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Mahashivratri 2026: महाशिवरात्रि पर पं. प्रदीप मिश्रा ने बताया शिव तत्व का विज्ञान; ऐसे करें पार्थिव शिवलिंग पूजन, पूरी होगी हर मनोकामना

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महाशिवरात्रि पर करें पार्थिव शिवलिंग पूजन, दूसरी तस्वीर में पंडित प्रदीप मिश्रा।



डिजिटल डेस्क, भोपाल। शिवलिंग इस पूरी धरती की सबसे अनूठी, रहस्यमयी और वैज्ञानिक संरचना है। यह एक ऐसा निराकार गोलाकार पिंड है जो अपने सूक्ष्म आकार में संपूर्ण अनंत ब्रह्मांड का प्रतीक बन जाता है। वास्तव में, यदि हम आध्यात्मिक और वैज्ञानिक दृष्टि से सूक्ष्मता से विचार करें तो यह विशाल प्रकृति ही शिव का साक्षात साकार रूप है और इसका कण-कण में फैला विस्तार ही शिवत्व है।

सीहोर में स्थित कुबेरेश्वर धाम के कथावाचक पं. प्रदीप मिश्रा कहते हैं कि शिव और प्रकृति कोई दो भिन्न सत्ताएं नहीं हैं; वे एक-दूसरे के पूरक भी हैं और परस्पर आबद्ध भी हैं। वे ही इस जीवन के आधार हैं, वे ही इसके संचालक हैं और अंततः उन्हीं के भीतर समस्त जीवन का लय होना सुनिश्चित है।
ब्रह्मांडीय संरचना और शिव तत्व का वैज्ञानिक आधार

पं. प्रदीप मिश्रा के अनुसार हमारे प्राचीन धर्मग्रंथों में वर्णित शिव का स्वरूप किसी कपोल-कल्पना पर आधारित नहीं, बल्कि पूरी तरह वैज्ञानिक और तार्किक सूत्रों पर टिका है। जिस प्रकार कंप्यूटर की जटिल कोडिंग को उसका जानकार ही डिकोड कर सकता है, उसी प्रकार शिव के प्रतीकों को डिकोड करने पर हमें \“पंच महाभूतों\“ का विराट विज्ञान समझ आता है।

[*]आकाश तत्व: शिव के शीश पर विराजमान चंद्रमा अनंत आकाश तत्व का द्योतक है।
[*]जल तत्व: जटाओं से प्रवाहित गंगा साक्षात जल तत्व है।
[*]अग्नि तत्व: उनका तीसरा नेत्र ऊर्जा और अग्नि तत्व का पुंज है।
[*]वायु तत्व: वायु तत्व उनके \“दिगंबर\“ स्वरूप में सर्वत्र व्याप्त है।
[*]पृथ्वी तत्व: नंदी स्थिरता के प्रतीक पृथ्वी तत्व का प्रतिनिधित्व करता है।

स्तुति का दार्शनिक भाव और शिव परिवार का सामंजस्य

प्रसिद्ध स्तुति \“कर्पूरगौरं करूणावतारं\“ का गूढ़ अर्थ भी यही है कि यह समूची सृष्टि सूर्य के प्रकाश में कपूर के समान गौर वर्ण दिखाई देती है और इन पंच तत्वों की करुणा से ही समस्त जीवों का अस्तित्व बना हुआ है। जब तक ये तत्व हमारे भीतर संतुलित हैं, हमारा हृदय धड़कता है; इनके असंतुलित होते ही हमारा अस्तित्व समाप्त हो जाता है।

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शिव परिवार का संदेश

[*]शिवजी का परिवार हमें अत्यंत विषम परिस्थितियों और परस्पर विरोधी स्वभावों के बीच भी सामंजस्य बनाए रखने का संदेश देता है।
[*]चंद्रमा की शीतलता और गले में नाग का विष।
[*]माता पार्वती का वाहन सिंह, तो शिव का नंदी (बैल)।
[*]कार्तिकेय का मयूर (मोर) नाग का भक्षक है, तो नाग स्वयं गणेश जी के मूषक का शत्रु है।
[*]इतनी विषमताओं के बाद भी शिव परिवार शांतचित्त है। यह संकेत है कि मानवीय जीवन के संघर्षों के बीच धैर्य और शांति से संतुलन बनाना ही वास्तविक \“शिवत्व\“ है।

महाशिवरात्रि 2026 : काल का महासंयोग

वर्ष 2026 में महाशिवरात्रि का महापर्व 15 फरवरी को मनाया जा रहा है। इस वर्ष यह शिवयोग, सौभाग्य योग और ध्रुव योग जैसे सात दुर्लभ संयोगों से युक्त है।

