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यूपी में आयुर्वेदिक दवाओं का उत्पादन 20% से कम, गुणवत्ता जांच भी लचर; CAG रिपोर्ट में उठे सवाल

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प्रतीकात्मक तस्वीर



राज्य ब्यूरो, जागरण लखनऊ। प्रकृति की गोद में पलने वाली आयुर्वेद शरीर का कायाकल्प कर देती है। अनकूल वातावरण के बीच निर्धारित मात्रा एवं विधान के तहत सेवन करने पर चमत्कारिक लाभ मिलता है, लेकिन भारत के नियंत्रक एवं महालेखापरीक्षक (सीएजी) की रिपोर्ट में इस चिकित्सा पद्धति की काया जीर्ण शीर्ण मिली है।

उत्तर प्रदेश सरकार ने सितंबर 1999 से अप्रैल 2018 के बीच 130 आयुर्वेदिक और 85 यूनानी दवाओं के उत्पादन का जिम्मा औषधि निर्माणशाला को दिया था, जिसके सापेक्ष सिर्फ 20 प्रतिशत दवाएं बनाई गईं। वहीं, दवाओं की गुणवत्ता की जांच के लिए बने राजकीय औषधि परीक्षण प्रयोगशाला में प्रति सप्ताह सिर्फ एक सैंपल की जांच की गई।

विधानमंडल के दोनों सदनों में गुरुवार को पेश की गई सीएजी की रिपोर्ट के अनुसार राजकीय आयुर्वेदिक एवं यूनानी औषधि निर्माणशाला को 1999 से 2018 के मध्य 388 दवाओं के निर्माण की अनुमति दी गई थी। इसके सापेक्ष निर्माणशाला ने प्रति वर्ष औसतन 19.2 प्रतिशत आयुर्वेदिक व 18.4 प्रतिशत यूनानी दवा बनाई।

इसमें से 16 ऐसी दवाएं बनाई गईं, जो राज्य सरकार की सूची में नहीं थीं। पिछले चार साल में प्रति सप्ताह सिर्फ एक दवा की जांच की गई। सरकार एवं प्रयोगशाला ने जांच का कोई मानक स्थापित नहीं किया। रिपोर्ट बताती है कि 2018-19 और 2022-23 के दौरान सिर्फ 21 जिलों के औषधि निरीक्षकों ने प्रयोगशाला तक सैंपल भेजा।

अस्पतालों की हालत भी चिंताजनक मिली है। चार, 15 और 25 बेडों वाले अस्पतालों में समान मात्रा में दवाएं मंगाई गईं। धन की उपलब्धता के बावजूद कई अस्पतालों ने दवा की खरीद नहीं की। 2018-19 से 2022-23 के मध्य 64.33 करोड़ रुपये की कुल आपूर्ति के सापेक्ष 55.68 करोड़ रुपये की दवाओं की आपूर्ति में निर्धारित दो माह की तुलना में 571 दिन और 11.32 करोड़ में से आठ करोड़ मूल्य की होमियोपैथिक दवाओं की आपूर्ति में 964 दिन की देरी की गई।

आयुर्वेदिक, यूनानी एवं होमियोपैथिक तीनों में फार्मासिस्टों की 80 प्रतिशत से ज्यादा कमी पाई गई। होमियोपैथ में एक भी नर्स नहीं है। 50 बेडों वाले 11 आयुष चिकित्सालयों में 71 प्रतिशत स्टाफ कम मिला।

रिपोर्ट में बजट के जरिये आवंटित खर्च पर सवाल उठाया गया है। रोगियों से वसूले गए शुल्क का उपयोग चिकित्सालयों के रख रखाव और मरीजों के कल्याण में नहीं किया गया। 2015-16 से 2022-23 की अवधि में 50 बेड वाले 25 एकीकृत अस्पताल स्वीकृत किए गए।

2015-16 से 2018-19 की अवधि में स्वीकृत 19 एकीकृत आयुष अस्पतालों में से दिसंबर 2021 में सिर्फ 11 का उद्घाटन किया गया। विलंब होने की वजह से 2023 में संचालन शुरू किया गया। इस अवधि में स्वीकृत 1034 स्वास्थ्य एवं कल्याण केंद्रों में से 219 में बिजली और 528 में इंटरनेट नहीं था। आयुष चिकित्सा महाविद्यालयों में ओपीडी व इंडोर मरीजों की संख्या निर्धारित मानदंडों से कम मिली।
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