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बिहार का सीडी रेशियो 60 परसेंट से कम; ऋण वितरण धीमा, क्या बैंकिंग व्यवस्था प्रभावित होगी?

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सीडी रेश‍ियो में गिरावट ने बढ़ाई सरकार की चिंता। सांकेत‍िक तस्‍वीर



राज्य ब्यूरो, पटन। साख-जमा अनुपात (CD Ratio) के लिए चालू वित्तीय वर्ष (2025-26) की पहली दो तिमाही अच्छी नहीं मानी जा सकती।

हालांकि, दो तिमाहियों के आधार पर पूरे वित्तीय वर्ष की वस्तुस्थिति का आकलन नहीं हो सकता, क्योंकि अंतिम व चौथी तिमाही में लक्ष्य प्राप्ति के लिए विशेषकर होड़ होती है।

सरकार को भी आशा है कि वित्तीय वर्ष की समाप्ति तक सीडी रेशियो 60 प्रतिशत तक हो सकता है, जो अभी 58.17 प्रतिशत है।

पिछले वित्तीय वर्ष की समाप्ति यानी मार्च, 2025 के अंत में यह 59.04 प्रतिशत था। तब इसे कमतर उपलब्धि मानते हुए तत्कालीन वित्त मंत्री सम्राट चौधरी ने बैंकों को ऋण देने में अधिकाधिक उदार होने की चेतावनी दी थी। इसके लिए पंचायत स्तर तक आउटरिच कार्यक्रम पर सहमति बनी थी।
बिहार का सीडी रेशियो अभी 58.17 प्रतिशत

अब वित्त विभाग की कमान बिजेंद्र प्रसाद यादव संभाल रहे हैं, जो गुरुवार को राज्य-स्तरीय बैंकर्स समिति की 94वीं बैठक की अध्यक्षता करेंगे। बैठक में वार्षिक ऋण वितरण लक्ष्य (एसीपी) और सीडी रेशियो पर विशेषकर चर्चा होनी है।

तुलनात्मक रूप से सीडी रेशियो में मामूली गिरावट हो रही है। इसका एक कारण कम ऋण है तो दूसरा जमा राशि का अधिक होना भी।

बैंकिंग व्यवस्था के लिए यह दोनों स्थिति सिक्के के दो पहलुओं की तरह हैं। जमा के अनुपात में ऋण का वितरण भी संतुलित हो, तो वह अर्थव्यवस्था के लिए बेहतर स्थिति मानी जाती है।

अघोषित रूप से रिजर्व बैंक की भी अपेक्षा होती है कि सीडी रेशियो कम-से-कम 60 प्रतिशत रहे। चालू वित्तीय वर्ष की दूसरी तिमाही तक बिहार में बैंकों ने 28510 करोड़ रुपये जमा किए। उसकी तुलना में 11520 करोड़ ऋण दिए गए।
बढ़ते एनपीए ने बढ़ाई चिंता

उदार हृदय होकर ऋण देने में बैंकोंं की आनाकानी का एक बड़ा कारण गैर-निष्पादित परिसंपत्तियां (एनपीए) होती हैं। यह वस्तुत: डूबा हुआ कर्ज होता है, जिसकी वसूली के सारे प्रयास निरर्थक सिद्ध हो चुके होते हैं।

उद्योग और कारोबार आदि से जुड़े होने पर बैंक इसे बट्टा खाते में डाल देते हैं। बहरहाल बिहार मेंं एनपीए 7.95 प्रतिशत है, जो पिछले वित्तीय वर्ष के अंत में 7.57 प्रतिशत था।

स्पष्ट है कि मात्र छह माह में एनपीए में 0.38 प्रतिशत की वृद्धि हो चुकी है। कृषि क्षेत्र में एनपीए सर्वाधिक (लगभग 36 प्रतिशत) है।

उल्लेखनीय है कि समग्रता में एनपीए के दो प्रतिशत की सीमा लांघते ही बैंकों के लिए चिंता बढ़ने लगती है। इस सीमा के बाद बैंकों को कारोबार में हानि की आशंका प्रबल हो जाती है।
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