वैज्ञानिक दृष्टिकोण से इस रात्रि पृथ्वी का उत्तरी गोलार्द्ध इस प्रकार स्थित होता है कि मनुष्य के भीतर की ऊर्जा प्राकृतिक रूप से ऊपर की ओर गमन करती है। इसलिए जागरण और रीढ़ की हड्डी सीधी रखकर बैठने का विशेष महत्व है।

विशेष समय: निशीथ काल (अर्धरात्रि का समय) शाम 7:00 से 8:00 बजे के बीच इस बार विशेष फलदायी है, जो साधक की हर मन्नत पूरी करने का सामर्थ्य रखता है।

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पार्थिव शिवलिंग निर्माण विधि

पंडित प्रदीप मिश्रा जी (सीहोर वाले) के अनुसार, स्वयं के हाथों से मिट्टी के माध्यम से महादेव को गढ़ना ही स्वयं को प्रकृति की जड़ों से जोड़ना है।

निर्माण की सरल विधि

मिट्टी का चयन: किसी पवित्र स्थान, वृक्ष की जड़ या अपने घर के गमले की मिट्टी लें।

शुद्धीकरण: मिट्टी को गंगाजल से सींचकर पवित्र करें।

परिंडे (मटके) के जल का रहस्य: पंडित जी विशेष रूप से कहते हैं कि शिवलिंग बनाने हेतु जल अपनी रसोई के मटके (परिंडा) से लेना चाहिए। यहां मां अन्नपूर्णा और पितरों का वास होता है। इससे महादेव के साथ पितरों का आशीर्वाद भी प्राप्त होता है और घर के दोष समाप्त होते हैं।

आकार: मिट्टी से पहले जलाधारी और फिर शिवलिंग का निर्माण करें। निर्माण के समय \“श्री शिवाय नमस्तुभ्यं\“ मंत्र का निरंतर जाप करें।

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शिवमहापुराण अनुसार संपूर्ण पूजन विधि एवं सामग्री

शिवमहापुराण के आलोक में पंडित प्रदीप मिश्रा द्वारा बताई गई पूजन विधि अत्यंत कल्याणकारी है

अभिषेक का क्रम

जलाभिषेक: शुद्ध जल से स्नान।

पंचामृत स्नान: क्रमशः कच्चा दूध, दही, शुद्ध घी, शहद और अंत में शक्कर (बूरा)।

अंतिम स्नान: पुनः शुद्ध जल से अभिषेक कर स्वच्छ करें।

त्रिपुंड: चंदन से तीन रेखाएं बनाएं।

विशिष्ट सामग्री अर्पण

अक्षत: 108 अखंडित (बिना टूटे) चावल के दाने।

गेहूं: 21 दाने (वंश वृद्धि और सुख के लिए)।

कमलगट्टे: 5 दाने (लक्ष्मी प्राप्ति हेतु)।

काली मिर्च: 21 दाने (रोग और शत्रु नाश हेतु)।

बेलपत्र: 7 या 11 पत्र (बीच वाली पत्ती पकड़कर, चिकना हिस्सा शिवलिंग की ओर रखें)।

शमी पत्र: इसे स्वर्ण दान के समान माना गया है।

धतूरा: जो हमारे भीतर के विकारों के नाश का प्रतीक है।

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ग्रीन महाशिवरात्रि: भक्ति का आधुनिक स्वरूप

आज के भौतिकतावादी युग में प्रकृति पूजा ही शिव की व्यावहारिक पूजा है। यदि हम पर्यावरण को प्रदूषित कर रहे हैं, तो हम शिव के विराट स्वरूप का अपमान कर रहे हैं। कुबेरेश्वर धाम (सीहोर) में इस बार \“ग्रीन महाशिवरात्रि\“ का संकल्प लिया गया है।

पंडित जी का सूत्र वैश्विक समाधान है

“एक लोटा जल शिवलिंग पर और एक लोटा जल अपने आस-पास के पेड़-पौधों को।”

यह केवल धार्मिक अनुष्ठान नहीं, बल्कि जलवायु संकट का आध्यात्मिक उपचार है।
निष्कर्ष

महाशिवरात्रि का यह पर्व हमें मिट्टी से जुड़ने, जल को सहेजने और समस्त जीवों के प्रति करुणा भाव रखने की प्रेरणा देता है। आइए, संकल्प लें कि हम अपने भीतर के \“शिव\“ को पहचानेंगे और इस \“पार्थिव\“ जगत को हरा-भरा बनाकर महादेव की सच्ची सेवा करेंगे।
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