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गोरखपुर में मोहन भागवत ने बताया, परिवार ही है राष्ट्र की शक्ति का आधार और संस्कार की पहली पाठशाला

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राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ के कुटुंब स्नेह मिलन कार्यक्रम को संघ प्रमुख ने किया संबोधित



जागरण संवाददाता, गोरखपुर। राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ के सरसंघचालक मोहन भागवत ने कुटुंब व्यवस्था को सामाजिक परिवर्तन का आधार और परिवार को अगली पीढ़ी को संस्कारित व सामाजिक बनाने की पहली पाठशाला बताया है। कहा है कि एक छत और चहारदीवारी में रहने भर से कुटुंब नहीं बनता, बल्कि अपनेपन के भाव से उसका आधार तैयार होता है।

जन्म के कुछ ही समय बाद शिशु को परिवार से जो संस्कार मिलता है, वही उसे सामाजिक बनाता है। संघ प्रमुख यह विचार सोमवार को योगिराज बाबा गंभीरनाथ प्रेक्षागृह में राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ की ओर से आयोजित कुटुंब स्नेह मिलन कार्यक्रम के दौरान रख रहे थे।

उन्होंने कहा कि भारत की विशेषता अपनेपन पर आधारित कुटुंब व्यवस्था है, जबकि पश्चिम में रिश्ते आमतौर पर लेनदेन या करार पर आधारित होते हैं। हमारे यहां व्यक्ति से बड़ा परिवार माना गया है, जबकि विदेशों में व्यक्ति को परिवार से ऊपर रखा जाता है। भारतीय परंपरा में विवाह को ‘कर्तव्य’ माना गया है, ‘करार’ नहीं।

संघ प्रमुख ने परिवार को आर्थिक और सांस्कृतिक शक्ति का केंद्र बताते हुए कहा कि उत्पादन, बचत, व्यवसाय और राष्ट्र की संपत्ति का मूल आधार भी परिवार ही है। इस संदर्भ में उन्होंने देश के दूसरे प्रधानमंत्री लाल बहादुर शास्त्री का उदाहरण दिया।

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बाबा गंभीरनाथ प्रेक्षागृह में आयोजित कुटुंब स्नेह मिलन कार्यक्रम में उपस्थित स्वयं सेवक। सौ.संघ



कहा कि उनके आह्वान पर लोगों ने राष्ट्रहित में अपना सोना-चांदी तक समर्पित कर दिया था। उन्होंने कहा कि सामाजिक शिक्षा, आर्थिक गतिविधियों और संस्कृति के पीढ़ी दर पीढ़ी हस्तांतरण का केंद्र कुटुंब है। परिवार का केंद्र माता होती है, जो पीढ़ी का निर्माण करती है। माता के जरिये ही पुत्र का परिचय भारत माता से होता है। उन्होंने कहा कि हमारे देश में पत्नी को छोड़कर सभी महिलाओं को माता की दृष्टि से देखते हैं जबकि विदेशों में सभी महिलाओं को पत्नी की दृष्टि से देखने की परंपरा है।

उन्होंने स्वयंसेवकों से कहा कि समाज में परिवर्तन लाना है तो परिवारों में संस्कार, संवाद और सामूहिक बैठकों की परंपरा विकसित करनी होगी। वर्ष में दो से तीन बार छोटे-छोटे कुटुंब मिलन समारोह आयोजित करने पर जोर देते हुए उन्होंने कहा कि इससे समरसता और विचारों की स्पष्टता बढ़ती है। मतांतरण की घटनाओंं की चर्चा करते हुए संघ प्रमुख ने कहा कि इसे रोकने के लिए घरों संस्कार होना जरूरी है।

पर्यावरण संरक्षण पर जोर देते हुए मोहन भागवत ने कहा कि इसकी चिंता घर से ही शुरू होनी चाहिए। पानी बचाना, प्लास्टिक हटाना और पौधाराेपण करना परिवार के स्तर पर ही संभव है। भाषा, भूषा, भोजन, भवन और भजन में भारतीयता के पालन पर भी उन्होंने बल दिया तथा स्वदेशी के अधिकाधिक उपयोग का आह्वान किया।

कार्यक्रम में राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ के प्रांत संघचालक डा. महेंद्र अग्रवाल एवं विभाग संघचालक शेषनाथ के अलावा गोरखपुर महानगर के विभिन्न नगरों, चौरी-चौरा व ग्रामीण क्षेत्र के कार्यकर्ता परिवार सहित मौजूद रहे। विभाग कार्यवाह संजय ने अतिथि परिचय प्रस्तुत किया।

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भाषा भाव लेकर आती है
सरसंघचालक मोहन भागवत ने कहा कि भाषा भाव लेकर आती है। घर में अपनी मातृभाषा में बोलना, जिस प्रांत में रहते हैं उसकी भाषा को जानना और देश के स्तर पर एक भाषा जो सबके लिए उपयोगी हो, होना जरूरी है। उन्होंने कहा कि हमें हमें धोती पहनना आना चाहिए। परंपरागत भोजन हमारे अनुकूल होता है। घर का भोजन करने पर उन्होंने जोर दिया। यह भी कहा कि घर में चित्र कैसा होना चाहिए, इसपर भी विचार होन चाहिए। हमारे आदर्शों के चित्र जरूर हमारे घरों में होने चाहिए।।

कुटुंब का साथ नहीं मिलता तो संघ नहीं खड़ा होता
संघ प्रमुख ने कुटुंब व्यवस्था को संघ की मजबूती से जोड़ा। कहा कि कुटुंब का साथ नहीं मिलता तो संघ खड़ा नहीं होता। कुटुम्ब का साथ मिलता है तो कोई भी समाज बड़ा होता है। संघ को जानना है तो संघ की शाखा देखिए, संघ का स्वयंसेवक देखिए, संघ के स्वयंसेवक का कुटुम्ब देखिए। हम जो करते हैं, उसे आचरण में लाते हैं। संघ का वर्णन शब्दों में बहुत कठिन है।
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