आपातकाल से उदारीकरण तक : 1975–2000 के बजट भारत को कैसे बदल रहे थे
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विक्रांत निर्मला सिंह यह लेख भारत के बजट इतिहास की तीन-कड़ी श्रृंखला का दूसरा भाग है, जिसमें 1975-2000 तक के बजटों और आर्थिक नीतियों का विश्लेषण किया गया है। आजादी के बाद के पहले 25 वर्षों के बजटों का विश्लेषण मुख्यतः भारत के बुनियादी आर्थिक ढाँचे के निर्माण और उस विचारधारा के प्रभाव को दर्शाता है, जिसे प्रायः ‘नेहरूवादी समाजवाद’ कहा जाता है. लेकिन जब इसके बाद के 25 वर्षों, अर्थात 1975 से 2000 के बजट आँकड़ों और आधिकारिक दस्तावेजों को खंगाले तो स्पष्ट होता है कि यह दौर गहरे आर्थिक बदलावों, निरंतर संकटों और नीतिगत संक्रमण का काल था. इस चरण की एक प्रमुख विशेषता राजनीतिक अस्थिरता रही. इस दौरान देश ने अनेक सरकारें और कई प्रधानमंत्री देखे. आपातकाल से लेकर जनता सरकार, इंदिरा गांधी की वापसी, राजीव गांधी का कार्यकाल और अंततः गठबंधन राजनीति का उदय. यही कारण है कि इस कालखंड के बजटों का विश्लेषण बहुआयामी हो जाता है. वस्तुतः यह पूरा दौर अस्थिरता के बीच भारत की नई अर्थव्यवस्था के उदय की कहानी है.1970 के दशक के मध्य तक भारतीय अर्थव्यवस्था स्पष्ट दबाव में आ चुकी थी. 1973 और 1979 के वैश्विक तेल झटकों ने भारत के आयात बिल को तेजी से बढ़ाया और महंगाई को ऊँचे स्तर पर पहुँचा दिया. इस अवधि में आर्थिक वृद्धि औसतन केवल 3-4 प्रतिशत प्रतिवर्ष तक सीमित रही, जबकि लोकलुभावन बजटीय नीतियों और बढ़ते सरकारी खर्च के कारण राजकोषीय घाटा लगातार बढ़ता गया. राजस्व और व्यय के बीच गहराती खाई ने महंगाई को और तेज किया, जिससे आम जनजीवन पर सीधा असर पड़ा. 1980 के दशक में कुछ वर्षों के लिए आर्थिक वृद्धि में सुधार अवश्य दिखा, लेकिन संरचनात्मक कमजोरियाँ बनी रहीं. तेल आयात पर निर्भरता, बार-बार उभरती भुगतान संतुलन की समस्याएँ और राजनीतिक अस्थिरता ने अर्थव्यवस्था को लगातार असुरक्षित बनाए रखा. बजट अक्सर अल्पकालिक दबावों से निपटने पर केंद्रित रहे, जिससे दीर्घकालिक वित्तीय अनुशासन स्थापित नहीं हो सका.यह स्थिति 1990-91 में चरम पर पहुँच गई, जब भारत का विदेशी मुद्रा भंडार घटकर केवल कुछ ही हफ्तों के आयात के बराबर रह गया. केंद्र और राज्यों का सम्मिलित राजकोषीय घाटा कुल जीडीपी के लगभग 10-12 प्रतिशत तक पहुँच चुका था और महंगाई 17 प्रतिशत के आसपास पहुँच गई थी. अंततः भारत को अंतरराष्ट्रीय मुद्रा कोष से सहायता लेनी पड़ी. यही दबाव 1991 के निर्णायक मोड़ का कारण बने, जिसने संकट-प्रेरित सुधारों का रास्ता खोला. इसी दौर में भारत की बजट नीति ने दिशा बदली और आगे चलकर एक नई, अधिक खुली और सुधार-आधारित आर्थिक व्यवस्था की नींव पड़ी.1975 से 2000 के बीच भारत के केंद्रीय बजट देश की आर्थिक दिशा में आए बड़े बदलावों को साफ तौर पर दिखाते हैं. यह वह दौर था जब भारत ने एक सख्त नियंत्रित और राज्य-प्रधान अर्थव्यवस्था (कंट्रोल एंड स्टेट प्लांड इकॉनमी) से निकलकर धीरे-धीरे सुधारों और खुले बाजार की ओर कदम बढ़ाए. इस पूरी अवधि में बजट अक्सर संकटों की प्रतिक्रिया के रूप में सामने आए, कभी महंगाई से निपटने के लिए, कभी घाटे को संभालने के लिए और अंततः अर्थव्यवस्था को खोलने के लिए.