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कश्मीर में अलगाववाद को फिर जिंदा करने की कोशिश, मस्जिद-मदरसों के सर्वे पर बवाल; इस्लाम पर हमला या राजनीतिक साजिश?

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कश्मीर में अलगाववाद को फिर जिंदा करने की कोशिश (फाइल फोटो)



नवीन नवाज, जागरण, श्रीनगर। आतंकवाद और अलगाववाद की बेड़ियों से मुक्ति के बाद स्वंतत्रता की सांस ले रहे जम्मू कश्मीर में एक नया विवाद पैदा कर, स्थिति को फिर से बिगाड़ने की कोशिश हो रही है। यह कोशिश प्रदेश के भीतर से ही हो रहा है और उन्हीं लोगों द्वारा किया जा रहा है, जो खुद को कश्मीर का सबसे बड़ा हमदर्द बताते हैं।

वह खुद को प्रासंगिक बनाने और अपने राजनीतिक स्वार्थ को पूरा करने के लिए एक विशुद्ध प्रशासनिक प्रक्रिया को सांप्रदायिक रंग देते हुए, उसे धार्मिक स्वतंत्रता पर आघात बता रहे हैं।
मस्जिद-मदरसों के सर्वे पर बवाल

यह मामला मस्जिदों, मदरसों और इमामों की जानकारी के लिए जारी सर्वे के दौरान आया है। हालांकि, कश्मीर में ऐसा पहली बार नहीं हो रहा है। इससे पहले भी प्रशासन या पुलिस द्वारा किसी क्षेत्र विशेष की मस्जिदों और इमामों की जानकारी जुटाते समय बवाल हो चुका है। पहले जब कभी इस तरह की कार्रवाई होती थी, तो अलगाववादी खेमा ही शोर मचाता था। अब अलगाववादी नहीं है, लेकिन परोक्ष रूप से कश्मीर में अलगाववाद को हवा देकर मुख्यधारा की राजनीति करने वाले दल अब यह काम कर रहे हैं।

इनमें सत्ताधारी नेशनल कान्फ्रेंस हो, पीपुल्स डेमोक्रेटिक पार्टी की अध्यक्ष महबूबा मुफ्ती हों, पीपुल्स कान्फ्रेंस के चेयरमैन सज्जाद गनी लोन हों या फिर कश्मीर के प्रमुख मजहबी नेता मीरवाइज मौलवी उमर फारूक, सभी इस सर्वे का विरोध करते हुए कह रहे हैं कि यह इस्लाम पर आघात है। महबूबा मुफ्ती ने तो सीधे शब्दों में कहा है कि पहले मंदिरों और पुजारियों की जांच करो।
इस्लामिक देशों से सीखने की जरूरत

कश्मीर के समाजसेवी सलीम रेशी ने कहा कि एतराज मुझे भी है, लेकिन इस बात पर कि आप यहां विरोध क्यों कर रहे हैं। इस हंगामें की जम्मू-कश्मीर में कोई जरूरत नहीं है। यह सर्वे कोई बुरी बात नहीं है। सऊदी अरब सरकार भी अपने यहां की हर मस्जिद की निगरानी करती है, वहां अपनी मर्जी से इमाम और मौलवी नियुक्त करती है और उनके खुतबों के विषय को तय करती है।

अगर वहां कोई मौलवी या इमाम सरकार की नीतियों के खिलाफ बोलता है या फिर किसी कट्टरपंथी सोच को बढ़ावा देता है, तो उसे तुरंत उसकी जिम्मेदारी से हटा दिया जाता है, उसके खिलाफ कानूनी कार्रवाई भी होती है, तो फिर यहां कश्मीर में सरकार ऐसा क्यों नहीं कर सकती।

उन्होंने कहा कि मैं ओमान और कतर में रह चुका हूं। मैने वहां के हालात भी देखे हैं। वहां भी मस्जिदों पर सरकार की निगरानी होती है। जम्मू कश्मीर के बहुत से लोग यूएई में हैं। आप उनसे पूछें कि कि वहां मस्जिदों का निर्माण कैसे होता है। लाइसेंस जारी किया जाता है। मस्जिदों में क्या गतिविधियां हो रही हैं, वह मौलवी और खतीब किस तरह के भाषण कर रहे हैं ? सब निगरानी में रहते हैं। उनके वित्तीय मामलों की भी जांच होती है।
\“मस्जिदों में कट्टरपंथी सोच नहीं पनपने देंगे\“

