठता को देख कर इतना तो बीजेपी जानती ही थी कि उनका भरोसा जीते ये बदलाव संभव नहीं था।



सूत्रों के मुताबिक, नीतीश कुमार का राज्यसभा जाना और मुख्यमंत्री पद छोड़ना कोई अकस्मात लिया गया फैसला नहीं हैं। इसकी पटकथा विधानसभा चुनावों से पहले ही लिखी जा चुकी थी। तभी तो नीतीश कुमार के नामांकन के वक्त गृहमंत्री अमित शाह खुद पटना में थे और उन्होंने कहा कि नीतीश कुमार का कार्यकाल बिहार के इतिहास में स्वर्णिम पन्नों में लिखा जाएगा, क्योंकि उन्होने बिहार को जंगलराज से मुक्त करा कर सुशासन दिया।




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बतौर केंद्रीय मंत्री, सांसद, विधायक और सीएम के एक लंबे राजनीतिक कार्यकाल में कोई दाग नहीं लगा। मैं और मेरे NDA के सभी साथी दिल्ली में दिल से उनका स्वागत करेंगे।



सूत्रों की मानें तो राज्यसभा के चुनाव पूरे होने तक नीतीश कुमार के सीएम पद से इस्तीफे की संभावना नहीं नजर आ रही है। ‎इसलिए बीजेपी के पास पर्याप्त समय है मुख्यमंत्री चुनने का। बीजेपी का सीएम और दो डिप्टी सीएम का फार्मुला तय है। तय ये भी है कि नीतीश कुमार के बेटे निशांत कुमार डिप्टी सीएम बनेंगे। लेकिन बीजेपी ने संकेत दिए है कि बीजेपी का सीएम भी नीतीश कुमार की सहमति लेने के बाद ऐलान किया जाएगा। संभावना है कि अमित शाह और नीतीश कुमार की बैठक के बाद किसी नाम पर सहमति बने, लेकिन वो भी बंद लिफाफे में जाएगा।



सूत्र बताते हैं कि बीजेपी जल्दी से जल्दी ये सत्ता परिवर्तन चाहती है। बीजेपी इस कोशिश में लगी है कि सीएम का ऐलान भी जल्दी हो जाए और सत्ता उनके हाथ में जल्दी ही आ जाए। इस परिवर्तन के पीछे जेडीयू के एक खेमे ने भी बड़ी भूमिका निभायी बीजेपी आलाकमान ये जानता है कि जेडीयू का एक खेमा जो नहीं चाहता है कि नीतीश कुमार अभी सत्ता त्याग कर दिल्ली चलें जाएं वो कहीं नीतीश कुमार को प्रभावित न करे। अमित शाह का बिहार पहुंचना अकस्मात नहीं था। तीन शीर्ष गठबंधन के नेताओं को राज्यसभा के लिए नामांकन दाखिल करना था। बीजेपी अध्यक्ष नीतीन नबीन, मुख्यमंत्री नीतीश कुमार और रालोपा के अध्यक्ष उपेन्द्र कुशवाहा के साथ खड़े रह कर गठबंधन की मजबूती दिखानी थी।



बीजेपी को लग रहा है कि बंगाल चुनावों से पहले बिहार और बंगाल की 200 किमी से भी ज्यादा लंबी सीमा पर तैनाती और कड़ाई जरुरी। इसलिए नौकरशाही का कंट्रोल बीजेपी के हाथ में होना चाहिए। बीजेपी को भरोसा है कि अगर नीतीश कुमार के पहले 5 सालों के शासन को छोड़ दें तो इन 20 सालों में बीजेपी का नेतृत्व होता तो बिहार के विकास की कहानी कुछ और ही होती। इसलिए अब सत्ता हाथ में आ रही है तो बीजेपी को भरोसा है कि अब बंधे हाथों से काम नहीं करना पड़ेगा।



परस्पर सहयोग से हो रहा ये परिवर्तन बिहार की राजनीति में उथल पुथल को रोकेगा। साथ ही नीतीश कुमार जो बिहार की राजनीति से सम्मानजनक विदाई चाहते थे उन्हें इससे बेहतर फेयरवेल नहीं मिलता। उनका कद, उनकी गरीमा बनाए रखते हुए पीएम मोदी पहले भी उनके नेतृत्व में भरोसा करते रहे थे और और अब भी नीतीश कुमार को उनके कद के अनुरुप सम्मान देने में बीजेपी पीछे नहीं रही है।



परिवर्तन यात्रा 2026 : विकसित पश्चिम बंगाल का मार्ग
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