2 लाख से बढ़ाकर 16 लाख रुपये कर दी मुआवजा राशि, हाई कोर्ट ने कहा- छात्र की आमदनी शून्य मानना गलत
https://www.jagranimages.com/images/2026/01/22/article/image/court-1769073351150.webpविधि संवाददाता, प्रयागराज। इलाहाबाद हाई कोर्ट ने कहा है कि सिर्फ इसलिए कि मृतक 12 वीं कक्षा का छात्र था, यह मान लेना गलत है कि वह कोई आय अर्जित नहीं कर रहा था। कोर्ट ने मृतक को अकुशल श्रमिक मानते हुए मुआवजा निर्धारण करने का आदेश दिया है।
न्यायमूर्ति संदीप जैन की एकलपीठ ने कहा, सिर्फ इसलिए क्योंकि मृतक कक्षा 12 में था, यह नहीं मानना चाहिए कि वह कुछ भी नहीं कमा रहा था। ट्रिब्यूनल ने काल्पनिक आमदनी के आधार पर मुआवजे का आकलन यह मानते हुए किया है वह सालाना 15 हजार रुपये कमा रहा था, यह निश्चित तौर पर बहुत कम है।
कोर्ट ने प्रतिमाह आय 6,362 रुपये मानते हुए दावेदार परिवार को सात प्रतिशत वार्षिक ब्याज के साथ 16,04,092 रुपये का मुआवजा देने का आदेश दिया है। अंकित नामक युवक की मौत 10 जून, 2014 को रोडवेज बस की चपेट में आने से हुई थी। मोटर एक्सीडेंट क्लेम ट्रिब्यूनल/एडिशनल डिस्ट्रिक्ट जज बुलंदशहर ने उसकी मां कश्मीरी, बहन और भाई को सात प्रतिशत प्रति वर्ष की ब्याज दर के साथ मात्र 2.60 लाख रुपये का मुआवजा देने का आदेश दिया था।
इसके खिलाफ हाई कोर्ट में अपील की गई। कहा गया कि अंकित 22 साल का था और मजदूरी करके लगभग नौ हजार रुपये प्रति माह कमाता था। फिर भी अनुमानित आय 15 हजार रुपये प्रति वर्ष आंकी गई, जो बहुत कम थी। मृतक के पिता की मौत पहले ही हो चुकी थी, इसलिए अन्य घर वाले भी उस पर पूरी तरह आश्रित थे।
विपक्षी यूपीएसआरटीसी के वकील ने कहा कि मृतक की आय और व्यवसाय का कोई दस्तावेजी सबूत नहीं है। अंकित 12वीं कक्षा में पढ़ रहा था और कोई आय नहीं थी, इसलिए ट्रायल कोर्ट ने सही मुआवजा दिया है।
कोर्ट ने सुप्रीम कोर्ट के गुरप्रीत कौर बनाम यूनाइटेड इंडिया इंश्योरेंस कंपनी लिमिटेड फैसले का हवाला देते हुए कहा, ‘मृतक की आय का कोई सबूत नहीं है, लेकिन बैंक खाते से पता चलता है कि वह (मृतक) प्रतिमाह 11,550 रुपये ट्रैक्टर का लोन चुकाता था, इससे उसकी आय का अनुमान लगाया जा सकता है। उपलब्ध तथ्यों के अनुसार यह आय 25 हजार रुपये प्रतिमाह हो सकती है।’
कोर्ट ने कहा है कि राज्य परिवहन निगम को मुआवजा राशि दो महीने के अंदर जमा करनी होगी। मुआवजा राशि अपीलकर्ताओं में कैसे बांटी जाए, यह तय करने की स्वतंत्रता ट्रायल कोर्ट को दी गई है। कोर्ट ने कहा है कि निगम ने पहले ही कुछ राशि जमा की है तो वह इसे समायोजित कर सकती है।
Pages:
[1]