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महाशिवरात्रि पर 300 साल बाद बन रहा है अद्भुत संयोग, एक साथ बरसेगी शिव और विष्णु की कृपा

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Mahashivratri 2026 सांकेतिक तस्वीर।



जागरण संवाददाता, रुड़की। Mahashivratri 2026 महाशिवरात्रि पर्व पर 300 वर्ष बाद चतुर्ग्रही योग के साथ आठ महासंयोग का अद्भुत समागम हो रहा है। जिस कारण महाशिवरात्रि पर भगवान शिव एवं माता पार्वती के साथ ही भगवान विष्णु एवं मां लक्ष्मी की भक्तों पर अपार कृपा बरसेगी।

फाल्गुन कृष्ण चतुर्दशी को महाशिवरात्रि का पर्व मनाया जाता है। वर्षभर की 12 शिवरात्रि में महाशिवरात्रि सबसे श्रेष्ठ होती है।

भारतीय प्रौद्योगिकी संस्थान रुड़की परिसर स्थित श्री सरस्वती मंदिर के आचार्य राकेश कुमार शुक्ल बताते हैं कि पौराणिक मान्यता के अनुसार महाशिवरात्रि का व्रत करने से अश्वमेध यज्ञ के समान पुण्य की प्राप्ति होती है।

ऐसा माना जाता है कि जो कोई भी व्यक्ति वर्ष भर कोई व्रत-उपवास नहीं करता है, लेकिन केवल शिवरात्रि का व्रत कर लेता है तो उसे वर्ष भर के व्रत आदि का पुण्य प्राप्त हो जाता है।

उन्होंने बताया कि शिवरात्रि पर आठ महासंयोग के साथ चतुर्ग्रही योग का अद्भुत समागम हो रहा है।

पहला चतुर्ग्रही योग, दूसरा सर्वार्थ सिद्धि योग, तीसरा व्यतिपात योग, चौथा बुधादित्य योग, पांचवां लक्ष्मी नारायण योग, छठा शुक्र आदित्य योग, सातवां महालक्ष्मी योग तथा आठवां श्रवण नक्षत्र योग शामिल हैं।

उनके अनुसार लक्ष्मी नारायण योग एवं महालक्ष्मी योग पड़ने से इस वर्ष महाशिवरात्रि पर माता लक्ष्मी और नारायण की विशेष कृपा बरसेगी। इसके अलावा इन संयोगों के पड़ने से शिवरात्रि आम जनमानस के लिए बहुत ही खास होगी।
जलाभिषेक में भद्रा नहीं बनेगी बाधा

15 फरवरी को चतुर्दशी तिथि का प्रारंभ शाम को लगभग पांच बजकर पांच मिनट से प्रारंभ होगा। चतुर्दशी तिथि के प्रारंभ होने के साथ ही जलाभिषेक भी प्रारंभ हो जाएगा।

इस बार जलाभिषेक में भद्रा बाधा नहीं बनेगी। ऐसा माना जाता है कि भद्रा के दौरान भगवान शिव का जलाभिषेक निषेध होता है।

इस बार चतुर्दशी तिथि प्रारंभ होने के साथ ही भद्रा भी शुरू हो जाएगी, लेकिन भद्रा का वास पाताल लोक में होने से जलाभिषेक में बाधा नहीं होगी।
शिवरात्रि पर जलाभिषेक करने से होती है अनंत पुण्य की प्राप्ति

आचार्य राकेश कुमार शुक्ल ने बताया कि शिवरात्रि को भगवान शिव और शक्ति के मिलन की रात्रि के रूप में माना जाता है।

शिवरात्रि पर भगवान शिव की पूजा करके जलाभिषेक करने से अनंत पुण्य की प्राप्ति होती है। साथ ही, इस दिन चार प्रहर की पूजा का विशेष विधान होता है।

इस दिन रात्रि में जागरण करते हुए चार प्रहर की पूजा करने से धर्म, अर्थ, काम, मोक्ष आदि की प्राप्ति होती है।

उन्होंने बताया कि प्रथम प्रहर शाम 6:39 बजे से रात्रि 9:45 बजे के मध्य, द्वितीय प्रहर रात्रि 9:45 बजे से 12:50 बजे के मध्य, तृतीय प्रहर रात्रि 12:50 बजे से 3:58 बजे के मध्य और चतुर्थ प्रहर सुबह 3:58 बजे से 7:05 बजे के मध्य रहेगा।
प्रदोष काल और निशीथकाल की पूजा का विशेष महत्व

शिवरात्रि पर प्रदोष काल और निशीथकाल की पूजा का विशेष महत्व होता है। इस बार निशीथकाल की पूजा का समय 15 फरवरी को रात में लगभग 11:50 से रात्रि 12:40 के मध्य का उपयुक्त होगा।

शिवरात्रि पर व्रत करने वाले व्रतियों के लिए 16 फरवरी को पारण का समय सुबह लगभग छह बजकर 30 मिनट से अपराह्न तीन बजकर दस मिनट के मध्य उचित रहेगा।
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