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‘गोल्डन आवर’ में इलाज न मिलने से सड़क हादसों में दिल्ली में गई 1617 जानें, 649 पैदल यात्रियों की मौत

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दिल्ली में वर्ष 2025 में 1617 लोगों की जान चली गई।



अनूप कुमार सिंह, नई दिल्ली। राष्ट्रीय राजधानी में सड़क दुर्घटनाएं गंभीर और बड़ा जनस्वास्थ्य संकट बन चुकी हैं। सड़क परिवहन एवं राजमार्ग मंत्रालय के आंकड़ों अनुसार वर्ष 2025 में 1617 लोगों की जान चली गई थी। इनमें 649 पैदल यात्रियों की मौत हुई जो सड़क दुर्घटना में होने वाली कुल का लगभग 40 प्रतिशत है।

कार व निजी वाहन से 92, दो‑पहिया वाहनों से 75 और भारी मालवाहक वाहनों से 43 मौतें हुईं। बस व सार्वजनिक परिवहन से 250, आटो, ई‑रिक्शा, साइकिल से 200 और हिट‑एंड‑रन या अज्ञात वाहन से होने वाली 308 मौतें शामिल हैं। विशेषज्ञों का कहना है कि तेज रफ्तार, लापरवाही व पोस्ट‑क्रैश केयर की कमी मौतों को बढ़ा रही है, जबकि समय पर इलाज और बेहतर सड़क सुरक्षा हजारों जानें बचाई जा सकती थीं।

स्पष्ट है कि सड़क हादसों में यदि गोल्डन आवर में त्वरित और प्रभावी उपचार सुनिश्चित किया जाए तो हर वर्ष हजारों जान बचाई जा सकती हैं। देश की बात करें तो देश में हर साल होने वाली 4.80 लाख से अधिक सड़क दुर्घटनाओं में 1.72 लाख से अधिक मौत होती है। यानी हर दिन औसतन 470 से अधिक लोगों की जान सड़क हादसों में जाती है।

इनमें करीब तीस प्रतिशत की जान सिर्फ इसलिए चली जाती है क्यों कि उन्हें ‘गोल्डन आवर’ यानी हादसे के बाद का पहला एक घंटा में जिसे जीवन और मृत्यु के बीच निर्णायक समय माना जाता है, के दौरान उचित उपचार नहीं मिल पाता।
उपचार की देरी से बढ़ रही मौत

अखिल भारतीय आयुर्विज्ञान संस्थान (एम्स) नई दिल्ली के जय प्रकाश नारायण एपेक्स ट्रामा सेंटर के आपातकालीन चिकित्सा विभाग द्वारा नीति आयोग के सहयोग से तैयार ‘इमरजेंसी एंड इंजरी केयर एट डिस्ट्रिक्ट हॉस्पिटल्स इन इंडिया’ में ऐसे मामलों को लेकर इमरजेंसी केयर सिस्टम की कमियां उजागर की गई हैं।

रिपोर्ट बताती हैं कि देश में प्री-हास्पिटल केयर, एम्बुलेंस नेटवर्क और ट्रॉमा ढांचे की कमी से ‘डिले इन डेफिनिटिव केयर’ (निर्णायक उपचार में देरी) होता है। जिससे ट्रामा मौतों की संख्या बढ़ती हैं, रिपोर्ट में कहा गया कि इनमें से 30 प्रतिशत मौत को उचित समय पर सही उपचार मिलने पर रोका जा सकता था।

केंद्रीय सड़क परिवहन और राजमार्ग मंत्री नितिन गडकरी ने भी कई मंचों पर कहा है कि लगभग 30 प्रतिशत मौतें गोल्डन आवर में उपचार न मिलने से होती हैं। ट्रांसपोर्टेशन रिसर्च एंड इंजरी प्रिवेंशन प्रोग्राम (टीआराइपीपी) और आइआइटी दिल्ली की रिपोर्टें बताती हैं कि पोस्ट-क्रैश केयर को मजबूत किए बिना देश में सड़क दुर्घटनाओं में होने वाली मौतों की संख्या में कमी करना संभव नहीं है।
दो पहिया वाहन सबसे अधिक प्रभावित

देश में हर वर्ष सड़क हादसों में सबसे अधिक दो पहिया वाहन दुर्घटना में मौत होती है, उसके बाद पैदल यात्रियों की संख्या है।

[*]दो पहिया वाहन – लगभग 44 प्रतिशत
[*]पैदल यात्री – लगभग 20.4 प्रतिशत
[*]कार,जीप, टैक्सी – लगभग 19.6 प्रतिशत
[*]ट्रक व भारी मालवाहक वाहन – लगभग 7 प्रतिशत
[*]बस – लगभग 4 प्रतिशत
[*]अन्य वाहन (ऑटो, साइकिल, तीन पहिया, अज्ञात आदि) – लगभग 5 प्रतिशत


‘रोड सेफ्टी इन इंडिया: स्टेटस रिपोर्ट’ में भी पोस्ट-क्रैश केयर सिस्टम को मजबूत करने की आवश्यकता पर जोर दिया गया है। रिपोर्ट बताती है कि एंबुलेंस की देरी, ट्रामा सेंटरों की सीमित उपलब्धता और समन्वित डाटा प्रणाली की कमी बड़ी चुनौतियां हैं।

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