दो सीटें, 6 साल और छह सांसद... देश की राजनीति में एक दुर्लभ उदाहरण कैसे बन गया बंगाल
https://www.jagranimages.com/images/2026/02/16/article/image/image-(34)-1771261868275_m.webpदेश की राजनीति में एक दुर्लभ उदाहरण कैसे बन गया बंगाल
राज्य ब्यूरो, जागरण, कोलकाता। बंगाल की संसदीय राजनीति में इन दिनों एक अनोखी \“गिनती\“ चर्चा का विषय बना हुआ है। दो सीटें और छह साल में छह सांसद। राज्य की दो राज्यसभा सीटों पर एक ही कार्यकाल के भीतर तीन-तीन बार चेहरे बदले गए हैं, जो न केवल बंगाल बल्कि देश की राजनीति में एक दुर्लभ उदाहरण बन गया है।
आगामी अप्रैल में राज्य की पांच राज्यसभा सीटें खाली हो रही हैं, जिससे यह सवाल गहरा गया है कि क्या तृणमूल कांग्रेस इस बार ऋतब्रत बनर्जी और साकेत गोखले पर दोबारा भरोसा जताएगी या नए चेहरों की एंट्री होगी।
इस्तीफों का दौर और बदलता चेहरा
वर्तमान में ऋतब्रत बनर्जी जिस सीट का प्रतिनिधित्व कर रहे हैं, वहां सबसे पहले दिनेश त्रिवेदी सांसद थे। 2021 के विधानसभा चुनाव से ठीक पहले त्रिवेदी ने \“अंतरात्मा की आवाज\“ पर इस्तीफा दे दिया था, जिसके बाद पूर्व नौकरशाह जवाहर सरकार को भेजा गया।
हालांकि, आरजी कर कांड के बाद जवाहर सरकार ने भी असंतोष जताते हुए पद छोड़ दिया, जिससे ऋतब्रत को मौका मिला। दूसरी ओर, साकेत गोखले की सीट पर पहले नाट्यकर्मी अर्पिता घोष थीं, जिन्होंने पार्टी के निर्देश पर इस्तीफा दिया। उनके बाद गोवा के पूर्व मुख्यमंत्री लुइजिन्हो फलेरियो आए, लेकिन उन्होंने भी 2023 में पद त्याग दिया, जिसके बाद साकेत गोखले को सदन भेजा गया।
साकेत और ऋतब्रत के भविष्य पर सस्पेंस
पार्टी के भीतर इन दोनों सांसदों के भविष्य को लेकर मंथन जारी है। साकेत गोखले फिलहाल कानूनी विवादों और मानहानि के एक मामले में मुआवजे की किश्तें भरने को लेकर चर्चा में हैं, जिसके लिए पार्टी के अन्य सांसदों के वेतन से भी सहयोग लिया गया। वहीं, ऋतब्रत बनर्जी ने पिछले एक साल में सदन के भीतर अपने प्रदर्शन से नेतृत्व को प्रभावित किया है।
हालांकि, तृणमूल का एक खेमा उन्हें राज्य की राजनीति में वापस लाकर विधानसभा चुनाव लड़ाने का पक्षधर है, जबकि दूसरा खेमा उनकी राष्ट्रीय स्तर की समझ को देखते हुए उन्हें दिल्ली में ही बनाए रखना चाहता है।
ममता बनर्जी का अंतिम निर्णय
बीते छह वर्षों में इन दो सीटों पर हुए बार-बार के बदलावों ने कालीघाट और कैमाक स्ट्रीट (पार्टी मुख्यालय) को सतर्क कर दिया है। बार-बार के उपचुनावों और नियुक्तियों की जगह पार्टी अब स्थिरता की तलाश में है। अंततः साकेत और ऋतब्रत की किस्मत का फैसला ममता बनर्जी ही करेंगी। क्या तृणमूल इन \“अस्थिर\“ सीटों पर निरंतरता लाएगी या फिर से बदलाव का कोई नया रिकार्ड बनेगा, यह देखना दिलचस्प होगा।
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