आज भी रगों में जोश भर देता है दक्ष यज्ञ के विध्वंस से उपजा यह नृत्य, झलकती है वीरभद्र की बहादुरी
https://www.jagranimages.com/images/2026/02/22/article/image/Veeragase-Folk-Dance-1771740298128_m.webpकर्नाटक का अद्भुत \“वीरगासे\“ नृत्य (Image Source: AI-Generated)
लाइफस्टाइल डेस्क, नई दिल्ली। क्या आपने कभी किसी ऐसे नृत्य के बारे में सुना है जिसमें भक्ति के साथ-साथ एक योद्धा का जोश भी झलकता हो? कर्नाटक का \“वीरगासे\“ एक ऐसा ही प्राचीन और बेहद ऊर्जा से भरा शैव लोकनृत्य है। यह सिर्फ लोगों के मनोरंजन का साधन नहीं है, बल्कि यह भगवान शिव के क्रोध और वीरभद्र की बहादुरी का एक जीवंत प्रतीक है।
वीरशैव-लिंगायत परंपरा में इस नृत्य को बहुत ही पवित्र और महत्वपूर्ण माना जाता है, जिसमें गहरी धार्मिक आस्था और \“वीर रस\“ का अनूठा संगम देखने को मिलता है।
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(Image Source: AI-Generated)
दक्ष यज्ञ की पौराणिक कथा से जुड़ा है इतिहास
इस जोशीले नृत्य की जड़ें एक बहुत ही प्रसिद्ध पौराणिक कथा से जुड़ी हैं। कथा के अनुसार, राजा दक्ष ने एक बहुत भव्य यज्ञ का आयोजन किया था, लेकिन उन्होंने भगवान शिव का अपमान किया। इस अपमान से दुखी होकर देवी सती ने आत्मदाह कर लिया। जब शिव जी को यह पता चला, तो वे बेहद क्रोधित हुए।
उन्होंने अपनी जटाओं से वीरभद्र नाम के एक शक्तिशाली रूप को उत्पन्न किया, जिसने जाकर उस पूरे यज्ञ को नष्ट कर दिया। वीरगासे नृत्य इसी घटना की याद में प्रस्तुत किया जाता है। यह धर्म की रक्षा, दैवीय शक्ति और अपार बहादुरी का प्रदर्शन करता है।
एक \“योद्धा-साधु\“ का अद्भुत रूप
वीरगासे करने वाले कलाकारों की वेशभूषा बहुत ही खास और प्रतीकात्मक होती है। उन्हें देखकर ऐसा लगता है जैसे कोई योद्धा और साधु एक ही रूप में सामने खड़ा हो:
[*]पहनावा: कलाकार सिर पर मुकुट या कभी-कभी सफेद पगड़ी पहनते हैं, जिस पर मोरपंख लगा होता है। वे त्याग और आध्यात्मिकता का प्रतीक माने जाने वाले केसरिया रंग के कपड़े पहनते हैं।
[*]श्रृंगार और अस्त्र: उनके गले में रुद्राक्ष की माला और माथे पर भस्म लगी होती है। नृत्य करते समय उनके हाथ में एक खुली हुई तलवार और एक खास तरह का लकड़ी का पट्टा होता है।
भगवान की सेवा है यह नृत्य
परंपरागत रूप से इस नृत्य को वीरशैव या लिंगायत समुदाय के पुरुष ही करते हैं, जिनमें खासकर \“जंगम\“ वर्ग के लोग शामिल होते हैं। वीरगासे प्रस्तुत करने वाले इन कलाकारों को \“वीरकुमार\“ या \“पुरावता\“ भी कहा जाता है। इन नर्तकों के लिए यह कोई आम कला का प्रदर्शन नहीं है, बल्कि यह उनके लिए भगवान की सेवा और एक पवित्र धार्मिक कर्तव्य है।
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