अजोला से धान और सब्जियों की बढ़ेगी पैदावार, उर्वरक की खपत होगी आधी
https://www.jagranimages.com/images/2026/02/22/article/image/Jagran-News-(598)-1771746083222_m.webpडॉ. अरविंद कुमार यादव, विशेषज्ञ, कृषि विज्ञान केंद्र, हापुड़। जागरण
ठाकुर डीपी आर्य, हापुड़। जंगली घास अजोला के प्रयोग से धान व सब्जी की फसलों में यूरिया व अन्य पोषक तत्वों की ज्यादातर जरूरत पूरी हो जाएगी। इसके लिए किसानों को कोई अतिरिक्त प्रयास करने की भी जरूरत नहीं होगी।
कृषि विज्ञान केंद्र में अजोला का कल्चर तैयार किया जा चुका है। जिसको खेतों में डालने से यह 24 घंटे में ही धरातल पर फैल जाता है। इससे कम उर्वरक का प्रयोग करके ज्यादा पैदावार लेना संभव हो सकेगा।
वहीं, पैदावार में रसायनों की मात्रा कम लगने से बाजार भाव अच्छा मिलेगा। इसके साथ ही किसानों की लागत कम आएगी, जिससे आय बढ़ेगी।
एक्सपर्ट ने अलग-अलग फसलों पर किया प्रयोग
कृषि विज्ञान केंद्र के वैज्ञानिकों ने सूक्ष्म जंगली पौधा अजोला का धान की फसल में सफल प्रयोग किया था। इस पर दो साल से अनुसंधान चल रहा था। इसमें प्रदेश के पांच केवीके के एक्सपर्ट ने अलग-अलग फसलों पर इसका प्रयोग किया।
उन्होंने पाया कि अजोला का कल्चर मिट्टी मिश्रण वाले स्थिर पानी में डाल दिया जाता है। इससे यह पानी के ऊपर एक सघन परत बना लेता है। यह परत हवा से नाइट्रोजन का शोषण करती है। उक्त नाइट्रोजन पानी में मिलकर धान की फसल की जड़ों तक पहुंच जाता है। नाइट्रोजन के साथ ही अजोला छह प्रकार के सूक्ष्म पोषक तत्वों की भी पूर्ति करता है।
मेरठ के परीक्षितगढ़ स्थित कृषि विज्ञान केंद्र के विशेषज्ञों के साथ मिलकर हापुड़ कृषि विज्ञान केंद्र के विशेषज्ञों ने यह शोध किया था। इससे फसलों में यूरिया व अन्य उर्वरक का प्रयोग आधा करना पड़ेगा, जबकि पैदावार करीब 20 प्रतिशत तक बढ़ जाएगी। इसका प्रयोग ऐसी फसलों में किया जाता है, जिनमें ज्यादा निराई-गुड़ाई की जरूरत नहीं पड़ती है।
अगले साल किया जाएगा वितरित
इस साल वेस्ट यूपी के विभिन्न जिलों में 50-50 किसानों को ट्रायल के रूप में प्रयोग करने के लिए दिया जाएगा। उसके बाद धान के आगामी सीजन में इसको प्रदेश के किसानों को काउंटर से उपलब्ध कराया जाएगा।
इसके निचले भाग में सिम्बोइंट के रूप में ब्लू ग्रीन एल्गी सयानोबैक्टीरिया पाया जाता है, जो वायुमंडलीय नाइट्रोजन को परिवर्तित करता है। इसकी नाइट्रोजन को परिवर्तित करने की दर करीब 55 किलोग्राम प्रति हेक्टेयर होती है।
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यह नाइट्रोजन मिट्टी की सेहत के लिए काफी गुणकारी होता है। इसलिए अजोला की खेती फसल और खेत की भूमि दोनों को फायदा होता है। इसका कल्चर तैयार कर लिया गया है। कृषि विज्ञान केंद्रों से अगले साल धान की रोपाई के समय इसको प्रदेश के किसानों को वितरित किया जाएगा।
अजोला को खेत में पानी भरने के बाद डाला जाता है। इसके लिए खेत में 24 घंटे तक स्थिर पानी भरे रखना पड़ता है। एक बार पानी भरने के बाद वह स्थिर हो जाना चाहिए। उसके बाद अजोला पानी की नमी के साथ ही खेत में फैलता रहता है। किसानों की फसल लागत कम करने और पैदावार को रसायनमुक्त करने की दिशा में यह क्रांतिकारी कदम साबित होगा। - डा. अरविंद कुमार यादव, विशेषज्ञ, कृषि विज्ञान केंद्र, हापुड़
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