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Mahabharata Mystery: 18 दिन, 18 सेनाएं और 18 अध्याय, क्यों बन गया ये महाभारत का रहस्यमयी अंक

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क्या है 18 अंक का रहस्य? (Image Source: AI-Generated)



धर्म डेस्क, नई दिल्ली। महाभारत केवल दुनिया का सबसे बड़ा महाकाव्य ही नहीं है, बल्कि यह रहस्यों, दर्शन और गणितीय सूक्ष्मताओं का एक अनूठा संगम भी है। जब हम इस महान गाथा की परतों को खोलते हैं, तो एक विशेष अंक बार-बार हमारे सामने आता है, और वह है- अंक 18। कुरुक्षेत्र के युद्ध से लेकर गीता के उपदेश तक, महाभारत की हर महत्वपूर्ण कड़ी इसी संख्या के इर्द-गिर्द बुनी गई है। क्या यह महज एक संयोग है या इसके पीछे कोई गहरा आध्यात्मिक कारण छिपा है? आइए जानते हैं, महाभारत में \“18\“ अंक की वह जादुई मौजूदगी, जो आज भी विद्वानों को हैरान कर देती है।
महाभारत में \“18\“ अंक का अद्भुत जुड़ाव

महाभारत के घटनाक्रम में इस अंक की भूमिका अत्यंत महत्वपूर्ण है। महर्षि वेदव्यास रचित महाभारत ग्रंथ के अनुसार, इस महाकाव्य की पूरी संरचना इसी अंक पर टिकी है:

18 दिनों का भीषण युद्ध: कुरुक्षेत्र की रणभूमि पर कौरवों और पांडवों के बीच यह महासंग्राम 18 दिनों तक चला था। पौराणिक इतिहास के पन्नों में दर्ज है कि हर दिन की जंग ने एक नया मोड़ लिया और 18वें दिन अधर्म का अंत हुआ।

18 पर्वों में विभाजन: इस विशाल ग्रंथ को 18 मुख्य भागों में बांटा गया है, जिन्हें \“पर्व\“ कहा जाता है। आदि पर्व से लेकर स्वर्गारोहण पर्व तक, इनकी कुल संख्या 18 ही है।

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(Image Source: Freepik)

श्रीमद्भगवद्गीता के 18 अध्याय: युद्ध के आरंभ में जब अर्जुन मोहग्रस्त हुए, तब भगवान कृष्ण ने उन्हें जो दिव्य उपदेश दिया, वह श्रीमद्भगवद्गीता के रूप में संकलित है। इसमें भी कुल 18 अध्याय हैं, जो मनुष्य को जीवन जीने की कला सिखाते हैं।

18 अक्षौहिणी सेना: युद्ध के मैदान में उतरी कुल सेना की संख्या भी 18 अक्षौहिणी (2,18,700 सैनिक यानी 21,870 रथ, 21,870 हाथी, 65,610 घुड़सवार और 1,09,350 पैदल सैनिक) थी। प्राचीन सैन्य शास्त्र के आंकड़ों के अनुसार, कौरवों के पास 11 और पांडवों के पास 7 अक्षौहिणी सेना थी।

जीवित योद्धा: युद्ध की समाप्ति के बाद भीषण नरसंहार हुआ। महाभारत के स्त्री पर्व में उल्लेख मिलता है कि अंत में पांडवों की ओर से 5 भाई और श्री कृष्ण सहित केवल 18 मुख्य योद्धा ही जीवित बचे थे।
अंक 18 का आध्यात्मिक महत्वभारतीय

अंक शास्त्र (Numerology) की दृष्टि से देखें तो 18 का मूलांक 1 + 8 = 9 होता है। सनातन परंपरा में 9 को \“पूर्ण अंक\“ माना गया है। यह अंक कभी नष्ट नहीं होता और पूर्णता का प्रतीक है। महाभारत में इस अंक का दोहराव यह संकेत देता है कि यह युद्ध केवल भूमि के लिए नहीं, बल्कि मानवीय चेतना के पूर्ण विकास और धर्म की स्थापना के लिए था।
अंक 18 का इशारा?

महाभारत में अंक 18 का बार-बार आना यह सिद्ध करता है कि यह महाकाव्य अत्यंत योजनाबद्ध तरीके से रचा गया था। यह अंक मनुष्य को उसके अंतर्मन के विकारों पर विजय प्राप्त कर मोक्ष की ओर बढ़ने का संदेश देता है।

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अस्वीकरण: इस लेख में बताए गए उपाय/लाभ/सलाह और कथन केवल सामान्य सूचना के लिए हैं। दैनिक जागरण तथा जागरण न्यू मीडिया यहां इस लेख फीचर में लिखी गई बातों का समर्थन नहीं करता है। इस लेख में निहित जानकारी विभिन्न माध्यमों/ज्योतिषियों/पंचांग/प्रवचनों/मान्यताओं/धर्मग्रंथों/दंतकथाओं से संग्रहित की गई हैं। पाठकों से अनुरोध है कि लेख को अंतिम सत्य अथवा दावा न मानें एवं अपने विवेक का उपयोग करें। दैनिक जागरण तथा जागरण न्यू मीडिया अंधविश्वास के खिलाफ है।
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