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यूपी कृषि मॉडल का पूरे विश्व में दबदबा, तकनीक और ठोस नीतियों से बदला खेती की तस्वीर

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यूपी की खेती में तकनीक और नीतियों में क्रांतिकारी बदलाव



धर्मेंद्र मलिक। उत्तर प्रदेश आज खेती–किसानी के माध्यम से देश में नए आयाम स्थापित कर रहा है। गेहूँ, गन्ना, दूध और आँवला उत्पादन में प्रथम स्थान प्राप्त करने के साथ–साथ धान, केला, आम, अमरूद और मेंथा जैसे उत्पादों में भी प्रदेश का राष्ट्रीय स्तर पर सर्वाधिक योगदान है। यह परिवर्तन केवल भौगोलिक अनुकूलताओं का परिणाम नहीं, बल्कि पिछले वर्षों में लागू की गई ठोस नीतियों, प्रशासनिक सुधारों और वित्तीय अनुशासन का परिणाम है।

वर्ष 2016-17 में जहाँ कृषि विकास दर 8.6 प्रतिशत थी, वहीं 2024-25 में यह बढ़कर 17.7 प्रतिशत तक पहुंचने का दावा किया जा रहा है। देश की मात्र 11 प्रतिशत कृषि योग्य भूमि के साथ उत्तर प्रदेश राष्ट्रीय खाद्यान्न उत्पादन में 20 प्रतिशत से अधिक योगदान दे रहा है—यह स्वयं में एक उल्लेखनीय उपलब्धि है।
बजट और आर्थिक अनुशासन

हाल में प्रस्तुत 9,12,696 करोड़ रुपये के बजट में लगभग 10,888 करोड़ रुपये कृषि एवं पशुपालन के लिए आवंटित किए गए हैं, जो पिछले वर्ष की तुलना में लगभग 20 प्रतिशत अधिक है। उल्लेखनीय तथ्य यह है कि बिना नए कर आरोपण के राजस्व–संग्रह में वृद्धि और व्यर्थ अपव्यय की रोकथाम के माध्यम से संसाधन जुटाने का प्रयास किया गया है। यह दृष्टिकोण विकास को जन–भार नहीं, बल्कि जन–सहभागिता के रूप में स्थापित करता है।

‘खेत से खलिहान’ तक की नीति
2017 में सत्ता संभालते ही सरकार ने लघु एवं सीमांत किसानों के 36,000 करोड़ रुपये के ऋण माफ किए, जिससे लाखों किसान राहत की सांस ले सके। प्रधानमंत्री किसान सम्मान निधि योजना के प्रभावी क्रियान्वयन में भी उत्तर प्रदेश अग्रणी रहा है—लगभग 3.12 करोड़ किसानों को डीबीटी के माध्यम से सीधे लाभ पहुँचा है।

सिंचाई, ऊर्जा और भुगतान
बाणसागर, सरयू नहर, मध्य गंगा नहर और अर्जुन सहायक जैसी परियोजनाओं के पूर्ण होने से लाखों हेक्टेयर अतिरिक्त भूमि सिंचित हुई। निजी नलकूपों के लिए मुफ्त बिजली ने लागत कम की। पिछले नौ वर्षों में गन्ना किसानों को 3.04 लाख करोड़ रुपये से अधिक का भुगतान किया गया, जिससे भुगतान व्यवस्था में पारदर्शिता और समयबद्धता आई। एथेनॉल उत्पादन में अग्रणी बनने से चीनी मिलों की स्थिति सुधरी और किसानों के भुगतान चक्र में स्थिरता आई।

‘एक जनपद–एक उत्पाद’ और निर्यात
आँवला (प्रतापगढ़), केला (कुशीनगर/कौशांबी), काला नमक चावल (सिद्धार्थनगर) और गुड़ (मुजफ्फरनगर) जैसे उत्पादों को ब्रांडिंग और बाज़ार–सुविधा दी गई। कृषि–निर्यात केंद्रों की स्थापना से प्रदेश के फल–सब्ज़ियाँ और दुग्ध–उत्पाद खाड़ी देशों व यूरोप तक पहुँच रहे हैं।

डेयरी और पशुपालन
नंद बाबा दुग्ध मिशन के माध्यम से दुग्ध क्षेत्र को संगठित किया गया। कृत्रिम गर्भाधान की सुविधा 80 प्रतिशत गाँवों तक पहुँचाई गई, जिससे दुग्ध उत्पादन लगभग 239 लाख टन तक पहुँच गया है।

उत्पादन से उद्यमिता तक
कृषि को केवल उत्पादन–केंद्रित गतिविधि मानना अब पर्याप्त नहीं है। मूल्य–संवर्धन, भंडारण, प्रसंस्करण, निर्यात और ऊर्जा–दक्षता से जुड़कर ही किसान की आय में स्थायित्व आ सकता है। जब धान चावल बने, गेहूँ आटा बने, फल जूस या प्रसंस्कृत उत्पाद बनें—तभी लाभ–श्रृंखला का बड़ा हिस्सा ग्रामीण अर्थव्यवस्था में ठहरता है। 2,832 करोड़ रुपये का बागवानी एवं खाद्य प्रसंस्करण पर निवेश इसी सोच का प्रतीक है।

डिजिटल और तकनीकी कृषि
डिजिटल प्लेटफॉर्म के माध्यम से त्वरित ऋण स्वीकृति, ड्रोन द्वारा कीटनाशक छिड़काव, एआई आधारित फसल निगरानी, सीड पार्क और विश्वस्तरीय हैचरी—ये सभी संकेत हैं कि उत्तर प्रदेश पारंपरिक खेती से आगे बढ़कर तकनीक–सक्षम कृषि मॉडल की ओर अग्रसर है।

मुख्यमंत्री द्वारा एक ट्रिलियन डॉलर अर्थव्यवस्था का लक्ष्य निर्धारित किया गया है, जिसमें कृषि की केंद्रीय भूमिका है। यदि उत्पादन, मूल्य–संवर्धन और निर्यात–उन्मुख संरचना का यह मॉडल स्थिरता और पारदर्शिता के साथ आगे बढ़ता है, तो उत्तर प्रदेश न केवल देश की खाद्य सुरक्षा का आधार बनेगा, बल्कि वैश्विक खाद्य–शृंखला में भी अपनी सशक्त उपस्थिति दर्ज करा सकता है।

उत्तर प्रदेश अब केवल अपनी आवश्यकता पूरी करने वाला राज्य नहीं, बल्कि राष्ट्रीय और अंतरराष्ट्रीय खाद्य–सुरक्षा विमर्श का एक महत्वपूर्ण केंद्र बनता दिखाई दे रहा है।

(लेखक भारतीय किसान यूनियन (अराजनैतिक) के राष्ट्रीय प्रवक्ता हैं)
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