इंडोनेशिया में कश्मीरी दस्तकारी का शोरूम संचालित कर चुके अबरार ने कहा कि इंडोनिशया को इस्लामिक मुल्कों में सबसे बड़ी डेमोक्रेसी माना जाता है। वहां मस्जिदों में कट्टरपंथी सोच को नहीं पनपने दिया जाता। वहां भी मस्जिदों का पंजीकरण जरूरी है और सरकार वहां की गतिविधियों की निगरानी करती है। जब आप पंजीकरण कराते हैं, तो मस्जिद और उससे संबंधित प्रबंधकों का पूरा ब्यौरा भी सरकार के पास चला जाता है।

यहां जम्मू कश्मीर में अगर ऐसा हो रहा है, तो मुझे इसमें कुछ भी बुरा नजर नहीं आता। तुर्की का दियानेट हजारों मस्जिदों को कंट्रोल करता है। हर हफ्ते उपदेश के टेम्पलेट जारी करता है और विचारधारा के कट्टरपंथ का सक्रिय रूप से मुकाबला करता है।
व्हाइट कॉलर मॉड्यूल ने किया था हैरान

कश्मीर मामलों के जानकार और डिप्लोमेट डिजिटल समाचार पत्र के संपादक सैयद अमजद शाह ने कहा कि हमें एक बात ध्यान में रखनी चाहिए कि हम एक लंबे समय से यहां आतंकी हिंसा को झेल रहे हैं। इस आतंकी हिंसा के पीछे जो प्रवृत्ति है-वह संकीर्ण कट्टरपंथी धार्मिक विचारधारा है और वह विचारधारा कश्मीर की सदियों पुरानी सूफी इस्लामिक विचारधारा से मेल नहीं खाती। पीछे ज्यादा दूर जाने की जरुरत नहीं है। अक्टूबर में पकड़े गए व्हाइट कॉलर मॉड्यूल के बारे में सभी को पता होगा।

कश्मीर में बीते तीन दशकों के दौरान जो हर गली मोहल्ले में कब्रिस्तान बने हैं। वह स्थानीय युवाओं को मजहब के नाम, इस्लाम के नाम पर बरगलाने से ही बने हैं। आतंकी मामलों का जब आप अध्ययन करेंगे, तो पाएंगे कि कैसे कुछ धार्मिक प्लेटफॉर्म का गलत इस्तेमाल युवाओं को कट्टरपंथी बनाने, हिंसा को सही ठहराने और टेरर फाइनेंसिंग को आसान बनाने के लिए किया गया।
अन्य धर्मों में कैसे होता है ऑडिट?

एडवोकेट अजात जम्वाल ने कहा कि हमारे संविधान में धार्मिक मान्यता का मौलिक अधिकार है, लेकिन धार्मिक स्वतंत्रता कभी भी पारदर्शिता, जवादेही और कानून से ऊपर नहीं हो सकती। पीडीपी प्रमुख महबूबा मुफ्ती भी इस बात को अच्छी तरह समझती होंगी। हमारे देश में हिंदू मंदिरों का ऑडिट राज्य के अधिकारी करते हैं, पुजारियों को रजिस्टर किया जाता है, मंदिर की जमीनों को रेगुलेट किया जाता है और दान की जांच की जाती है। चर्च और गुरुद्वारे ट्रस्ट और सोसाइटियों को चलाने वाले कानूनी फ्रेमवर्क के तहत काम करते हैं।

आप पंथ निरपेक्षता के नाम पर मस्जिदों को प्रशासनिक निगरानी से बाहर रखने का तर्क नहीं दे सकते। प्रशासन तो सिर्फ सर्वे कर रहा है। क्या किसी जगह किसी मौलवी को नमाज-ए-जुम्मा से पूर्व या किसी अन्य मौके पर मस्जिद में खुतबे से रोका गया है? क्या यहां किसी मस्जिद को बंद करने की बात हुई है, नहीं। फिर यह कैसे किसी धर्म पर आघात है। जो इसे आघात बता रहा है, वह आखिर चाहता क्या है? वह सिर्फ यहां राजनीति करना चाहता है, लोगों में सांप्रदायिक तनाव पैदा करते हुए उन लोगों की परोक्ष मदद करना चाहता है, जिन्होंने कश्मीरियों को मजहब के नाम पर गुमराह कर, कश्मीरियों को कश्मीरियों के हाथों कत्ल कराया है।
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