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वंदे मातरम् केवल स्मृति नहीं, भारत के भविष्य का पथप्रदर्शक: सुनीता हलदेकर

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संजय कुमार, जागरण रांची। राष्ट्र सेविका समिति की अखिल भारतीय सह कार्यवाहिका सुनीता हलदेकर ने रविवार को रांची में कहा कि वंदे मातरम् केवल दो शब्द नहीं, बल्कि संपूर्ण गीत राष्ट्रीय चेतना जागृत करता है। इसकी वास्तविक महत्ता संपूर्ण गीत में निहित है। पूरी रचना हमें राष्ट्रीयता, संस्कृति और आध्यात्मिक ऊंचाइयों तक ले जाती है जहां प्रकृति, संस्कृति, ज्ञान और शक्ति एक साथ विद्यमान हैं।

वंदे मातरम् भारत की आत्मा का स्वर है। सुनीता हलदेकर रविवार को रांची में दैनिक जागरण से वंदे मातरम् के विषय पर बातचीत कर रहीं थीं। उन्होंने कहा कि 150 वर्षों बाद भी वंदे मातरम् केवल स्मृति भर नहीं है, बल्कि यह भारत के भविष्य का पथप्रदर्शक है। यह हमें सिखाता है—राष्ट्र एक जीवंत सांस्कृतिक सत्ता है। राष्ट्र-सेवा केवल कर्तव्य नहीं, तपस्या और साधना है।

मातृभूमि केवल भूमि नहीं, चेतना, पहचान और अस्तित्व है। केंद्र सरकार की ओर से इस गीत के संपूर्ण रूप को जो सम्मान मिला है, वह केवल इतिहास का सम्मान नहीं, यह भारतीय सभ्यता के पुनर्जागरण का संकेत है। इस गीत में भारतमाता को लक्ष्मी (समृद्धि), सरस्वती (ज्ञान) और दुर्गा (शक्ति) इन तीनों रूपों के समन्वय के रूप में चित्रित किया गया है।

उल्लेखनीय है कि 10 फरवरी 2026 को भारत सरकार ने घोषणा की है कि अब वंदे मातरम् के सभी छह अंतरे (लगभग 3 मिनट 10 सेकंड) राष्ट्रीय गीत से पूर्व राष्ट्रीय कार्यक्रमों में गाए जाएंगे। राष्ट्रपति के आगमन-प्रस्थान, राष्ट्रीय ध्वज कार्यक्रम, पद्म पुरस्कार समारोह तथा सभी सरकारी आयोजनों में इसका गायन होगा। विद्यालयों में दैनिक प्रार्थना वंदे मातरम् से प्रारंभ होगी। हलदेकर ने कहा कि यह कोई दंडात्मक आदेश नहीं, बल्कि एक सांस्कृतिक पुनर्स्थापना है।

सुनीता हलदेकर ने कहा कि अनगिनत ज्ञात-अज्ञात क्रांतिकारी वीरों और वीरांगनाओं ने भारत की स्वतंत्रता के लिए बलिदान दिया। उनके लिए और उनकी प्रेरणास्रोत माताओं, पत्नियों, बहनों और पुत्रियों के लिए यह गौरव और सम्मान का विषय है।

आरएसएस के संस्थापक बालक केशव हेडगेवार ने अपने स्कूली शिक्षा के दौरान ही 1906 में नागपुर के नील सिटी हाईस्कूल में ब्रिटिश शिक्षाधिकारी के स्वागत में “वंदे मातरम्” गाकर सबको चौंका दिया था। इसलिए संघ के शताब्दी वर्ष में वंदे मातरम की अनिवार्यता डॉक्टर हेडगेवार के लिए अमूल्य सम्मान है।

राष्ट्र सेविका समिति की संस्थापिका लक्ष्मीबाई केलकर (मौसीजी) का स्वप्न था कि वंदे मातरम् राष्ट्रगीत बने। इसी कारण समिति के प्रत्येक कार्यक्रम का समापन वंदे मातरम् से होता है। वंदे मातरम का सभी छह छंद गाने का निर्णय केंद्र सरकार द्वारा लेने पर मौसीजी का यह स्वप्न साकार हुआ है।

वंदे मातरम् का गायन भारत के मूल चित्त की चिरंतन लयबद्ध संगीत, शस्त्र, शास्त्र और दिव्य मंत्र बने और भारतमाता विश्व के दरबार में पुनः प्रतिष्ठित हों यह राष्ट्र सेविका समिति का संकल्प है। राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ ने भी वंदे मातरम् के 150 पूरे होने पर इसके संबंध में एक प्रस्ताव भी पारित किया है।
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