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भगवान कब और कैसे देते हैं दर्शन? जानें जीवन को सार्थक बनाने का दिव्य फॉर्मूला

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कलियुग श्रेष्ठ बुद्धि वाला कहलाता है



आचार्य नारायण दास (आध्यात्मिक गुरु, मायाकुंड, ऋषिकेश)। राजा निमि की जिज्ञासा साधारण जिज्ञासा नहीं, अपितु मानव-चेतना की शाश्वत खोज है- भगवान कौन हैं, कैसे प्रकट होते हैं और मनुष्य उनसे अपने जीवन को कैसे सार्थक करे? महाराज निमि ने विनय, श्रद्धा और जिज्ञासा अनुरूप मधुर वाणी से नौ योगीश्वरों से सादर निवेदन किया- कस्मिन् काले स भगवन् किं वर्णः कीदृशो नृभिः।

नाम्ना वा केन विधिना पूज्यते तदिहोच्यताम्॥
हे योगीश्वरो! कृपया बताइए कि भगवान किस काल में कौन-सा वर्ण और स्वरूप धारण करते हैं और मनुष्य किन नामों तथा विधियों से उनकी उपासना कर परम कल्याण को प्राप्त करते हैं?

महाराज निमि का प्रश्न काल, कर्म और करुणा के उस रहस्य को जानने की उत्कंठा थी, जिसके द्वारा भगवान युग-युग में मानवता का पथ प्रशस्त करते हैं। इस गूढ़ जिज्ञासा का समाधान करते हुए नौवें योगीश्वर करभाजन ने तत्वपूर्ण वाणी में कहा-

हे राजन! यह संपूर्ण जगत कालचक्र की महाधारा में प्रवाहित है। यह काल चार युगों-सतयुग, त्रेता, द्वापर और कलियुग के रूप में स्वयं को प्रकट करता है। प्रत्येक युग में भगवान अपनी अनंत अनुकंपा से उस युग की मानसिकता, सामर्थ्य और आवश्यकतानुरूप भिन्न-भिन्न वर्ण, नाम, रूप और उपासना-पद्धति को स्वीकार करते हैं, जिससे जीव सहजता से परम सत्य की ओर उन्मुख हो सके।

ऋषिवर्य करभाजन महाभाग ने युगों के परिवर्तन के साथ मानव जीवन की आंतरिक यात्रा को उपदेशित किया। उन्होंने बताया कि सतयुग, त्रेता, द्वापर और कलियुग केवल कालखंड नहीं, बल्कि मनुष्य की मानसिक अवस्था, आचार और साधना-पद्धति के द्योतक हैं।

सतयुग में जब धर्म अपने चारों चरणों पर स्थित था, भगवान का श्वेत वर्ण मन की निर्मलता और पूर्ण संतुलन का प्रतीक है। जटाधारी, वल्कलवसनधारी प्रभु ध्यानमग्न साधक के आदर्श हैं। यह युग सिखाता है कि जब जीवन में संयम, वैराग्य और समदृष्टि हो, तब ध्यान स्वयं समाधान बन जाता है। जीवन-प्रबंधन का सूत्र यहां स्पष्ट है- भीतर की शांति ही बाहरी स्थिरता की जननी है।

त्रेतायुग में कर्म का उदय हुआ। रक्तवर्ण भगवान यज्ञपुरुष के रूप में सक्रियता, उत्तरदायित्व और कर्तव्य-बोध का संदेश देते हैं। यह युग बताता है कि जीवन केवल चिंतन से नहीं, बल्कि सद्कर्म और अनुशासन से पुष्ट होता है। यज्ञ यहां प्रतीक है-स्वार्थ की आहुति देकर लोकमंगल के लिए कर्म करने का।
द्वापरयुग में भगवान का श्याम स्वरूप प्रेम, सौंदर्य और संबंधों की पराकाष्ठा है।

शंख-चक्र-गदा-पद्म धारण किए श्रीहरि यह संकेत देते हैं कि शक्ति और करुणा का संतुलन ही सुशासन है। वैदिक-तांत्रिक समन्वय से की गई उपासना जीवन-प्रबंधन का यह सूत्र देती है कि परंपरा और नवाचार दोनों का संतुलित प्रयोग करना चाहिए। कलियुग में भगवान गौरवर्ण होकर भगवान्नाम-प्रेम का पाठ पढ़ाएंगे। जो व्यक्ति श्रद्धा से हरिनाम संकीर्तन करता है, वही कलियुग श्रेष्ठ बुद्धि वाला कहलाता है।

मुनिवर्य करभाजन का यह विवेचन केवल अतीत का वर्णन नहीं, बल्कि मानवीय विकास का दर्शन है। श्वेतवर्ण चेतना की शुद्धि का, रक्तवर्ण कर्म की ऊर्जा और श्यामवर्ण प्रेम और समर्पण का द्योतक है। ये तीनों ही जीवन के क्रमिक सोपान हैं। अंत में समुद्धृत श्लोक यह परम सत्य प्रतिपादित करता है कि जो भक्त अनन्य भाव से प्रभु के चरणों में आश्रित होता है, उसके जीवन से पाप और विक्षेप स्वतः विलीन हो जाते हैं।

ईश्वर हृदय में विराजमान होकर जीवन को परिशुद्ध कर देते हैं। यही भागवत-धर्म का प्रबंधन-सूत्र है कि जब लक्ष्य स्पष्ट हो और भाव शुद्ध, तब जीवन स्वयं सुचारु हो जाता है। महाराज निमि ने इस दिव्य उपदेश को केवल सुना नहीं, अपितु उसे जीवन का आधार बना लिया। नव योगीश्वरों के अंतर्धान होने के पश्चात उन्होंने भागवत-धर्म को अपने आचरण में उतारकर परम गति प्राप्त की।

ततोऽन्तर्दधिरे सिद्धाः सर्वलोकस्य पश्यतः।
राजा धर्मानुपतिष्ठन्नवाप परमं गतिम्॥

इस दिव्य आध्यात्मिक संवाद से हम सभी को यह शिक्षा लेनी चाहिए कि धर्मशास्त्र और महापुरुषों के उपदेश को श्रवण-मनन द्वारा आचरण मे उतार कर मानव जीवन के समुत्कर्ष का मार्ग प्रशस्त करना चाहिए।

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