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उत्तर प्रदेश में सालभर में 90 दिन सदन चलाने का नियम, अब तक किसी सरकार में नहीं हुआ पालन

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शोभित श्रीवास्तव, लखनऊ। पीठासीन अधिकारियों के सम्मेलन में विधान सभाओं में एक वर्ष में न्यूनतम 30 बैठकें आयोजित करने का संकल्प भले ही बुधवार को लिया गया हो किंतु प्रदेश में तो एक वर्ष में 90 दिन सदन चलाने के नियम पहले से हैं।

हालांकि, सरकार चाहे किसी भी राजनीतिक दल की क्यों न रही हो इस नियम का पालन नहीं होता है। 18वीं विधान सभा में भी वर्ष 2023 में अधिकतम 20 दिन सदन चला है। बाकी वर्षों में 15 से 17 दिन ही विधान सभा की बैठकें हुईं हैं।

भारत के संविधान के अनुच्छेद 174 व उत्तर प्रदेश विधान सभा की प्रक्रिया तथा कार्य-संचालन नियमावली 2023 के नियम 14 (1) में स्पष्ट उल्लेख है... \“साधारणतयः प्रत्येक वर्ष में सभा के तीन अधिवेशन यथा आय‐व्ययक अधिवेशन, वर्षा कालीन अधिवेशन व शीतकालीन अधिवेशन और 90 दिन के उपवेशन होंगे। इसमें यथा संभव दो माह के अंतराल पर कम से कम 10 कार्यकारी दिवस के लिए विधान सभा का सत्र बुलाया जायेगा।\“

यह नियमावली योगी सरकार ने ही वर्ष 2023 में संशोधित कर नए सिरे से तैयार कराई थी। इसके बावजूद इस नियम का पालन सरकार नहीं करा पाई।

18वीं विधान सभा में वर्ष 2022 की बात की जाए तो उस समय तीन अधिवेशनों में 16 दिन सदन चलाने का प्रस्ताव रखा गया था किंतु यह 15 दिन ही विधान सभा की कार्यवाही चल सकी थी। वर्ष 2023 में 23 दिन सदन चलाने का कार्यक्रम तय हुआ था किंतु सदन 20 दिन ही संचालित हो सका।

वर्ष 2024 में 19 दिन का सदन प्रस्तावित हुआ, लेकिन 17 दिन ही कार्यवाही चल सकी। इसी प्रकार वर्ष 2025 में तीन अधिवेशनों में 18 दिन सदन चलाने का निर्णय लिया गया, किंतु 17 दिन ही सदन की कार्यवाही चल सकी। इससे पहले सपा व बसपा की सरकारों में भी 90 दिन सदन चलाने के नियम का पालन नहीं किया जा सका था।

इसलिए ज्यादा सदन चलाने से हैं बचती सरकारें

[*]असहज सवालों और जवाबदेही से होता है बचाव
[*]कानून बनाने की रफ्तार होती है धीमी, विधेयकों को प्रवर समिति भेजने का होता है दबाव
[*]कम सत्र चलाने से सरकारें अध्यादेश के जरिए कानून बना लेती हैं, विधायी बहस हो जाती है सीमित
[*]विपक्ष के शोरगुल और कार्यवाही में व्यवधान का होता है डर
[*]सदन लंबा चलने से मीडिया कवरेज बढ़ती है और विपक्ष को रोज मिलते हैं नए मुद्दे
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