कछुआ तस्करी का गैंग सक्रिय, बिहार-बंगाल के रास्ते श्रीलंका व मलेशिया तक भेजे जा रहे; कोड वर्ड में आदान-प्रदान
https://www.jagranimages.com/images/2026/02/20/article/image/Turtle-Smuggling-Gang-Active-1771570710762_m.webpप्रयागराज से कछुआ की तस्करी विदेशों तक की जा रही है।
जागरण संवाददाता, प्रयागराज। भारतीय नस्ल के कछुओं की तस्करी सिर्फ एक अंतरजनपदीय या अंतरराज्यीय स्तर तक सीमित नहीं हैं, बल्कि तस्करों ने अपना जाल देश की सीमा के बाहर तक फैला रखा है। प्रयागराज व उसके आसपास के जनपदों की नदियों, तालाबाें और झीलों से कछुओं को पकड़कर उन्हें बिहार और बंगाल तक भेजा जाता है। फिर वहां से तस्कर इन्हें चोरी-छिपे श्रीलंका व मलेशिया समेत अन्य देशों में भेज देते हैं। वन विभाग की ओर से की जा रही कछुओं की तस्करी के एक मामले की जांच के दौरान यह बात सामने आई है।
उप वन अधिकारी मामले की कर रहीं विवेचना
28 फरवरी को प्रयागराज रेलवे स्टेशन पर जोधपुर-हावड़ा ट्रेन से करीब 600 कछुए बरामद हुए थे। कछुओं को ले जा रहे सुल्तानपुर जिले के रहने वाले अरुण कुमार, अनीश कुमार, रवि कुमार, जितेंद्र और अमीर को गिरफ्तार किया गया था। वन विभाग ने मुकदमा दर्ज कर आरोपितों को जेल भेजा था। अब वन विभाग की उप प्रभागीय वनाधिकारी संगीता यादव इस मामले की विवेचना कर रहीं हैं।
जांच में कई चौंकाने वाली बातें सामने आईं
मामले में अब तक हुई जांच में कई चौंकाने वाली बात सामने आई है। कछुओं की तस्करी में एक बड़ा गैंग शामिल है, जिसने अपना जाल गांव-गांव फैला रखा है। प्रयागराज, फतेहपुर, अमेठी, रायबरेली समेत आसपास के अन्य जनपदों में सक्रिय इनके सदस्य नदियों, तालाबों और झीलों से कछुओं का शिकार करते हैं। कछुओं को बोरों में भरकर ट्रेन के सहारे बिहार और बंगाल पहुंचाया जाता है। वहां से तस्कर उन्हें श्रीलंका व मलेशिया भेज देते हैं, जहां पर कछुओं का खाने के साथ ही दवाएं बनाने में प्रयोग होता है। तस्करों को विदेश से इन कछुओं के बदले मोटी रकम मिलती है।
कोड वर्ड से कछुओं का होता है आदान-प्रदान
सूत्रों का कहना है कि कछुओं की एक खेप की तस्करी में एक या दो नहीं, बल्कि गैंग के कई सदस्य सक्रिय हैं। यहां तक की एक स्थान से दूसरे स्थान तक पहुंचाने में भी कई जगह गिरोह के सदस्य बदल जाते हैं। जैसे- कोई फतेहपुर से कछुए लेकर ट्रेन में चढ़ा है तो फिर मुगलसराय में दूसरे सदस्य उसे आगे ले जाएंगे। कई बार सदस्य एक दूसरे को जानते ही नहीं। सिर्फ कोड वर्ड से कछुओं का अदान-प्रदान होता है।
अभी कई राज खुलने हैं बाकी
कछुओं की तस्करी से जुड़े तमाम सवाल ऐसे हैं, जिनके जवाब मिलने अभी बाकी है। जैसे- पकड़े गए आरोपियों को कहां से कछुए मिले थे? यह कछुए उन्हें किसे सौंपना था? कछुए पकड़ने वालों से उन्हें कितने रुपये में खरीदा जाता है और उन्हें ले जाने वालों को कितना रुपये मिलता है? तमाम पाबंदियों के बाद भी आखिर तस्कर कैसे देश की सीमा के पास कछुए पहुंचा देते हैं? वन विभाग अपनी विवेचना में इन्हीं सवालों के जवाब खोजेगा।
वन अधिकारी बोलीं- गैंग सदस्यों का पता लगाया जाएगा
उप प्रभागीय वन अधिकारी संगीता यादव का कहना है कि कछुओं की तस्करी के मामले की विवेचना की जा रही है। प्रारंभिक जांच में कछुओं की श्रीलंका व मलेशिया तक तस्करी की बात सामने आई है। इस गैंग में कौन-कौन शामिल है, इसका पता लगाया जाएगा। तस्करों का राजफाश किया जाएगा।
Pages:
[1]