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मुजफ्फरपुर की नीतू तुलस्यान ने लीची को बनाया कला का आधार, महिलाओं को मिल रहा रोजगार

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मुजफ्फरपुर की कलाकार नीतू तुलस्यान लोगों तक पहुंचा रहीं लीचीपुरम आर्ट! सौ. स्वयं



अमरेंद्र तिवारी, मुजफ्फरपुर । मन में घुली लीची की मिठास अब कलाकारी में दिख रही। लीचीपुरम आर्ट में उसकी खूबसूरती और रंगत उकेरी जा रही। इसे शुरू किया है नीतू तुलस्यान ने। गमछे पर शुरू कला अब साड़ी, चादर, हैंडबैग आदि पर लीची थीम के रूप में सज रही।

मेहंदी-हल्दी और शादी में दुल्हन के लिए ऐसी साड़ियां मंगाई जा रही हैं। महज 10 वर्ष की उम्र से ब्रश और रंगों से खेलने वाली नीतू की कला को मां मंजू सर्राफ ने पहचाना और प्रेरित किया। सास सुलोचना तुलस्यान व ससुर शिव तुलस्यान का सहयोग मिला तो बल मिला।
उपराष्ट्रपति ने की थी पेंटिंग की सराहना

नीतू बताती हैं कि लीची के बागों के बीच पली-बढ़ी हूं। बागों में घूमना, फलों को निहारना आकर्षित करता था। फलों को देखकर बार-बार मन करता कि जिस तरह अन्य फल-फूलों को कपड़े और कैनवास पर उतारा जाता है तो लीची को क्यों नहीं? पिछले साल लीचीपुरम अभियान के संस्थापक पर्यावरणविद् सुरेश गुप्ता से मुलाकात हुई तो उन्होंने भी इसके लिए प्रेरित किया और पेंटिंग में लीची को शामिल करने का विजन दिया।

तत्काल उन्होंने पांच साड़ियों पर पेंटिंग का आर्डर दिया। इसके बाद एक सोच विकसित हुआ और काम आगे बढ़ा। उन्होंने निशुल्क प्रशिक्षण केंद्र ज्ञानदीप में बच्चियों के साथ मिलकर लीची को केंद्र में रखकर कला पर काम करना शुरू किया।

पिछले साल जब उपराष्ट्रपति डा. सीपी राधाकृष्णन का मुजफ्फरपुर आगमन हुआ तो उनके बनाए लीचीपुरम शाल और पेंटिंग से सम्मानित किया गया।

अब उनके यहां स्कूल बैग, जूट बैग, पार्टी बैग, होम डेकोर के सामान, बेडशीट, साड़ियां, यहां तक कि पूजा-सामग्री पर भी मिथिला, वरली, मंडाला और कलमकारी शैली के माध्यम से लीची के डिजाइन उकेरने शुरू कर दिए हैं। अभी 25 प्रशिक्षित लड़कियों के माध्यम से लीचीपुरम आर्ट पर काम हो रहा है।
कई जगह लीचीपुरम आर्ट पर प्रदर्शनी

नीतू का कहना है कि 2025 में नालंदा–राजगीर में शक्ति बाजार में आयोजित प्रदर्शनी में उन्हें आमंत्रित किया गया था। उन्होंने बैग, कपड़े, साड़ी, चादर, टी-पाट, क्राकरी और ज्वेलरी पर सजाई गई पेंटिंग को प्रदर्शित किया था।

2025 में ही एस्पायर फार हर और भीम एप द्वारा बेंगलुरु में इंटरप्रेन्योरशिप मेले में लीचीपुरम आर्ट को शामिल करने के लिए आमंत्रित किया गया था। लोगों ने लीची-डिजाइन वाले उत्पादों को हाथोंहाथ लिया।

राष्ट्रीय लीची अनुसंधान केंद्र में दो बार लीचीपुरम आर्ट की प्रदर्शनी लगाई जा चुकी है। नीतू का कहना है कि एक गमछे पर लीचीपुरम आर्ट बनाने में 200-250 का खर्च आता है, जिसकी बिक्री 300 में हो रही है। वहीं साड़ी पर 2500 से 11000 तक खर्च आता है। इसकी बिक्री तीन हजार से 15 हजार तक होती है।
ज्ञानदीप के माध्यम से दे रहीं प्रशिक्षण

नीतू ने वर्ष 2018 में ज्ञानदीप प्रशिक्षण केंद्र की स्थापना की थी। वहां जरूरतमंद बच्चियों को निशुल्क शिक्षा के साथ कौशल विकास का अवसर दे रही हैं। वह कहती हैं कि सरैयागंज में रहने के दौरान अगल-बगल के मोहल्ले में बच्चियों को भटकते देखती थी।

मन में विचार आता था कि क्यों न इन्हें पढ़ा-सिखा आत्मनिर्भर बनने का रास्ता दिखाया जाए। इस सोच के साथ पांच लड़कियों को पढ़ाना शुरू किया। स्कूली शिक्षा के साथ पेंटिंग से जोड़ा।

वर्ष 2018 से 2026 तक लगभग 500 बच्चियों को निशुल्क शिक्षा के साथ कला के माध्यम से आत्मविश्वास और स्वावलंबन की दिशा में आगे बढ़ाया। 2020 से प्रशिक्षण लेने वाली नाव्या कुमारी आज एक स्कूल में आर्ट टीचर हैं। अपने हुनर के बल पर घर-परिवार संभाल रही हैं। पिता के निधन के बाद पेंटिंग सीख नाजिया परवीन भी मां का सहारा बन गई हैं।
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