ट्रंप की धमकियों के बावजूद नहीं झुकी डेनमार्क की PM फ्रेडरिक्सन, कैसे बचाई यूरोप की संप्रभुता?
https://www.jagranimages.com/images/2026/01/26/article/image/denmark-pm-1769376607307_m.webpट्रंप की धमकियों के बावजूद नहीं झुकी डेनमार्क की PM (फोटो- सोशल मीडिया)
डिजिटल डेस्क, नई दिल्ली। कहा जाता है पूत के पांव पालने में दिख जाते हैं। कुछ ऐसा ही है डेनमार्क की प्रधानमंत्री मेट फ्रेडरिक्सन के साथ। उन्होंने कभी भी दबंगों को बर्दाश्त नहीं किया। स्कूल के दिनों में अप्रवासी बच्चों को परेशान करनेवाले बदमाश लड़कों के सामने वह डटकर खड़ी हो गई थीं।
हालांकि, उस समय उन्हें चेहरे पर मुक्का खाना पड़ा था, लेकिन पिछले हफ्ते ग्रीनलैंड के मुद्दे पर जो कुछ भी हुआ, उसमें यूरोप की सबसे बड़ी शख्सियत बनकर उभरीं। फ्रेडरिक्सन वह चेहरा बनकर उभरी हैं, जिन्होंने बिना उकसावे और बिना झुके, साफ शब्दों में \“ना\“ कहना चुना।
वह दुनिया के सुपरपावर अमेरिका के \“बड़बोले\“ राष्ट्रपति डोनल्ड ट्रंप के सामने डटकर खड़ी हो गईं, जिनके सामने बड़े बड़ों की घिग्घी बंध जाती है। ग्रीनलैंड और अमेरिका के बीच मजबूत दीवार बनकर खड़ी मेटे फ्रेडरिक्सन की संयमित लेकिन दृढ़ रणनीति का ही नतीजा है कि ट्रंप को फिलहाल पीछे हटना पड़ा है।
फ्रेडरिक्सन इस वक्त वैश्विक राजनीति के सबसे कठिन टकरावों में से एक के केंद्र में हैं। ग्रीनलैंड को लेकर ट्रंप की आक्रामक बयानबाजी के बाद फ्रेडरिक्सन ने महीनों तक बेहद नाजुक संतुलन साधे रखा- एक ओर अमेरिकी राष्ट्रपति को नाराज किए बिना डेनमार्क की संप्रभुता की रक्षा, तो दूसरी ओर यूरोप को एकजुट कर स्पष्ट संदेश देना कि ग्रीनलैंड की संप्रभुता पर कोई समझौता नहीं होगा। उन्होंने साफ कहा कि ग्रीनलैंड में अमेरिकी सैन्य ठिकानों पर संप्रभुता देना “रेड लाइन\“\“ है।
सबसे युवा प्रधानमंत्री, सबसे लोकप्रिय नेता
41 वर्ष की उम्र में 2019 में डेनमार्क की सबसे युवा प्रधानमंत्री बनीं फ्रेडरिक्सन के लिए यह विवाद केवल कूटनीतिक नहीं, बल्कि देश की पहचान और अस्तित्व से जुड़ा है। ग्रीनलैंड के साथ डेनमार्क दुनिया का 12वां सबसे बड़ा संप्रभु देश बनता है और आर्कटिक मामलों में उसकी अहम भूमिका तय होती है।
ट्रंप के दबाव के बीच फ्रेडरिक्सन ने साहसिक कदम उठाते हुए ब्रिटेन, फ्रांस, जर्मनी और आइसलैंड के सीमित सैन्य दल को ग्रीनलैंड बुलाया। यह एक प्रतीकात्मक लेकिन सख्त संदेश था कि किसी भी सैन्य कार्रवाई की कीमत केवल डेनमार्क ही नहीं, पूरे यूरोप को चुकानी पड़ेगी। डेनमार्क में इस कदम को व्यापक समर्थन मिला और उनकी लोकप्रियता तेजी से बढ़ी। जनमत सर्वेक्षण संकेत देते हैं कि वह इस साल होने वाले चुनावों में तीसरी बार सत्ता में लौट सकती हैं।
कड़े फैसले के लिए \“फ्रेडरिक्सन उनके कार्यकाल में संकट लगातार आए- कोविड के दौरान मिंक उद्योग बंद करने का विवादास्पद फैसला, यूक्रेन युद्ध में सबसे पहले एफ-16 देने का निर्णय, और यूरोप की सबसे सख्त शरण नीति। आलोचनाओं के बावजूद उन्होंने हर मोर्चे पर राजनीतिक मजबूती बनाए रखी।
व्यक्तिगत जीवन में संयमित फ्रेडरिक्सन अमेरिका से रिश्तों को पूरी तरह तोड़ने के पक्ष में नहीं हैं। वह बार-बार कहती हैं कि यूरोप की सुरक्षा में अमेरिका की ऐतिहासिक भूमिका को नकारा नहीं जा सकता। उनका कहना है कि उनका लक्ष्य टकराव नहीं, बल्कि टकराव को संभालते हुए समाधान निकालना है।
ग्रीनलैंड संकट ने मेट फ्रेडरिक्सन को केवल डेनमार्क की नेता नहीं, बल्कि एक ऐसी यूरोपीय नेता के रूप में स्थापित किया है, जो ताकत के सामने शांत लेकिन अडिग रहना जानती हैं।
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