आपातकाल के बाद बनी जनता सरकार को एक कठिन आर्थिक विरासत मिली. महंगाई ऊँची थी, सरकारी खर्च तेजी से बढ़ चुका था और कर्ज का बोझ भी भारी था. ऐसे समय में वित्त मंत्री एच. एम. पटेल ने 1977-78 का अंतरिम बजट पेश किया. इस बजट का मूल संदेश साफ था, सरकार को खर्च में सख्ती बरतनी होगी. गैर-जरूरी सब्सिडी घटाने, उधारी पर नियंत्रण रखने और सरकारी फिजूलखर्ची रोकने पर जोर दिया गया. तत्कालीन वित्त मंत्री पटेल ने यह भी स्पष्ट किया था कि सरकार आगे किसी नए राष्ट्रीयकरण की राह पर नहीं जाएगी. इन कदमों से महंगाई की रफ्तार कुछ समय के लिए धीमी पड़ी, लेकिन अर्थव्यवस्था की बुनियादी समस्याएँ जैसे कम उत्पादकता और धीमी वृद्धि ज्यों की त्यों रहीं. 1980 के दशक के मध्य तक यह साफ होने लगा था कि बहुत ज्यादा कर और जटिल नियम विकास में बाधा बन रहे हैं. इसी पृष्ठभूमि में वी. पी. सिंह ने 1985-86 का बजट पेश किया. उन्होंने कंपनियों पर अधिकतम कॉरपोरेट कर दर घटाई और आयकर में छूट की सीमा बढ़ाई, ताकि बचत और निवेश को बढ़ावा मिले. कर विभाग में फैले “इंस्पेक्टर राज” को कम करने की कोशिश की गई. सबसे महत्वपूर्ण कदम था ‘मोडवैट/MODVAT (संशोधित मूल्य वर्धित कर)’ प्रणाली की शुरुआत, जिससे उत्पाद शुल्क में दोहरी टैक्सेशन की समस्या कम हुई. इन सुधारों से कर संग्रह में पारदर्शिता बढ़ी और उद्योगों को कुछ राहत मिली, भले ही अर्थव्यवस्था अब भी सख्त नियंत्रणों में जकड़ी हुई थी.सबसे बड़ा मोड़ 1991-92 के बजट में आया. भारत उस समय गंभीर विदेशी मुद्रा संकट में था. देश के पास मुश्किल से दो-तीन हफ्तों के आयात के लिए विदेशी मुद्रा बची थी. ऐसे हालात में वित्त मंत्री डॉ. मनमोहन सिंह ने ऐतिहासिक बजट पेश किया. इस बजट के तहत रुपये का दो चरणों में अवमूल्यन किया गया, आयात लाइसेंस और कोटा व्यवस्था को बड़े पैमाने पर समाप्त करने की शुरुआत हुई और व्यापार नीति को उदार बनाया गया. आयात शुल्क घटाए गए और निर्यात को बढ़ावा देने के लिए प्रोत्साहन दिए गए. विदेशी निवेश के नियम आसान किए गए और पहली बार सरकारी कंपनियों में हिस्सेदारी बेचने यानी विनिवेश की घोषणा हुई. इन कदमों ने भारत को एक बंद अर्थव्यवस्था से धीरे-धीरे खुले बाजार की ओर ले जाना शुरू किया. 1990 के दशक के उत्तरार्ध में सुधारों को आगे बढ़ाने का काम पी. चिदंबरम के 1997-98 के बजट ने किया. इसे “ड्रीम बजट” कहा गया क्योंकि इसमें कर दरों को सरल और कम किया गया. व्यक्तिगत आयकर को केवल तीन स्लैब 10%, 20% और 30% में सीमित किया गया और कंपनियों पर लगाए गए अधिभार (सरचार्ज) हटाए गए. सरकार ने यह संदेश दिया कि कम कर दरों से कर अनुपालन बढ़ेगा और राजस्व का आधार व्यापक होगा. इस बजट में यह भी कहा गया कि राजकोषीय घाटे को धीरे-धीरे कम किया जाएगा, हालाँकि उस समय यह जीडीपी के करीब 5% के आसपास था. इन फैसलों से निवेशकों का भरोसा बढ़ा और सुधार प्रक्रिया को नई गति मिली.स्रोत : World Bank Open Data (GDP growth, CPI inflation), भारत सरकार. Economic Survey (1976-77; 1997-98), Department of Economic Affairs (DEA), Fiscal Policy in India: Trends and Trajectory.1975 से 2000 का दौर विशेषकर 1991 के बाद भारतीय अर्थव्यवस्था के लिए एक निर्णायक समय रहा. आर्थिक सुधारों ने भारत को लंबे समय से चले आ रहे निम्न-वृद्धि जाल से बाहर निकालना शुरू किया. जहाँ 1970 के दशक में विकास दर 3-4% तक सीमित थी, वहीं 1980 के दशक में यह औसतन 5.5% और 1990 के दशक के उत्तरार्ध में लगभग 6% तक पहुँच गई. इससे प्रति व्यक्ति आय में सुधार हुआ और गरीबी में क्रमिक गिरावट दर्ज की गई. उदारीकरण के साथ विदेशी व्यापार और विदेशी मुद्रा स्थिति में स्पष्ट मजबूती आई. आयात-निर्यात नियंत्रण हटने से भारत का वैश्विक एकीकरण बढ़ा और सेवाओं, सॉफ्टवेयर तथा विनिर्माण निर्यात का हिस्सा तेजी से बढ़ा. आर्थिकी के बेहतर होने से विदेशी मुद्रा भंडार बढ़ गया और भुगतान संतुलन (बैलेंस ऑफ पेमेंट) स्थिर हुआ.