LHC0088 Publish time 2 hour(s) ago

जल संरक्षण से साधा प्रकृति का संतुलन, राजाजी टाइगर रिजर्व ने धौलखंड-चिलावाली सहित इन रेंजों में बनवाए 12 कुंए

https://www.jagranimages.com/images/2026/01/25/article/image/Rajaji-Tiger-Reserve-1769334295610_m.webp


शैलेंद्र गोदियाल, हरिद्वार। हरिद्वार की पहाड़ियों और साल के जंगलों के बीच जब वन्यजीव निश्चितं होकर जलक्रीड़ा करते दिखाई देते हैं और हाथियों के झुंड प्यास बुझाने के लिए आबादी की ओर नहीं, बल्कि अपने प्राकृतिक वास की ओर बढ़ते हैं, तो यह केवल एक दृश्य नहीं, बल्कि सशक्त तंत्र, संवेदनशील शासन और संतुलित विकास का जीवंत प्रमाण होता है।

राजाजी टाइगर रिजर्व का ‘डब्लू-3’ माडल इसी सोच का सशक्त उदाहरण है, जिसमें पर्यावरण संरक्षण और जल संरक्षण एक-दूसरे के पूरक बनकर सामने आते हैं। यह पहल याद दिलाती है कि आत्मनिर्भर भारत की नींव केवल शहरों और उद्योगों में नहीं, बल्कि जंगलों, जल और जीव-जंतुओं के संरक्षण में भी मजबूती से रखी जाती है। जब तंत्र संवेदनशील हो और नीति प्रकृति के साथ चले, तभी राष्ट्र सशक्त और संतुलित बनता है।

राजाजी टाइगर रिजर्व की धौलखंड, चिलावाली, हरिद्वार और बेरीबाड़ा रेंज में वन्यजीवों को जंगल में ही जल का अधिकार दिलाने की यह पहल न केवल मानवीय संवेदना का परिचायक है, बल्कि गणतंत्र की उस मूल भावना को भी सशक्त करती है, जिसमें प्रकृति और नागरिक-दोनों के अधिकार सुरक्षित हों। फरवरी से जून माह तक जल संकट झेलने वाले इस दक्षिणी राजाजी क्षेत्र में अब वन्यजीवों को न पानी के लिए भटकना पड़ता है और न ही आबादी की ओर रुख करना पड़ता है। इससे मानव-वन्यजीव संघर्ष की आशंका भी स्वतः कम हुई है।


‘डब्लू-3’ के नाम से जाना जाता है प्रोग्राम

पार्क प्रशासन ने ऊंचाई वाले नमीयुक्त स्थलों की वैज्ञानिक पहचान कर पहले छोटे जलकुंड विकसित किए और फिर 12 कुओं का निर्माण कराया। इन कुओं से ग्रेविटी सिस्टम के माध्यम से अंडरग्राउंड पाइपलाइन द्वारा 40 जलाशयों तक पानी पहुंचाया जा रहा है। यह अभिनव प्रयोग ‘डब्लू-3’ (वेल, वाटरहोल और वाइल्ड लाइफ) के नाम से जाना जा रहा है। इसकी सबसे बड़ी उपलब्धि यह है कि भीषण गर्मी के महीनों मई-जून में भी जलाशय लबालब रहते हैं और वन्यजीवों का प्राकृतिक व्यवहार बाधित नहीं होता।

राजाजी टाइगर रिजर्व का करीब एक लाख हेक्टेयर क्षेत्र तीन हिस्सों में बंटा है। पूर्वी चीला रेंज, उत्तरी मोतीचूर रेंज और दक्षिणी धौलखंड-चिलावाली-हरिद्वार-बेरीबाड़ा क्षेत्र। दक्षिणी हिस्से में जल संकट सबसे गंभीर रहा है। इसी चुनौती को अवसर में बदलते हुए यह माडल विकसित किया गया, जो अब न केवल वन्यजीव संरक्षण बल्कि जल प्रबंधन का भी आदर्श बन गया है। चिलावाली और धौलखंड रेंज में नौ कुएं और 35 जलाशय, जबकि बेरीबाड़ा और हरिद्वार रेंज में एनीकट आधारित जलाशय इस बात का प्रमाण हैं कि स्थानीय भूगोल के अनुरूप समाधान ही टिकाऊ होते हैं।


जल को रोका नहीं जाता, बल्कि संजोया जाता

एनीकट वाटर होल के माध्यम से जंगल के छोटे गदेरों पर बनाए गए बांध वर्षाकाल में जल संग्रह करते हैं और आवश्यकता पड़ने पर नियंत्रित ढंग से खोले जाते हैं। यह प्रकृति के साथ तालमेल बैठाकर किया गया विकास है, जहां जल को रोका नहीं जाता, बल्कि संजोया जाता है।


अन्य राज्यों के लिए नजीर

सबसे महत्वपूर्ण यह कि राजाजी का यह प्रयोग अब केवल एक स्थानीय पहल नहीं रहा। मोतीचूर, चीला और रवासन रेंज में इसके विस्तार की योजना है और कार्बेट टाइगर रिजर्व सहित देश के अन्य रिजर्व में भी इसे पायलट आधार पर लागू करने की तैयारी चल रही है। यह माडल अन्य राज्यों के लिए नजीर है कि सीमित संसाधनों, स्थानीय समझ और प्रशासनिक इच्छाशक्ति से कैसे बड़े परिणाम हासिल किए जा सकते हैं।   

वन्यजीवों को आरटीआर की धौलखंड, चिलावाली, हरिद्वार और बेरीबाड़ा रेंज के जंगल में जल का अधिकार दिलाने के लिए डब्लू-3 माडल तैयार किया गया है। पांच वर्ष की मेहनत के बाद अब इसके सुखद परिणाम देखने को मिल रहे हैं। इन जलाशयों में जलीय जीव, पक्षी और हाथियों के झुंड अपनी प्यास बुझा रहे हैं। डब्लू-3 माडल को जल संकट वाले अन्य संरक्षित वन क्षेत्रों भी लागू करने का प्रयास किया जा रहा है।
- धनंजय मोहन, प्रमुख वन संरक्षक, उत्तराखंड
Pages: [1]
View full version: जल संरक्षण से साधा प्रकृति का संतुलन, राजाजी टाइगर रिजर्व ने धौलखंड-चिलावाली सहित इन रेंजों में बनवाए 12 कुंए

Get jili slot free 100 online Gambling and more profitable chanced casino at www.deltin51.com