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बादलों को शादी का निमंत्रण, भारत में मेढक की शादी कराने के पीछे की कहानी

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मेंढक की शादी सूखे में बारिश के लिए प्राचीन रिवाज।



डिजिटल डेस्क, नई दिल्ली। पीढ़ियों से भारत में तालाबों, खेतों और लोककथाओं में मेंढकों का जिक्र होता रहा है। मेढक की टर्राहट बारिश से पहले गूंजती है जो मौसम के संकेतक माने जाते हैं।

जब मानसून देरी से आता है या सूखा पड़ता है, तो किसान अजीब रिवाज अपनाते हैं। वो है मेंढकों की शादी।

असम में \“भेकुली बिया\“ से लेकर कर्नाटक के \“मंडूका परिणय\“ तक यह अनुष्ठान बारिश करने की लिए किया जाता है।
क्यों करते हैं मेंढक की शादी?

मेंढक की शादी एक प्राचीन लोक रिवाज है, जिसमें नर और मादा मेंढक का हिंदू परंपराओं के अनुसार विवाह किया जाता है। इसे सूखे या देर से आने वाले मानसून को बुलाने के लिए किया जाता है।

मेंढक मानसून से गहराई से जुड़े हुए हैं. मानसून ही उनका प्रजनन काल होता है, यहीं वो समय है जब वो टर्राते हैं और पानी में अंडे देते हैं।

ग्रामीणों का विश्वास है कि उनकी शादी से मेंढक खुश होकर टर्राते हैं, जो वर्षा देवताओं जैसे इंद्र या वरुण को खुश करती है।

यह रिवाज वेदों या पुराणों में कहीं भी लिखा हुआ नहीं है, बल्कि आदिवासी मान्यताओं, कृषि चिंताओं और स्थानीय हिंदू प्रथाओं का मिश्रण है।

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कितना पुराना है रिवाज?

मेंढक की शादी की शुरुआत मुख्य रूप से असम में मानी जाती है, जहां इसे \“भेकुली बिया\“ कहते हैं। यह सदियों पुरानी परंपरा है, जो ब्रिटिश काल से पहले की है।

विद्वान इसे उत्तर-पूर्वी भारत की आदिवासी विश्वास प्रणालियों से जोड़कर देखते हैं। 1990 के दशक में लोककथा अध्ययनों में इसे असमिया संस्कृति के हिस्से के रूप में दर्ज किया गया। आज भी यह जीवित है।

2023 से 2025 तक असम के कामरूप, बिश्वनाथ और दर्रांग जिलों में ऐसे आयोजन हुए, जो जलवायु परिवर्तन के बीच पुरानी प्रथाओं की निरंतरता दिखाते हैं। असम से यह उत्तर प्रदेश, मध्य प्रदेश, पश्चिम बंगाल और कर्नाटक तक फैली।

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कैसे होती है मेढक की शादी?

रिवाज के मूल चरण एक जैसे हैं: मेंढकों को पकड़ना, पूजा करना, कपड़े पहनाना और जल में छोड़ देना। लेकिन इसमें भी क्षेत्रीय भिन्नताएं हैं।

असम में भेकुली बिया में मेंढकों को हल्दी लगाई जाती है, असमिया कपड़े पहनाए जाते हैं, सिंदूर चढ़ाया जाता है। गांव ढोल-नगाड़े बजाए जाते हैं। भोज किया जाता है। गीत असमिया लोक साहित्य का हिस्सा हैं, जो मौखिक रूप से पीढ़ियों से चले आ रहे हैं।

उत्तर प्रदेश में यह वैदिक मंत्रों के साथ होती है, जबकि कर्नाटक में मंडूका परिणय प्रार्थना पर केंद्रित है. यहां विवाह्के समय मेंढकों को वरुण और वर्षा नाम दिए जाते हैं।
कब और कहां हुई मेढक की शादी?

मध्य प्रदेश में कभी मिट्टी के मेंढक इस्तेमाल होते थे. साल 2019 में भोपाल में अधिक बारिश पर होने पर मेंढकों का \“तलाक\“ कराया गया। वहीं, त्रिपुरा में \“बांगर बिये\“ आदिवासी प्रभाव वाला समारोह है।

जून 2023 में कर्नाटक के धारवाड़ में सूखे से परेशान ग्रामीणों ने मेंढक शादी कराई थी। 2019 में उडुपी में पीने के पानी संकट पर \“मंडुका कल्याणोत्सव\“ कराया गया था।

भोपाल में 2019 में अधिक बारिश पर मेंढकों का \“तलाक\“ कराया गया था। ऐसा माना जाता है कि नर और मादा मेंढक की शादी कराने से बारिश होती है क्योंकि इंद्र देव अपना आशीर्वाद भेजते हैं।

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क्या कहते हैं विज्ञानिक?

ये रिवाज विश्वास पर आधारित हैं, जो सूखे में आशा देती हैं। वैज्ञानिक रूप से मेंढक बायोइंडिकेटर हैं, लेकिन उनका ये साफ कहना है कि उनकी शादी बारिश नहीं कराती है।

फिर भी, ये अनुष्ठान समुदाय को एकजुट करते हैं और तनाव कम करते हैं। सांस्कृतिक रूप से ये लोककथाओं और गीतों को जीवित करते हैं।
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