इस अवधि की एक बड़ी उपलब्धि निजी क्षेत्र और सेवा उद्योगों का उत्थान रहा. लाइसेंस-परमिट राज के अंत से उद्यमिता को नई गति मिली और सूचना प्रौद्योगिकी भारत की विकास गाथा का नया केंद्र बनकर उभरी. निजी निवेश, प्रतिस्पर्धा और नवाचार ने अर्थव्यवस्था को अधिक गतिशील बनाया. साथ ही, आर्थिक स्थिरता में भी सुधार हुआ. 1991 के बाद राजकोषीय और मौद्रिक सख्ती से घाटा और महंगाई धीरे-धीरे काबू में आए. हालाँकि, यह प्रगति पूरी तरह संतुलित नहीं थी. उपलब्धियों के बावजूद, 1975-2000 का दौर कई सीमाओं से घिरा रहा. सबसे महत्वपूर्ण बाधा रही राजनीतिक अस्थिरता. इस अवधि में भारत ने आपातकाल, अल्पकालिक सरकारें, बार-बार प्रधानमंत्री परिवर्तन और अस्थिर गठबंधन राजनीति देखी. नतीजतन नीति-निर्माण में निरंतरता की कमी रही, जिससे बजट अक्सर तात्कालिक राजनीतिक दबावों के अधीन रहे. परिणामस्वरूप, दीर्घकालिक सुधार विशेषकर श्रम, कृषि और सार्वजनिक वित्त के क्षेत्र में या तो टलते रहे या आधे-अधूरे लागू हुए. इसके अतिरिक्त तेज आर्थिक वृद्धि के बावजूद रोजगार सृजन कमजोर रहा. श्रम कानूनों में ठोस सुधार न होने से संगठित विनिर्माण का विस्तार सीमित रहा और “रोजगार-विहीन वृद्धि” की स्थिति बनी. नीति-अनिश्चितता के कारण बिजली, परिवहन और शहरी सुविधाओं में कमी बनी रही, जिसने विकास की गति पर अंकुश लगाया. साथ ही इस दौर में विनिर्माण (मैन्युफैक्चरिंग) क्षेत्र अपेक्षित वरिधि हासिल नहीं कर सका और भारत चीन तथा अन्य दक्षिण-पूर्व एशियाई देशों से पीछे रह गया. 1975 से 2000 का कालखंड भारतीय अर्थव्यवस्था के लिए एक संक्रमणकाल रहा. इस अवधि में औसत जीडीपी वृद्धि दर बढ़कर लगभग 5.5% हुई, जो पहले के दशकों की धीमी “हिंदू वृद्धि दर” से स्पष्ट रूप से बेहतर थी. 1980 के दशक की सीमित नीतिगत ढील और विशेष रूप से 1991 के बाद के उदारीकरण सुधारों ने विकास को नई दिशा दी. हालाँकि यह प्रगति राजकोषीय असंतुलन, ऊँचे घाटों और बाहरी ऋण दबाव के साथ आई. 1991 का संकट इसी असंतुलन का चरम था, जिसके बाद सख्त कदम उठाए गए. सुधारों के परिणामस्वरूप विदेशी व्यापार बढ़ा, कर संरचना अधिक संतुलित हुई, महंगाई पर नियंत्रण आया और विदेशी मुद्रा भंडार मजबूत हुए.सबसे महत्वपूर्ण यह रहा कि इस दौर में भारत ने ‘नियंत्रित समाजवादी’ ढाँचे से निकलकर बाजार-आधारित अर्थव्यवस्था की ओर निर्णायक कदम बढ़ाए. उदारीकरण, विनिवेश, वित्तीय क्षेत्र सुधार और कर आधुनिकीकरण ने आगे की तेज और टिकाऊ वृद्धि की नींव रखी. समग्र रूप से, 1975-2000 का दौर यह स्पष्ट करता है कि संकट ने सुधारों को जन्म दिया, सुधारों ने गति दी, लेकिन दीर्घकालिक सफलता के लिए संरचनात्मक और समावेशी सुधारों की आवश्यकता आगे भी बनी रही. यही इस चरण की सबसे बड़ी सीख रही.(लेखक विक्रांत निर्मला सिंह राष्ट्रीय प्रौद्योगिकी संस्थान, राउरकेला में शोधार्थी हैं और फाइनेंस ऐंड इकनॉमिक्स थिंक काउन्सिल के संस्थापक एवं अध्यक्ष हैं.)
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